राष्ट्रवाद अंधे राष्ट्रवाद में कब बदल गया यह आप कभी नहीं जान पाएंगे

खरी-खरी            Mar 03, 2019


गिरीश मालवीय।
2019 का आखिरी दाँव मोदी चल चुके हैं, उत्तर और मध्य भारत के लोग गहरे तक अंधे राष्ट्रवाद के नशे में डूबे हुए नजर आ रहे है मुझे याद आता है कि 1992 में पीवी नरसिम्हाराव से किसी ने पूछा कि बीजेपी से कैसे पार पाया जाए?

नरसिम्हाराव एक पल मुस्कराए फिर गहरी सांस लेकर कहा आप बीजेपी की राजनीति नही समझते!

बीजेपी प्रतीकों की राजनीति करती है, उन्होंने आपके सामने राम को खड़ा कर दिया हैं? आप सब से जीत सकते हो पर राम से कैसे जीतोगे?

ठीक यही प्रतीकों की राजनीति आज मोदीजी कर रहे हैं। राम अब अब काम के न रहे क्योकि काठ की हांडी को दोबारा चूल्हे पर नहीं रखा जा सकता।

अब 2019 में उन्होंने ओर भी बड़ा प्रतीक सामने रख दिया है वह प्रतीक है राष्ट्र का और उससे नालआबद्ध सेना का।

आप प्रश्न पूछेंगे तो आपके सामने सेना को खड़ा कर दिया जाएगा। तुरंत कह दिया जाएगा आप सेना से सवाल कर रहें हैं? आप राष्ट्र से सवाल कर रहे हैं?

गर्व....शौर्य .....राष्ट्र..... देशप्रेम.....जैसी शब्दावली में आपको जवाब दिया जाएगा जवाब के अंत मे आपके संदेह का शमन नहीं होगा बल्कि आप पर आरोप होंगे कि आप ऐसे सवाल पूछ कर राष्ट्र से गद्दारी कर रहे हैं।

ये राष्ट्रवाद अंधे राष्ट्रवाद में कब बदल गया है यह आप कभी नही जान पाएंगे।

जॉम्बी बन चुके उनके समर्थक आप पर सवार हो जाएंगे। और कांगी, वामी, देशद्रोही गद्दार जैसे विशेषणों से नवाज देंगे यह आपके परिचित लोग हैं सालों से आपके आसपास रहते आए हैं।
आप घबरा कर मैदान छोड़ देंगे।

ये लोग कभी नहीं जान सकते कि संदेह करना, प्रश्न पूछना, सुबूत मांगना एक स्वस्थ और चिंतनशील समाज की निशानी है .......यह वैज्ञानिकता का लक्षण है, लेकिन हमारे समाज के डीएनए में गहरे तक आस्था घुसी हुई है, हम वैज्ञानिकता को सहज रूप में नही स्वीकार करते लेकिन गणेश की मूर्तियां दूध पीती है इसे हम तुरंत स्वीकार कर लेते हैं क्योंकि सदियो से हमारे दिमागों की कंडीशनिंग उसी तरह से की गई है।

इसी बात का फायदा जाति और धर्म की राजनीति करने वाले दल उठाते हैं वे न शिक्षा की बात करेंगे न स्वास्थ्य की बात करेंगे और न रोजगार की। वे सिर्फ धर्म की बात करेंगे,राष्ट्र की बात करेंगे, शौर्य और गर्व की बात करेंगे।

क्योंकि, यह सिर्फ अमूर्त धारणाएं है। इसे स्टेबलिश कर वोटों की फसल काटना शिक्षा स्वास्थ्य रोजगार देने से कही आसान है। यही होता आया है और यही होगा। क्योंकि अब संदेह करना देशद्रोह की श्रेणी में ला दिया गया है।

कभी—कभी मुझे लगता है कि एक राजनीतिक समाज के रूप में हम आगे नही बढ़ रहे बल्कि हम पीछे की तरफ जा रहे हैं।

 


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