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गंभीर और संवेदनशील दर्शकों के लिए अक्टूबर

           Apr 14, 2018


 डॉ. प्रकाश हिंदुस्तानी
कठुआ और उन्नाव जैसी वीभत्स घटनाओं के बीच संवेदनशीलता का यह अंदाज पर्दे पर देखना सुखद है। लगता है कि संवेदनाएं अब केवल सिनेमा के पर्दे पर ही बची हैं। खलनायक की भूमिका इस फिल्म में है ही नहीं। वे असली जिंदगी में वे आ गए हैं। यह फिल्म केवल गंभीर और संवेदनशील दर्शकों के लिए ही है।

फिल्म देखने के बाद एकदम अंत में यह बात समझ में आती है कि इसका नाम अक्टूबर क्यों रखा गया? इसका नाम हरसिंगार होता तो शायद बेहतर होता।

अक्टूबर एक ऐसी प्रेम कहानी है, जो प्रेम कहानी नहीं है। दरअसल यह प्रेम कहानी तो क्या, कहानी भी नहीं है। इसे कहानी कहा जा सकता है।

दिलचस्प बात यह है कि इस फिल्म में कोई भी खलपात्र नहीं है। सभी पात्र सकारात्मक है और भावपूर्ण तरीके से अभिनय करते हैं। फिल्म के संवाद इतने साधारण है कि वे आम बोलचाल लगते हैं।

कमाल किया है 20 साल की बनिता संधु ने, जो फिल्म में शिवली बनी हैं। केवल अपनी आंखों से उन्होंने ज्यादातर अभिनय किया है। वरूण धवन इसमें एक दम अलग रंग में है। वरूण धवन के लिए यह फिल्म मील का पत्थर साबित होगी।

फिल्म में सारे पात्र वास्तविकता के नजदीक लगते हैं, जो घटनाक्रम दिखाया गया है, वह संभव लगता है और ऐसा लगता है कि दर्शक खुद फिल्म का हिस्सा बन गया हो। 5 स्टार होटल के एक इंटर्न के रूप में वरूण धवन ने काफी मेहनत की है। फिल्म इतनी धीमी गति से बढ़ती है कि कई बार लगता है कि कहानी आगे बढ़ ही नहीं रही।

शूजीत सरकार इसके पहले विकी डोनर, मद्रास कैफे और पीकू जैसी फिल्में बना चुके हैं। यह फिल्म एक ऐसी कहानी है, जिसमें प्रेम की अलग ही परिभाषा दर्शाई गई है। बिना गाने और संवाद के फिल्म में जिस तरह का प्रेम प्रदर्शित किया गया है, वह अलग ही है।

बिना मार-धाड़, नाच-गाने और किसिंग सीन के यह फिल्म अपने दर्शकों के अंदर उतरती जाती है। फिल्म को देखते हुए 1970 में आई खामोशी फिल्म याद आ जाती है।

फिल्म में अस्पताल के दृश्य काफी गहरे और लंबे है। कई बार उन दृश्य को देखकर घबराहट होने लगती है। शिवली की मां के रूप में गीतांजलि राव ने स्वाभाविक अभिनय किया है।

आईआईटी दिल्ली की प्रोफेसर बनी गीतांजलि राव को अपनी बेटी की चिकित्सा में कितनी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

यह आप समझ सकते हैं। फिल्म के निश्चल जज्बातों से दर्शक का मन सराबोर हो जाता है। कलाकारों की बॉडी लेंग्वेज और पार्श्व संगीत दृश्य को असरदार बना देते हैं।

 

 



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