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पंत प्रधान का गुजराती आर्तनाद

खरी-खरी            Nov 28, 2017


राकेश अचल।
आर्तनाद की कोई भाषा नहीं होती लेकिन आज पहली बार मैंने गुजराती में आर्तनाद सुना तो दंग रह गया। विधानसभा चुनाव में पार्टी के प्रचार के लिए गुजरात गए देश के प्रधानमंत्री अचानक गुजराती सपूत हो गए और जनता से कहने लगे कि कोई बाहर से आकर गुजराती डीकरा को अनाप-शनाप कह जाये तो क्या आप बर्दास्त कर लेंगे? प्रधानमंत्री जी का इस तरह घबरा जाना उनकी हताशा का संकेत दे रहा है।

विधानसभा चुनाव में कोई भी प्रधानमंत्री सिर्फ और सिर्फ विकास या दीगर राष्ट्रीय मुद्दों की बात करता है क्योंकि उसके कन्धों पर देश का भार और नजर में पूरा राष्ट्र होता है। अपना या पराया सूबा नहीं, लेकिन यहां तो एकदम उलटा हो रहा है। प्रधानमंत्री ने चुनाव की घोषणा से पहले प्रचार के पहले चरण में भी गुजरातियत उभारने का प्रयास किया और अंतिम दौर में भी।

आज तो वे पाटीदारों को रिझाने के लिए बाबू भाई,आनंदीबेन और केशूभाई तक को ढाल बनाने से नहीं चूके जबकि गुजरात के पाटीदार बहली भांति जानते हैं की केशूभाई को ठिकाने लगाने वाला और आंनदीबेन को सत्तारूढ़ तथा सत्ताच्युत करने वाला कौन है?

विधानसभाओं के चुनाव आते—जाते रहते हैं, हार-जीत भी होती रहती है लेकिन विधानसभा चुनाव जीतने के लिए कोई पंत प्रधान क्षेत्रीयता जैसे मुद्दों पर आकर बात नहीं करता। मौजूदा पंत प्रधान से पहले भी देश में गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री हुए हैं लेकिन किसी ने इस तरह की बात कभी नहीं की और करना भी नहीं चाहिए। भाजपा गुजरात में डेढ़ दशक से सत्ता में है और इसमें से भी बड़ा समय खुद आज के पंत प्रधान के शासन का रहा है फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि भाजपा घबराकर संयम खो रही है।

गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा की पूरी सेना लगी है। अर्थात भाजपा शासित देश दर्जन राज्यों के मुख्यमंत्री,मंत्री सांसद और केंद्र का आधा मंत्रिमंडल गुजरात में मोर्चे पर हैं। जबकि मुकाबले में अकेले कांग्रेस के राहुल गांधी हैं। कांग्रेस के पास इस चुनाव में कोई फ़ौज-फाटा नहीं है,संसाधन नहीं है फिर भी भाजपा की हवा खराब है। लगातार सत्ता में आते रहने के बाद भी किसी दल में इतनी घबराहट पहली बार देखने को मिल रही है। इससे लगता है कि जमीन के नीचे की हकीकत कुछ और ही है।

गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों में मेरी दिलचस्पी बिलकुल नहीं है क्योंकि मुझे लगता है कि सत्तारूढ़ भाजपा के लिए ये आसान लक्ष्य है। भाजपा ने विधानसभा चुनाव जीतने के लिए साम,दाम,दंड और भेद का सहारा लिया है। दल-बदल को स्वीकार किया है। भ्रष्टाचार की भभूत अपने माथे पर लगाई है फिर भी भाजपा में घबराहट है।

प्रदेश के नेता प्रदेश के मुद्दे उठायें तो किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती किन्तु जब देश का प्रधानमंत्री यही काम करता है तो राजनीति में आने वाली गिरावट सालने लगती है। मुझे लगता है की प्रधानमंत्री ने गुजरात में भाजपा के पराभव की आशंकाओं का सच पहचान लिया है इसीलिए वे विवश होकर राजनीति के निर्धारित मापदंडों की अनदेखी कर उस जमीन पर आ खड़े हुए हैं। जहां कोई दूसरा प्रधानमंत्री कभी नहीं आया।

हमने गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों में मोरारजी भाई देसाई,अटल बिहारी बाजपेयी,आईके गुजराल,एचडी देवेगौड़ा,चंद्रशेखर और चौधरी चरण सिंह को भी भाषण देते सुना है लेकिन इतनी घबराहट किसी भी प्रधानमंत्री में नहीं देखी।

पंत प्रधान को देश की बागडोर सम्हाले तीन साल से ज्यादा हो गए हैं किन्तु आज भी चाय उनका पीछा नहीं छोड़ रही। वे अपने नए जुमले में भी कहते हैं किमैंने चाय बेचीं है,देश नहीं बेचा लेकिन वे भूल जाते हैं की देश अभी तक किसी ने नहीं बेचा और न बेच पायेगा। हाँ कमीशन पहले भी खाया जाता था और आज भी खाया जा रहा है,फिर चाहे वो हैलीकाप्टर के नाम पर खाया जाता हो,या तोप के नाम पर।

बहरहाल गुजरात और हिप्र विधानसभा चुनाव के नतीजे देश की राजनीति पर क्या असर डालेंगे इसकी प्रतीक्षा पूरे देश को करना होगी। उम्मीद करना चाहिए की साल के अंत में होने जा रहे ये चुनाव नए साल में देश की राजनीति को नयी दिशा देंगे।

 


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