झूठ की खुराक पर पलने वाली पीढ़ियां आगे चलकर बीमार होती हैं

मीडिया            Aug 11, 2017


राकेश कायस्थ।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब मैंने तय किया हो कि मैं राजनीतिक लेखन से यथासंभव दूर रहूंगा। राजनीति पर कहने के लिए बहुत सारी बातें हैं। लेकिन जिंदगी में इससे बेहतर कई और काम हैं। थका देनेवाली पेशेवर जिंदगी से जो वक्त बचे उसमें पार्क में बच्चो के साथ क्रिकेट खेलना, छज्जे पर लाइन लगाकर बैठे कौव्वे और कबूतरों को दाना खिलाना, गेट के बाहर जुगाली करती अलसाई गाय को यूं ही निहारते रहना और कुछ नहीं तो पुरानी फिल्में देखना या बुक शेल्फ में रखी वे किताबें पढ़ना जो बरसो नहीं पढ़ी।

सड़ांध भरी बजबजाती राजनीति पर अगर कुछ लिख भी दिया और दस लोग ने तालियां बजा दीं और पांच लोगो ने गालियां दे दीं, तो उससे आखिर हासिल क्या होना है? लोकतंत्र का मतलब चुनाव है। पांच साल में एक बार जाकर वोट दे आइये। पसंद की सरकार बन गई तो अच्छा अगर नहीं बनी तो बहुमत का सम्मान कीजिये। बस इतनी सी ही तो बात है।

लेकिन अफसोस बात सिर्फ इतनी सी नहीं है। देश में इस वक्त ऐसी स्थिति नहीं है, जहां सरकारें खामोशी से अपनी काम करती हैं और जनता चुपचाप अपना काम। सरकार और उससे जुड़े राजनीतिक संगठन जो कुछ कर रहे हैं, उसका सीधा असर रोजमर्रा की जिंदगियों पर पड़ रहा है। पब्लिक स्कूल में पढ़ने वाले मेरे बेटे को अगर टीचर ये बताये कि भगत सिंह को वेलेंटाइंस डे के दिन फांसी हुई थी और पूछने पर पता चले कि उनकी सूचना आधार व्हाट्स एप है, तो यह मेरे लिए खतरे की घंटी है।

अगर बच्चो के इतिहास की किताब से यह तथ्य हटा दिया जाये कि ताजमहल और लालकिला किसने बनवाया था, या फिर यह बताया जाये कि हल्दीघाटी की लड़ाई में महाराणा प्रताप ने अकबर को हराया था, तो यह एक बहुत डराने वाली बात है। झूठ की खुराक पर पलने वाली पीढ़ियां आगे चलकर बीमार होती है। मैं अपने बच्चो के लिए चिंतित हूं।

मैं चिंतित इसलिए हूं क्योंकि देश में सरकार या रूलिंग पार्टी से अलग राय रखने वालों के खिलाफ संगठित हिंसा चल रही है। यह हिंसा जितनी शाब्दिक हैं, उतनी ही शारीरिक भी। समाज का एक बड़ा तबका इस हिंसा पर इतरा रहा है, खुश होकर तालियां बजा रहा है। कल को अगर किसी राजनीतिक विरोधी की हत्या भी हो जाये तो देश एक तबका यही कहेगा कि हीरो बनने गया था, इसलिए मारा गया। आखिर कहां जा रहा है, हमारा समाज?

कीचड़ दायें-बायें हो तो आदमी बचकर निकल ले। लेकिन बिना दलदल में उतरे सफर संभव ही नहीं तो फिर विकल्प क्या है?  और कुछ नहीं तो इतना तो कर ही सकता हूं कि ये बताने की कोशिश करूं कि एक नागरिक होने के नाते मैं अपने लिए कैसा समाज और देश चाहता हूं। मेरा ख्याल है, ऐसा कहना अभी देशद्रोह के दायरे में नहीं आया है।

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