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उमा की तरह अकबकाए कमलनाथ, और टुकुर-टुकुर देखता मतदाता

खरी-खरी            Jun 03, 2019


प्रकाश भटनागर।
कमलनाथ मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री तो बन गए लेकिन तीन बातें उनके पक्ष में नहीं गयी। पहली, बहुमत के किनारे पर जाकर उनकी सरकार अटक गई। जाहिर सी बात है, तलवार की नोक पर चलने जैसा करिश्मा कमलनाथ को करना है।

दूसरी, केन्द्र में पहले से कहीं ज्यादा मजबूती के साथ नरेन्द्र मोदी की सरकार दूसरी बार बन गयी। तीसरी बात, अमित शाह, मोदी सरकार में गृहमंत्री हो गए। इसे आप खोड़ में खाज की संज्ञा दे सकते हैं।

अब जिस तरह से कमलनाथ की सरकार चल रही है, उसे देख कर दो सार्वजनिक समारोह के दौरान भोजन की प्रतीक्षा में देखे गये घटनाक्रम याद आ रहे हैं। पहले स्थान पर भोजन तैयार होने में विलंब हो रहा था। दूसरी जगह भोजन की कमी हो गयी थी। तो, पहले स्थान पर भूखे लोगों की भीड़ के सामने थाली, कटोरी और गिलास लाकर रख दिये गये।

सबसे पहले एक सज्जन ने आकर उपस्थित लोगों की गिनती की। फिर साथ मौजूद कर्मचारियों से कहा कि इस संख्या के हिसाब से थाली, कटोरी और गिलास निकाल दें। करीब दस मिनट तक यह प्रक्रिया चली।

बाद में दो और लोग आये। उन्होंने बर्तनों को एक-एक कर इत्मिनान से पोंछना शुरू किया। पंद्रह मिनट और निकल गये। इसके बाद सबसे पहले लोगों के सामने गिलास रखे गये। तदोपरांत उनमें पानी भरने की रस्म अदा की गयी। आधा घंटा और निकलते-निकलते सभी के सामने थाली लगी और तब कहीं जाकर भोजन परोसना शुरू किया गया।

दूसरी जगह खाना कम पड़ गया। मेजबान चतुरसुजान था। उसने मेहमानों के विराजते ही ताबड़तोड़ थाली लगवायी। यह सुनिश्चित कर लिया कि पास बन रहे खाने की सुगंध मेहमानों तक पहुंचती रहे। इसके बाद हर थाली में सलाद और गिलास में पानी रख दिया गया। खुशबू के चलते लोगों की भूख खुल गयी।

वे सलाद पर ही टूट पड़े। उसमें डले नमक से उनकी प्यास भड़क उठी। उन्होंने दनादन पानी भी पी लिया। नतीजा यह हुआ कि भोजन परोसे जाने से पहले ही मेहमानों का आधे से ज्यादा पेट भर चुका था। वे बमुश्किल एकाध पूड़ी ही उदरस्थ कर सके। मेहमान पानी से भरे पेट को ही सहलाते हुए बाहर निकल गये और मेजबान की योजना पूरी तरह सफल रही।

कमलनाथ सरकार का आचरण भी ऐसा ही लग रहा है। भोजन पकने की ही तरह उसकी तमाम योजनाओं की सब्जी भी बीरबल की खिचड़ी की तरह पकती दिखती है। बुनियादी सुविधाओं की भूख से बिलबिला रहे लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं कि राज्य का रीता हुआ खजाना फिर भरने जा रहा है। उन्हें उस चिरसंचित अभिलाषा के पूरा होने का इंतजार है, जब यह होता दिखेगा कि राज्य बिजली के संकट से मुक्त हो रहा है।

मतदाता टुकुर-टुकुर नाथ के सियासी रसोईघर की ओर देख रहा है। लेकिन वहां से कभी कोई, तो कभी कोई और खाली थाली, कटोरी और गिलास लेकर ही बाहर आता दिख रहा है। बाकी भाई लोग मतदाता के हिसाब से इन बर्तनों को गिन रहे हैं।

इसके बाद कोई कांग्रेसी झंडे से पोंछेगा। तो कोई वचन पत्र के पन्नों पर इन बर्तनों को सजाना शुरू करेगा। रसोईघर में बैठे बातों की सब्जी बनाने में माहिर लोग जब अपना काम पूरा कर चुके होंगे, तब यही भोजन परोस भी दिया जाएगा।

बेचारे, मध्यप्रदेश के किसान की हालत और भी विचित्र है। वह उस भंडारगृह के बाहर पेट पर पत्थर बांधकर बैठा है, जिसके भीतर कर्ज माफी की रोटी दस की बजाय 106 दिन बाद भी नहीं पक सकी है।

उम्मीदों की खुशबू बदस्तूर फैलायी जा रही है। लेकिन असली भोजन की बजाय कहीं बारह तो कहीं तेरह हजार रुपए की कर्ज माफी का सलाद उसकी थाली में परोस दिया गया है। साथ वाले गिलास में पानी भरने की तो खैर जरूरत ही नहीं है। वह गिलास किसानों के आंसूओं से ही अपने आप भर जा रहे हैं।

अन्नदाता नाममात्र की और आधी-अधूरी कर्ज माफी वाला सलाद खा-खाकर ही पेट भरने को मजबूर है। तो साहब थालियों की गिनती और उन्हें पोंछने का खेल तो ऊंचे स्तर पर भी खेला जा रहा है।

आईएएस, आईपीएस और अन्य प्रशासनिक अफसर बर्तनों की तरह यहां से वहां पटके जा रहे हैं। महज 165 दिन में पंद्रह हजार तबादले देखकर लगता है कि प्रदेश में सरकार नहीं चल रही, बल्कि किसी कसीनो की वह टेबल संचालित हो रही है, जिस पर कोई माहिर पत्तेबाज हर जरा-सी देर में ताश की गड्डी के पत्तों को फेंटता रहता है।

यहां अफसर भी इसी तरह फेंटे जा रहे हैं। दूरदर्शन के दौर का एक सफल हास्य धारावाहिक था, ‘ये जो हैं जिंदगी।’ एक हास्य दृश्य का पात्र दो दोस्तों से कहता है कि पत्नी पर लगाम कसना चाहिए। उदाहरण दिखाने के लिए वह अपनी पत्नी को उनके सामने बुलाता है। उससे कभी दायें, तो कभी बायें जाने के लिए कहता है। कभी रसोई घर से कुछ सामान मंगवाता है तो कभी वही सामान वापस रखकर कुछ और लाने के लिए कहता है।

पता नहीं कमलनाथ यह लगाम लगाने का उदाहरण किसे दिखाना चाह रहे हैं, लेकिन नौकरशाही के आंगन में तबादला-तबादला खेलते हुए वह धारावाहिक के कॉमेडियन पात्र से ज्यादा और कुछ नहीं नजर आ पा रहे हैं।

यह तो तय था कि बहुमत के लिए एक तरफ हाथी तो दूसरी तरफ साइकिल की बैसाखी पकड़े कमलनाथ कांपती सरकार ही चला पाएंगे, लेकिन कांपते-कांपते यह सरकार ऐसी पंगु हो जाएगी, ऐसा तो किसी ने सोचा तक नहीं था।

ऐसी कमजोर सरकार लोकसभा चुनाव में अपनी क्षमताओं का सबूत दे ही चुकी है और अब ऐसे बे-सिर-पैर के तबादलों से वह अपनी रही-सही विश्वसनीयता से भी हाथ धोती दिख रही है।

हैरत इस बात की है कि इतने साल की राजनीति, केंद्रीय मंत्री जैसी मजबूत पारी और मुख्यमंत्री जैसे पद के बावजूद नाथ इतना डर-डरकर चल रहे हैं। असल में हमेशा सत्ता की राजनीति के शीर्ष और सुविधाजनक स्थिति में रहे नाथ कहां तो पूरे प्रदेश में छिंदवाड़ा का विकास मॉडल लागू करने की बात करते हैं और कहां आलम यह है कि विकास के अध्याय की प्रस्तावना लिखने का उपक्रम तक नहीं कर सके हैं।

नौकरशाही को काम तो करने दीजिए। लेकिन आपने तो जैसे महत्वपूर्ण कुर्सियों पर करंट लगा छोड़ा है। अफसर उन पर बैठा नहीं कि दन्न से किसी नाराज से विधायक ने आकर उसे उछाल दिया।

हरेक नयी व्यवस्था के आकार लेने में समय लगता है। किंतु वह आकार तब ही तो ले सकेगी, जबकि उसे स्थिर होने का मौका दिया जाए। हर पल अपने तबादले की आशंका वाली मानसिकता से ग्रस्त अफसर भला किस तरह अपने कर्तव्य को अंजाम दे पाएंगे? तिस पर विडंबना यह कि काम न हो पाने का ठीकरा भी इस अफसरशाही पर ही फूटेगा, जिसे काम करने ही नहीं दिया जा रहा है।

सच कहें तो कमलनाथ पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की ही तरह बौखलाहट की स्थिति में दिख रहे हैं। भारती ने दिग्विजय सिंह को हराकर सत्ता तो हासिल कर ली थी, लेकिन मुख्यमंत्री पद का जिम्मा मिलते ही वह अकबका-सी गयी थीं। भाजपा के मूल चरित्र को भूल कर लगा था कि यह सत्ता बस उनकी अकेले के दम पर है।

नतीजा यह हुआ कि महज आठ महीने में ही मुख्यमंत्री पद से उनकी विदाई हो गई। नाथ भी उमा भारती की तरह वाली अकबकाहट से भर गये दिखते हैं। सौ दिन से अधिक बीत जाने के बावजूद उनकी सरकार लॉन्च पैड पर ही ठिठकी हुई है। ‘वक्त है बदलाव का’ वाला नारा लेकर आये नाथ के बदलाव के मायने महज अफसरों की अदला-बदली वाले ही होंगे, यह भयावह कल्पना प्रदेश ने कभी नहीं की थी।

सन 1980 में आयी फिल्म ‘बुलंदी’ में खलनायक जीते-जागते इंसानों को मोहरे बनाकर शतरंज खेलता है। नाथ खलनायक जैसी फितरत के तो नहीं हैं, किंतु हां, इस समय वह जीते-जागते अफसरों को ही मोहरा बनाकर सियासत की शतरंज खेलने की कोशिश करते दिख रहे हैं।

ईरान और ईराक के बीच का युद्ध करीब आठ साल तक चला था। युद्ध के बीच एक अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय दैनिक ने कार्टून छापा। इसमें एक रिंग के भीतर इरान तथा ईराक किसी बॉक्सर की तरह एक-दूसरे से लड़ रहे हैं।

यह मुकाबला देखने के लिए एक भी दर्शक वहां मौजूद नहीं है। स्टेडियम का चौकीदार इन दोनों को चाबी दिखाते हुए कह रहा है, ‘जब मैच खत्म हो जाए तो आप ही ताला लगाकर चले जाना।’

नाथ पता नहीं किस तरह की सियासी लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन यूं ही तबादला-तबादला वाला मैच चलता रहा तो यह तय है कि एक दिन प्रदेश की जनता उनके हाथ में ठंडे पानी का गिलास देकर कह देगी, ‘जब आपकी सरकार काम करना शुरू कर दे तो हमे जगा दीजिएगा।’ मौजूदा हालात के चलते यह गिलास ठंडे पानी की बजाय गुस्से से गर्म आंसुओं से भरा पेश किया जाए तो नाथ को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

 


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