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बुंदेलखंड मेडीकल कॉलेज:मर्जर के खेल में हो रहा मरीजों का मर्डर

खास खबर            Oct 30, 2017


सागर से रजनीश जैन।
मेडीकल कालेजों को जिला अस्पतालों में मर्ज करके स्टाफ और संसाधनों की अनिवार्यता पूरी करने की शासन की रणनीति संस्थाओं के टकराव की भेंट चढ़ रही है।

हद तो यह है कि शिवराज सरकार इतने महत्वपूर्ण फैसले से अपनी ही पार्टी के सांसद और विधायकों को सहमत नहीं करा पा रही। इन जनप्रतिनिधियों का कहना है कि इससे जनता को सुविधा बढ़ने की बजाय मुश्किलें बढ़ गई हैं।

होना तो यह चाहिए था कि मेडिकल कालेज और जिला अस्पताल कंधे से कंधा मिला कर चलते हुए दोगुनी रफ्तार से मरीजों को इलाज उपलब्ध करते लेकिन दोनों संस्थाओं के स्टाफ का ईगो जनता की बीमारियों से कहीं ज्यादा भारी और लाइलाज साबित हो रहा है। पीड़ित जनता की तकलीफ चुनावी साल में सांसद और विधायकों पर भारी पड़ती दिख रही है।

वे भी जनाक्रोश की आढ़ में डाक्टरों और अस्पताल स्टाफ की इस खींचतान में पार्टी बनते दिख रहे हैं क्योंकि समस्या सुलझाने में वे प्रशासन का सहयोग करके समन्वय स्थापित करने की दिशा में एक भी कदम नहीं उठा रहे उलटे शासन के निर्णय को ही कटघरे में खड़ा कर रहे हैं।

पिछले हफ्ते सागर के बुंदेलखंड मेडीकल कालेज की साधारण परिषद की बैठक छह साल बाद जब बुलाई गयी तो बैठक में यही मुद्दा छाया रहा। चिकित्सा शिक्षा मंत्री शरद जैन ने सांसद लक्ष्मीनारायण यादव और शैलेंद्र जैन को कन्विंस करने की हर तरह से कोशिश की लेकिन नतीजा सिफर ही रहा। दोनों डीमर्जर यानि पुरानी स्थिति वापस करने पर अड़े रहे।

उधर मंत्री शरद जैन और सांसद यादव के बयानों से शासन की यह गुप्तनीति खुल कर सामने आ रही थी कि चूंकि एमसीआई के मानक पूरे करने की औपचारिकता निभाना है अतः मर्जर की आधिकारिक घोषणा की गयी है और इसे मर्जर के रूप में न लेकर अस्थायी इंतजाम के रूप में लिया जाए।

सांसद तो आन कैमरा यह कह भी गये कि मंत्री जी स्थिति से सहमत हैं लेकिन (पीजी कोर्स और एमसीआई की मजबूरी के चलते) यह लिख कर नहीं दे सकते कि मर्जर को खत्म किया जाता है।

अब पूरे मामले से एक एंगल यह नदारद है कि सात नये मेडीकल कालेज खोलने वाली शिवराज सरकार इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से मदद क्यों नहीं मांग रही? केंद्र सरकार आर्थिक संसाधन और स्टाफ देकर समस्या को सुलझा सकती है, और इतना तो कर ही सकती है कि एमसीआई अपने मानदंडों को जरा लिबरल करके पेश आए। लेकिन लगता है केंद्र सरकार इस समस्या पर अपना बारूद तब ही खर्च करेगी जब प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए कुछ ही महीने शेष रह जाऐंगे। तब तक इस नूराकुश्ती के साइड इफेक्ट मरीजों को ही झेलना होंगे।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

 


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