सरकार, आप अपने 100 दिनों की उपलब्धि में क्या-क्या गिनाएंगे

खरी-खरी, खास खबर            Feb 24, 2019


भगवान उपाध्याय।
महज 6 साल के थे प्रियांश और श्रेयांश। दर्दनाशक तेल का कारोबार करने वाले बृजेश रावत के ये जुड़वां बेटे चित्रकूट के सदगुरु पब्लिक स्कूल में यूकेजी के छात्र थे। 12 फरवरी को स्कूल बस से घर वापस लौटते समय रास्ते में बस रुकवाकर कुछ बदमाशों ने कट्‌टे की नोक पर इन्हें बस से उतारा और अपने साथ ले गए। दोनों भाई स्कूली ड्रेस में थे।

बाद में पिता के पास फिरौती के लिए फोन आने लगे। मांग 2 करोड़ रुपए की थी। पिता ने जैसे-तैसे 20 लाख रुपए आरोपियों तक पहुंचा भी दिए। लेकिन उन्हें उनके बेटे सही-सलामत नहीं मिल सके। 14 दिन बाद दोनों मासूमों की लाशें मिली। पूरे प्रदेश में इस घटना के कारण लोगों में गुस्सा है। अफसोस है। पीड़ा है। और डर भी है।

पुलिस के पास सफाई देने का सिर्फ एक बहाना है- अपहरण के बाद आरोपी उत्तरप्रदेश की सीमा में चले गए थे। सच है, पुलिस अक्सर अपनी सीमा-रेखा से बंधी होती है। लाश पड़ी रहती है लेकिन यदि पास में दूसरे थाने की सीमा लगती है तो सबसे पहले जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कोशिश होती है। यहां भी ऐसा ही हुआ।

आरोपी हमारे थाना क्षेत्र में नहीं हैं, मतलब हमारा काम खत्म। यदि ये बच्चे किसी बड़े अफसर या नेता के होते तो... क्या तब भी पुलिस का यही बहाना होता। ...शायद नहीं।

मुझे याद है, लगभग डेढ़ दशक पहले जब भोपाल में खाद्य एवं औषधि प्रशासन के एक बड़े अफसर के बेटे का अपहरण हुआ था और फिरौती मांगी गई थी तो पुलिस ने जीपीएस और साइबर टेक्नोलॉजी का सहारा लेकर आरोपियों का लगातार पीछा किया और दो दिन बाद छतरपुर के पास आरोपियों को दबोचकर अपहृत को सुरक्षित छुड़वा लिया था।

यदि पुलिस ईमानदारी से प्रयास करती तो प्रियांश और श्रेयांश आज हमारे बीच सकुशल होते। आरोपी भी सींखचों के भीतर होते। लेकिन पुलिस तो नई सरकार के गठन के बाद नई दुल्हन के आने की खुशी में बहरा गई थी। उसे पल्ले नहीं पड़ा कि ऐसे मामलों में किस तरह सूझबूझ से काम लिया जा सकता था।

क्या इस मामले में स्थानीय पुलिस अफसरों ने किसी विशेषज्ञ की मदद ली थी?

क्या पूर्व में हुई ऐसी वारदातों को सफलतापूर्वक सुलझाने वाले किसी पुलिस अफसर से सलाह-मशविरा किया था?

क्या आला-अफसरों ने इन बच्चों को सकुशल छुड़वाने के लिए कोई रणनीति बनाई थी?

क्या मुख्यमंत्री, मंत्री या विधायक ने 14 दिनों में एक बार भी पुलिस अफसरों से इस मामले का फॉलोअप लिया था?

अब पुलिस और सरकार के नुमाइंदे उस लाचार पिता और पथराई आंखों से बेटों का इंतजार कर रही मां के सामने किस मुंह से जाएंगे?

गृह मंत्री जी, यदि आप अपने घर के झगड़ों से फुरसत पा गए हों तो जरा पुलिस अफसरों से इस केस की डायरी तो बुलवाकर देख लीजिए। लापरवाह और गैर जिम्मेदार पुलिस अफसरों पर चुन-चुनकर कार्रवाई कीजिए।

यह दो बच्चों, उनके माता-पिता और सिर्फ सतना जिले का सवाल नहीं है, दो करोड़ ऐसे परिवारों का सवाल है, जिनके बच्चे स्कूल जाते हैं। उनकी चिंता बढ़ गई है कि उनके बच्चे सकुशल लौटकर तो आ जाएंगे।

चित्रकूट में घटना के बाद आक्रोशित लोगों को काबू में करने के लिए तो आपने धारा 144 लगा दी, लेकिन लोगों के दिलों में जो आक्रोश धधक रहा है, उसे शांत करने के लिए आप कौन-सी धारा लगाएंगे। *सरकार, आप अपने 100 दिनों की उपलब्धि में क्या-क्या गिनाएंगे*

एक बार सोच लीजिए कि यह हृदय विदारक घटना आप गिनती में रखेंगे या नहीं? इसका कोई सबब दिखाई देगा या नहीं? तबादलों का दौर थम गया हो तो अपनी पुलिस को अब कानून का पाठ पढ़ाइए और उसका पालन करने की इजाजत दे दीजिए।

वरना, सरकार शब्द से आम लोगों का विश्वास उठ जाएगा और लोगों को अपनी सुरक्षा के लिए खुद हथियार उठाने पड़ जाएंगे।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और दैनिक भास्कर में एक्जीक्यूटिव एडीटर हैं यह आलेख उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है।

 


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