फिल्म समीक्षा:इमरजेंसी के काले दिनों की कच्ची कहानी इंदु सरकार

पेज-थ्री            Jul 28, 2017


डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी।
‘इंदु सरकार’ इंदिरा गांधी पर नहीं, इमरजेंसी के बैकड्रॉफ्ट में सरकारी अफसर नवीन सरकार और उसकी बीवी इंदु सरकार के अंर्तद्वंद की कहानी है। बीच-बीच में इमरजेंसी की घटनाएं याद की गई हैं। इमरजेंसी के काले दिनों की कच्ची कहानी इस फिल्म में है। तुर्कमान गेट कांड, नसबंदी, प्रेस सेंसरशिप, अभिव्यक्ति की आजादी पर नियंत्रण, आरएसएस के कार्यालयों में छापे, 20 सूत्रीय कार्यक्रम, युवक कांग्रेस के पांच सूत्र आदि इस फिल्म में है।

फिल्म शुरू होने के पहले एक लंबा चौड़ा डिस्क्लेमर हिन्दी और अंग्रेजी में है, जिसमें कहा गया था कि इस फिल्म के किसी भी दृश्य का, कलाकार का, स्थान का, किसी भी वास्तविक दृश्य, कलाकार या स्थान से कोई लेना-देना नहीं है और अगर यह है तो एक संयोग ही है। यह फिल्म पूरी तरह काल्पनिक घटनाओं और चरित्रों को लेकर बनाई गई है। दूसरी तरफ फिल्म खत्म होते ही पर्दे पर आता है कि आपातकाल में कितनी नसबंदियां हुई, कितनी झोपड़ियां टूटी, कितने लोगों को जेल भेजा गया आदि-आदि। फिल्म शुरू होने के पहले जो डिस्क्लेमर था, उसी डिस्क्लेमर की चिंदी फिल्म का अंत होते-होते कर दी गई। मानो दर्शक गधे हो।

इस फिल्म में इमरजेंसी की घोषणा है, पुलिस की ज्यादतियां है, गोलीबारी है, थानों में थर्ड डिग्री टार्चर है, इंदिरा गांधी, संजय गांधी, कमलनाथ, जगदीश टाइटलर, रूख्साना सुल्तान आदि के डुप्लीकेट है। सरकार में रहकर जनता के बारे में सोचने वाले पुलिसवाले है, लेकिन फिर भी मधुर भंडारकर में इतनी हिम्मत नहीं की खुलकर बोलते की यह फिल्म इमरजेंसी के बारे में है। फिल्म में इमरजेंसी के दिनों की पड़ताल बहुत गंभीरता से नहीं की गई, केवल सतही दृश्य है। वर्तमान दौर में ऐसी फिल्म बनाना राजनैतिक दृष्टि से भी फायदेमंद हो सकता है, क्योंकि आज के दौर में गुजरात दंगे, व्यापमं घोटाले की मौतें, किसानों पर गोलीबारी, नर्मदा नौटंकी आदि पर तो फिल्म बनने से रही। मधुर भंडारकर को पहले ही फिल्म बनाने के राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। मुंबई की वीडियो लाइब्रेरी के अदने से कर्मचारी से लेकर फिल्म निर्माता बनने तक उनकी कहानी भी पूरी फिल्मी है।

इंदु सरकार इमरजेंसी की पृष्ठभूमि पर है। फिल्म में इंदिरा गांधी बनी सुप्रिया विनोद का केवल एक सीन है। फिल्म में इमरजेंसी के मुख्य खलनायक के रूप में नील नितिन मुकेश ने संजय गांधी की भूमिका निभाई, जिन्हें सब चीफ कहते हैं। फिल्म के अनुसार इमरजेंसी की सारी ज्यादतियों के लिए इंदिरा गांधी से ज्यादा जिम्मेदार संजय गांधी और उनके चमचे थे। संजय गांधी ने ही इमरजेंसी में किशोर कुमार के गानों पर रोक लगवा दी थी, जिस कारण आकाशवाणी और दूरदर्शन पर किशोर कुमार के गाने बंद हो गए थे।

इमरजेंसी में 13 साल से 70 साल तक के लोगों की नसबंदी जबरदस्ती कर दी गई थी, ज्यादातर मुस्लिमों की। इमरजेंसी के 20 सूत्र और संजय गांधी के पांच सूत्र भी इस फिल्म में है। तब दो ही तरीकों के लोगों की चलती थी, एक पुलिसवालों की और दूसरी चमचों की। फिल्म में संजय गांधी को अय्याश और डिक्टेटर की तरह दिखाया गया है, जो कहता है कि इमरजेंसी में किसी का इमोशन नहीं, केवल मेरा ऑर्डर चलेगा और सरकार किसी के व्यक्तिगत चैलेंज से नहीं, चाबुक से चलती है।

इमरजेंसी में कई चीजों के मायने बदल गए थे। गांधी के मायने भी। संजय गांधी का मानना था कि रास्ते चलती जनता को कोई हक नहीं है कि वह सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए। इमरजेंसी में पुलिस की एक गोली छह फुट के जवान को छह इंच की तस्वीर में बदल देती थी। जनता का दिमाग तब भी कोरे कागज की तरह था और उस पर सुखी भारत अभियान, गरीबी हटाओ जैसे नारे लिखे हुए थे।

नील नितिन मुकेश ने संजय गांधी की भूमिका जीवंत की है। उनके संवाद अदायगी और हावभाव, चरित्र को साक्षात करने में सक्षम है। इंदु सरकार बनी कीर्ति कुल्हारी ने भी गजब का अभिनय किया है। तोता राय चौधरी ने इंदु सरकार के पति की भूमिका में जान फूंक दी है। फिल्म का संगीत और पाश्र्व संगीत दोनों अच्छे है और सीपिया टोन में बनी फिल्म पुरानी तस्वीरों की तरह लगती है। संजय गांधी के सामने ‘आज जवानी पर इतराने वाले कल पछताएगा’ - पूरी कव्वाली दिखा दी गई है। अनुपम खेर बीजेपी सांसद के पति हैं और इस फिल्म में इमरजेंसी के खिलाफ अंडरग्राउंड होकर काम करने वाले नानाजी के रूप में हैं। उन्होंने भी मौका देखकर चौका मारा है।

इंदु सरकार इमरजेंसी के जख्मों को कुरदने का एक मौका है। काले दिनों की याद दिलाने वाली फिल्म हमें चेताती है कि दोबारा ऐसी स्थितियां ना हो, लेकिन तानाशाही हर बार नए-नए रूप लेकर आती है। यह बात नहीं भूलनी चाहिए।

 



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