चौकीदार की इस अति में चौकीदार एक फीटिश की तरह बन गया

खरी-खरी            Mar 24, 2019


सुधीश पचौरी।
‘वयॉन’ न्यूज चैनल की एंकर खबर देती है- ‘द इकनॉमिस्ट’ के अनुसार बालाकोट के हवाई हमले से मोदी को फायदा है। ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ के अनुसार, इस चुनाव में मोदी की बढ़त दिखती है।

वयॉन’ न्यूज चैनल की एंकर खबर देती है- ‘द इकनॉमिस्ट’ के अनुसार बालाकोट के हवाई हमले से मोदी को फायदा है। ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ के अनुसार, इस चुनाव में मोदी की बढ़त दिखती है।
प्रियंका का ‘नौकाविहार’ खत्म हो चुका है।

भीड़ जुटती है। कई चैनल लाइव कवर करते हैं। लोग उनमें इंदिरा की छवि देखते हैं, लेकिन जब पूछते हैं कि क्या इनका असर चुनाव पर होगा, तो जनता कहने लगती है कि कुछ तो असर पड़ेगा, लेकिन जीतेंगे मोदी ही! टीवी में आती ‘जनता’ अपनी बात ऐसे ही ‘किंतु-परंतु’ मार कर बोलती है कि वैसे तो सब ठीक है, लेकिन आएंगे मोदी ही! जितने चैनलों में ऐसी ‘जनता बाइटें’ देखी सुनी गर्इं, उनसे यही लगता रहा कि जीत-हार तो हो चुकी है। सीटों के आंकड़े आने बाकी हैं।

तिस पर भाजपा का ‘ये कौन चित्रकार है’ की तर्ज पर बनवाया चुनावी प्रोमो कि ‘मैं भी चौकीदार हूं’ अचानक प्रसारित होता है और उसकी कैच लाइन कि ‘मैं भी चौकीदार हूं’ सीधे हिट हो जाती है।

एक चैनल मुग्ध होकर एक के बाद एक लाइनें लगाता है- ‘मोदी है तो मुमकिन है’। ‘नामुमकिन अब मुमकिन है’। ‘मैं भी चौकीदार हूं’! एक चैनल लाइन लगाता है- 2014 का नारा था- ‘अबकी बार मोदी सरकार’! 2019 का नारा है- ‘अबकी बार चौकीदार’!
कांग्रेस की दुखद हठधर्मिता के सदके कि एक बहस में प्रवक्ता पवन खेड़ा ‘एमओडीआई’ यानी ‘मोदी’ की कुछ ऐसी भदेस व्याख्या कर देते हैं कि भाजपा के संबित पात्रा सामने बैठे लोगों को ‘खड़े होकर शेम शेम’ करने को जैसे ही कहते हैं, लोग तुरंत उनकी ‘शेम शेम’ करने लगते हैं!

जब इतने से भी तसल्ली नहीं होती तो एक दिन सैम पित्रोदा एक पिटा-पिटाया सवाल कर बैठते हैं कि एअर स्ट्राइक में तीन सौ मारे, सरकार इसका प्रमाण दे। सैम पित्रोदा के इस बयान से कांग्रेस तुरंत अपने को अलग कर लेती है। चलिए, देर आयद, दुरुस्त आयद!
विज्ञापन के रूप में आकर ‘मैं भी चौकीदार हूं’ एक हिट अभियान बन गया है।

भाजपा के सभी कार्यकर्ता चौकीदार हुए जा रहे हैं- आज बीस लाख हुए चौकीदार तो कल पच्चीस लाख चौकीदारों को संबोधित करेंगे मोदी और एक दिन एक करोड़ चौकीदारों को संबोधित करेंगे मोदी!

बालाकोट के बाद टाइम्स नाउ पर आता सर्वे बताता है कि एनडीए को 283, यूपीए को 135 और अन्यों को 125 सीटें मिलती दिखती है! इसी चैनल की लंबी बहस में वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं- मोदी की दुर्जेयता के चार कारण हैं। मोदी की पर्सनलिटी, एनडीए के गठबंधन का सटीक गणित, राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा और बालाकोट का असर उत्तर भारत में अधिक रहेगा!

इसी बहस में सबा नकवी कहती हैं कि ‘लोगों को मोदी को गाली देना बंद कर देना चाहिए’। यही नहीं, पत्रकार संजीव श्रीवास्तव तक कहते हैं- अटैक में कांग्रेस खासी स्टूपिड रही है..।’

हर चैनल पर ‘चौकीदार चालीसा’ जारी रहता है। चैनल मस्त होकर दिखाने लगते हैं कि देखो मोदी ने अपने ट्विटर हैंडल का नया नामकरण किया- ‘चौकीदार नरेंद्र मोदी’ और बाकी सभी ने ऐसा ही किया, जैसे कि ‘चौकीदार अमित शाह’, ‘चौकीदार राजनाथ सिंह’ ‘चौकीदार गडकरी’, चौकीदार ये, ये, ये। भाजपा के सब नेता नाम के आगे लगाने लगते हैं- चौकीदार फलाना चौकीदार ढिकाना जैसे ‘चौकीदार’ न हो ‘पीएचडी’ की उपाधि हो!

‘चौकीदार’ का मुहावरा बजते ही हिट हो गया। चैनलों में अक्सर कोरस-सा बजता रहता- मैं भी चौकीदार, तुम भी चौकीदार। ये भी चौकीदार, वह भी चौकीदार… हम सब चौकीदार! एबीपी पर आकर साक्षात चौकीदार कहने लगे कि नेता हमारे नाम पर राजनीति न करें! लेकिन उनकी कौन सुने?
एक दिन पच्चीस लाख चौकीदारों से मोबाइल पर सीधे बात करते दिखते हैं मोदी और देर तक एक नया ‘चौकीदार चालीसा’ बरसता रहता है।

मोदी कहते हैं- मैंने गाली को भी गहना बना लिया! इस अनमोल वाक्य के समर्थन में जोर की ताली पड़ती है।
बेरोजगारी का आंकड़ा देने-न-देने के बारे में मिरर नाउ ने बताया कि हालांकि वित्तमंत्री जेटली ने बेरोजगारी के बारे में विपक्ष के आरोप को खारिज कर दिया है, फिर भी मुद्दा बना हुआ है और हमने देखा कि आती बहस में इकॉनोमिस्टों के तर्कों के आगे सीए संगठन के प्रवक्ता हकलाते दिखे!

उधर इंडिया टुडे की एक बहस में अकेले योगेंद्र यादव ने ‘मैं भी चौकीदार हूं’ के हल्ले को जमीन पर उतारा कि यह कोई रीयल मुद्दा नहीं हैं। देश का किसान संकट में है। उसका चौकीदार कौन है? इनके पास ‘मनी’ है, ‘मीडिया’ है। यों चौकीदार पर बहस रीयल समस्या की ओर इंगित करती है, लेकिन ‘मैं भी चौकीदार हूं’ – यह मार्केटिंग है। अब ‘चौकीदार’ शब्द एक अवसर बन गया है। लेकिन किसान और बेरोजगार लोगों का कोई ‘चौकीदार’ नहीं है।

और बलिहारी उस ‘चौकीदार’ की कि ‘चौकीदार’ की इस आंधी में हमें हर प्राणी ‘चौकीदार’ नजर आने लगा- सरकार चौकीदार। आंकड़े चौकीदार। एंकर चौकीदार। रिपोर्टर चौकीदार। कार्यकर्ता चौकीदार। बहसकर्ता चौकीदार। चुनाव चौकीदार। सोशल मीडिया चौकीदार! मैं चौकीदार। तू चौकीदार। ये चौकीदार। वो चौकीदार और आप चौकीदार!

‘चौकीदार’ की इस ‘अति’ में चौकीदार एक ‘फीटिश’ की तरह बन गया। यानी चौकीदार ‘पूज्य’ है, वह ‘पूज्यवस्तु’ है और चौकीदार एक ‘तावीज’ है!

जनसत्ता से साभार

 


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