जो लकीरें पिट चुकी हैं, मोदी सरकार उन्हीं लकीरों को पीट रही है

खरी-खरी            Oct 21, 2021



हेमंत कुमार झा।
हमारे देश के रहनुमा भले ही सब कुछ बाजार के हवाले करने पर आमादा हैं, लेकिन, वक्त बदल रहा है, बाजार के प्रति दुनिया की सोच बदल रही है।

जिन नीतियों को लेकर अमेरिका और यूरोप में अब असमंजस के हालात बन रहे हैं, उन्हीं पर सरपट दौड़ती हमारी आर्थिकी किसी सुचिंतित सामाजिक-आर्थिक सोच का परिणाम है या कारपोरेट प्रभुओं के राजनीतिक दबदबे का स्वाभाविक निष्कर्षयह सोचने का विषय है। यह अलग बात है कि सुनियोजित 'मेन्टल कंडीशनिंग' के इस दौर में कितने लोग यह सब सोच-समझ पाते हैं।

बाजारवाद के पुरोधा अमेरिका में बढ़ता वैचारिक उहापोह पूरी दुनिया के बौद्धिकों का ध्यान खींच रहा है। यह उम्मीद जताई जाने लगी है कि भविष्य में परिवर्त्तन का एक महत्वपूर्ण केंद्र अमेरिका भी बनेगा। विचारकों के एक वर्ग का हमेशा से यह मानना रहा है कि आमदनी के वितरण में घोर असमानता के शिकार अमेरिकी निम्न मध्यवर्ग की नाराजगी की आंच जब राजनीति के ताप को एक सीमा से आगे बढाने लगेगी तो वहां का सत्ता प्रतिष्ठान अपनी नीतियों को नए सिरे से परखने को, कई मायनों में बदलने को विवश होगा।

हालांकि, ऐसे ऐतिहासिक परिवर्त्तन आकस्मिक नहीं होते। वैचारिक द्वंद्व और विमर्शों के कई अध्यायों से गुजर कर ऐसे बदलावों की दिशा तय होती है।

इसका पहला महत्वपूर्ण संकेत तब मिला था जब बराक ओबामा पहली बार राष्ट्र्पति चुनाव जीतने के बाद देश और दुनिया को संबोधित कर रहे थे। वह 2008 का वर्ष था जब भारी आर्थिक मंदी ने दुनिया को सांसत में डाल दिया था। अमेरिका और यूरोप की अर्थव्यवस्थाएं तो खासी प्रभावितों में थीं। बाजार की ताकत के प्रतीक कई ऊंचे-चमकते शिखरों का जमींदोज होना
इस तथ्य का संकेत था कि चीजें इस तरह हमेशा के लिये नहीं चल सकतीं।

ओबामा ने बतौर राष्ट्रपति अपने पहले संबोधन में कहा था, "बाजार को उसकी गति पर ही नहीं छोड़ा जा सकता। कहीं न कहीं उस पर लगाम लगानी ही होगी।"

यह दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के शिखर पुरुष की ऐसी स्वीकारोक्ति थी जिसका असर आने वाले वर्षों में नजर आने वाला था।

महज बारह वर्ष ही तो बीते। नए अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन ने निम्न मध्यवर्ग में बढ़ती बेचैनियों को संबोधित करते हुए अभी बीते दिनों कहा, "ट्रिकल डाउन थ्योरी फेल हो गई है।"

ट्रिकल डाउन थ्योरी"जिसकी आड़ में आमदनी के असमान वितरण और अति धनी लोगों के और अधिक धनी होते जाने को नीतिगत स्तरों पर मान्यता दिए जाने का प्रयास होता है।

सामान्य शब्दों में कहें तो इस सिद्धांत के अनुसार आर्थिक सुधारों से जब ऊपर के धनी लोगों की संपत्ति बढ़ेगी तो वह 'रिस रिस कर' नीचे के गरीब लोगों तक भी पहुंचेगी।

अमेरिका के कोलंबिया युनिवर्सिटी में भारतीय मूल के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर जगदीश भगवती ट्रिकल डाउन थ्योरी के प्रमुख प्रवक्ताओं में से एक हैं। गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आने के बाद अपने आर्थिक सलाहकारों की जिस मंडली को इकट्ठा किया उनमें अधिकतर 'भगवती स्कूल' के ही चेले रहे हैं।

इस तरह हम समझ सकते हैं कि मोदी के राज में आखिर क्यों भारत में आर्थिक विषमता बढ़ने की दर इतिहास में सबसे अधिक हो गई।

हालांकि, ऊपर के धनी लोगों से समृद्धि रिस कर नीचे आने के इंतजार में गरीब लोग ताकते ही रह गए जबकि वे धनी लोग और धनी, और धनी होते गए। आज गरीबों की वह विशाल संख्या मुफ्त के कुछ किलो राशन या इसी तरह की कुछ और सरकारी योजनाओं से लाभ प्राप्त कर अपनी बदहाली का सामना कर रही है। उनकी क्रय शक्ति में अपेक्षानुरूप सुधार की तो बात ही क्या करनी, रिसर्च बताते हैं कि मुद्रास्फीति के अनुरूप उनकी आय का प्रतिशत भी नहीं बढ़ पा रहा।

भारत के आर्थिक सुधार देश की दो तिहाई बेहद गरीब आबादी के जीवन स्तर को सुधारने में कामयाब क्यों नहीं हो सके, क्यों इन नीतियों से आर्थिक विषमता बढ़ने की रफ्तार और अधिक तीव्र हो गई, कैसे इन आर्थिक नीतियों ने ऊपर के दो-चार प्रतिशत लोगों की संपदा में बेहिंसाब वृद्धि की, इन सब की सोदाहरण विवेचना करते हुए प्रो.अमर्त्य सेन और ज्यां द्रेज की बहुचर्चित किताब आई है, "एन अनसर्टेन ग्लोरी:इंडिया एन्ड इट्स कंट्राडिक्शन"।

जाहिर है, अमर्त्य सेन इन मायनों में जगदीश भगवती के विपरीत वैचारिक ध्रुव पर खड़े हैं और इसमें क्या आश्चर्य कि प्रो. सेन और ज्यां द्रेज जैसे अर्थशास्त्री मोदी सरकार की आंखों की किरकिरी बने हुए हैं।

बीते महीने जब राष्ट्रपति बाइडन ने ट्रिकल डाउन थ्योरी के 'फेल' होने संबंधी वक्तव्य दिया तो भारतीय, खास कर हिन्दी मीडिया ने इसे बिल्कुल भी महत्व नहीं दिया।

इतिहास में प्रतिरोध की भाषा के रूप में जानी जाती रही हिन्दी का मीडिया आज अपने नैतिक पतन के नए मुकाम तक यूं ही नहीं पहुंचा है। गनीमत है कि हिन्दी का साहित्य प्रतिरोध की उसी ऐतिहासिक भूमिका में आज भी है।

बाइडन का ट्रिकल डाउन थ्योरी के असफल होने का बयान मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर भी गम्भीर सवाल उठाने को प्रेरित करता है। जाहिर है, भारतीय मीडिया की मुख्य धारा इस खबर को एक हद तक दबाने में कामयाब रही, क्योंकि बाइडन का यह बयान जिन विमर्शों को जन्म देता है उनमें मोदी की आर्थिक नीतियों के प्रति गहरे सन्देह उभरते हैं।

एक अन्य महत्वपूर्ण, बल्कि बेहद महत्वपूर्ण घटना क्रम है अर्थशास्त्र में नोबल पुरस्कार संबंधी नवीनतम घोषणा। जिन तीन अर्थशास्त्रियों को इसके लिये चुना गया है उन्होंने 'लेबर इकोनॉमिक्स' में अपने शोधों के माध्यम से यह स्थापित किया है कि श्रमिकों की न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी औरउनके बच्चों की शिक्षा में सरकारी निवेश अर्थव्यवस्था की बेहतरी में बड़ी भूमिका निभाता है। इन तीनों में प्रमुख कैलिफोर्निया युनिवर्सिटी में प्रोफेसर डेविड कार्ड ने बड़ी कम्पनियों के इस षड्यंत्रपूर्ण दावे की हवा उड़ा दी है कि पारिश्रमिक में बढ़ोतरी अंततः बेरोजगारी ही बढाती है।

गौर करने की बात है कि जो स्वीडिश एकेडमी एक दौर में मिल्टन फ्रेडमैन जैसे अर्थशास्त्रियों को पुरस्कृत कर उनके सिद्धांतों का विश्वव्यापी प्रचार करती थी कि मुक्त बाजार और अधिकतम निजीकरण ही अर्थव्यवस्था में प्राण फूंक सकते हैं, वही अब अभिजीत बनर्जी, डेविड कार्ड, जोशुआ इंगरिस्ट जैसों को इस हेतु चयनित कर इस तथ्य को स्वीकार कर रही है कि आर्थिक सुधारों ने वंचितों और श्रमिकों का भला नहीं किया है और कि इन सुधारों का चेहरा मानवीय होना ही चाहिये।

1976 में मिल्टन फ्रेडमैन को नोबेल पुरस्कार दे कर उन्हें बाद में रोनाल्ड रीगन का मुख्य आर्थिक सलाहकार बना दिया गया था। रीगन ने जब कामगार वर्ग की हड़ताल का सख्ती से दमन करते हुए उनके संगठनों की कमर तोड़ दी थी तो उसके पीछे फ्रेडमैन की ही प्रेरणा रही थी। 'ट्रिकल डाउन थ्योरी' के प्रेरणा-पुरुषों में भी उनका नाम लिया जाता है। ब्रिटेन में थैचरवाद ने भी उनसे प्रेरणा ली थी। लेकिन, समय ने मिल्टन फ्रेडमैन के आर्थिक सिद्धांतों को मानवता के धरातल पर अपूर्ण माना जिसके प्रत्युत्तर में अमर्त्य सेन जैसे विद्वान आगे आए।

अमर्त्य सेन, अभिजीत बनर्जी, डेविड कार्ड आदि सुधार विरोधी अर्थशास्त्री नहीं हैं, लेकिन वे सदैव इसके मानवीय चेहरे की बात करते हैं जो कारपोरेट के सख्त होते शिकंजे में अमानवीय शक्ल अख्तियार कर चुका है। इसलिये सेन और बनर्जी जैसे भारतीय विद्वान मोदी सरकार की आंखों में खटकते हैं क्योंकि उनकी बातें सत्ता और कारपोरेट के अनैतिक गठजोड़ और गरीबों पर पड़ रहे उनकी नीतियों के दुष्प्रभावों की पोल खोलते हैं।

निश्चित ही अब डेविड कार्ड की स्थापनाओं को भी कारपोरेट संपोषित और सत्ता-उन्मुख भारतीय मीडिया उचित जगह नहीं देगा क्योंकि वे न्यूनतम मजदूरी में भारी वृद्धि की बातें करते हैं, गरीब बच्चों की शिक्षा में बड़े निवेश की बातें करते हैं।

अब दौर आ चुका है कि रीगनोमिक्स को अमेरिका में और थैचरवाद को ब्रिटेन में वैचारिक चुनौतियों का सामना है। फ्रांस में 'पीली कुर्ती' आंदोलन ने निजीकरण और कारपोरेट हितैषी राजनीति के खिलाफ मध्यवर्ग में व्यापक नाराजगी का इजहार किया है, जबकि हंगरी, नीदरलैंड, डेनमार्क आदि की सड़कें आंदोलनकारियों से पटी रही हैं। इन तमाम विरोध प्रदर्शनों में एक बात कॉमन हैकारपोरेट के बढ़ते साम्राज्य और सख्त होते शिकंजे का प्रबल विरोध।

जिन नीतियों को राजनीतिक और सैद्धांतिक, दोनों मोर्चों पर सघन चुनौतियां दी जा रही हैं, जिन्हें लेकर विश्वव्यापी असमंजस बढ़ता जा रहा है, भारत में उन्हें बड़े पैमाने पर लागू किया जा रहा है। दर्जनों सरकारी संस्थानों की बोलियां लगाई जा रही हैं, कितनों की तो लग चुकी।

जिस बीमा आधारित चिकित्सा नीति की तबाही अमेरिका ने कोरोना काल में देख ली, उसे अब अपने देश में आजमाया जा रहा है।

अर्थशास्त्र का जो विद्वान शिक्षा में सरकारी निवेश को बढ़ाने का संदेश देता है उसे नोबेल पुरस्कार दिया जा रहा है, जबकि हमारे देश में सरकारी शिक्षा को धीमी मौत की ओर धकेला जा रहा है।

जो लकीरें पिट चुकी हैं, मोदी सरकार उन्हीं लकीरों को पीट रही है। अर्थव्यवस्था के प्रति इस सरकार की समझ पर भरोसा कैसे किया जा सकता है? समझ ही नहीं, इसकी नीयत भी गम्भीर सवालों के घेरे में है।

 



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