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23 सितंबर का संयोग:सपा राज में संत पिटे, भाजपा राज में लड़कियां

खास खबर            Sep 26, 2017


बनारस से अवनिंद्र कुमार सिंह।
क्या संयोग है कि बनारस में 23 सितंबर 2015 को संतों के ऊपर पुलिस ने लाठी चली थी और अब 23 सितंबर को ही पुलिसकर्मियों ने बीएचयू छात्राओं के ऊपर लाठियां भांजी। फर्क बस इतना है कि तब अखिलेश की सरकार थी और अब योगी आदित्यनाथ की। संतों का स्वाभव शांत का और लड़कियों को फूल कहा जाता है। जिला प्रशासन का हाथ उस वक्त भी नहीं कांपा जब उसने संतों की पीठ पर लाठी बरसाई और उस वक्त भी शर्म नहीं आई जब महिला महाविद्यालय में घुसकर पुलिसकर्मियों ने छात्राओं पर लाठियां तोड़ी। 


उस वक्त युवा मुख्यमंत्री अखिलेश का राज था। गणेश प्रतिमा को गंगा में प्रवाहित करने के लिए पूजा पंडाल के आयोजक और काशी के संत डटे हुए थे। हाईकोर्ट का हवाला देकर जिला प्रशासन गंगा में प्रवाहित न करने देने पर अड़ा हुआ था। गणेश प्रतिमा चौराहे पर रखकर संतों अपनी मांगों को लेकर गाँधीवादी आंदोलन शुरु कर दिया। मगर गंगा सफाई की बात कहकर संतों पर कई आरोप लगाए गए। सच है यदि गंगा से धर्मिक अनुष्ठान पूरे नहीं किए जाएंगे तो किसके जल से होगी? यदि संत धर्मरक्षा के लिए लड़ाई नहीं लड़ेगा तो आखिर किसके लिए लड़ेगा? 

खैर बेरहम प्रशासन उस वक्त भी संतों पर लाठियां बरसाईं और उसके बाद राजनैतिक दलों को मुद्दा मिल गया। इस मुद्दे पर अखिलेश सरकार की जमकर किरकिरी हुई, अंत में सपा को बैकफुट पर आना पड़ा और जिला प्रशासन की ओर से डीएम, एसएसपी और मंत्रियों को संतों से माफी मांगनी पड़ी। सपा के करतूतों का जनता ने जबाब दिया और अर्श से फर्श पर ला दिया।

 

उस समय विपक्ष में भाजपा, कांग्रेस और बसपा थी। वही भाजपा जो संतों के सम्मान में मैदान में उतरी थी और राज्य चुनाव के ठीक पहले स्वाति सिंह के मुद्दे पर नारा दिया 'नारियों के सम्मान में, भाजपा मैदान में'। इसी नारे को लेकर भाजपा ने प्रदेश के सभी मुख्यालयों पर अखिलेश सरकार के खिलाफ कुर्ता फाड़ आंदोलन किया, देश की महिलाओं के सम्मान की शपथ ली। जब कैम्पस में अपने सम्मान में सुरक्षा की गारंटी मांग रही छात्राओं को बीएचयू छात्रावास में घुसकर पुलिसकर्मियों ने सैकड़ों लड़कियों को पिटा तो क्या उनका सम्मान भाजपाईयों को नहीं दिखा? यदि लड़कियों का सम्मान है तो फिर क्यों नहीं उतरे मैदान में इसलिए न क्योंकि तुम्हारी सरकार है। सम्मान से ज्यादा महत्त्व सत्ता का है। 


कांग्रेस संतों के प्रकरण में भी जल्दी दिखाई जिसका खामियाजा पिंडरा से विधायक रहे अजय राय को भुगतना पड़ा। अजय राय की गिरफ्तारी हुई और गंभीर धाराओं में जेल की हवा भी खानी पड़ी। बीएचयू प्रकरण में भी कांग्रेस ने तेजी दिखाई और प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर को प्रकरण में पीड़ित छात्राओं का साथ देने के लिए भेजा मगर जिला प्रशासन ने उन्हें बीच रास्ते में ही जाने से रोक लिया।

सपा हो, कांग्रेस हो, भाजपा हो या बसपा किसी को न तो महिलाओं के सम्मान की फ़िक्र है और न ही मतलब। बस स्वार्थ है तो सत्ता के लिए वोटबैंक का। पीएम का संसदीय क्षेत्र होने के कारण मामला और भी संवेदनशील है। नवरात्र के इस पावन माह में संभवतः पीएम और सीएम शक्ति आराधना के लिए 9 दिन का उपवास होंगे। मगर दोनों ने लड़कियों के मुद्दे पर अब तक चुप्पी साधी है। 

सीएम का जो एक्शन दिखना चाहिए वह दिखा नहीं और आगे भी नहीं दिखेगा ऐसी प्रबल संभावना है। यह स्पष्ट हो गया जिस बदलाव की संभावना राज्य में थी वह नहीं होने वाली क्योंकि अब तक इस मुद्दे पर भी राजनीति हुई है और आगे भी होगी। दिखावे के लिए कुछ अफसरों को तास के पत्तों की तरह फेटा जायेगा, इधर से उधर कर मामले को ठंडा कर दिया जाएगा। मगर लड़कियों के दर्द पर मलहम लगाने कोई नहीं आएगा।
लेखक बनारस के युवा पत्रकार हैं।
 

 


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