फिल्म समीक्षा:लोटा पार्टी का मिसफायर टॉयलेट एक प्रेम कथा

पेज-थ्री            Aug 12, 2017


डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी।
अक्षय कुमार की संडास वाली लव स्टोरी दर्शकों को भरमाती है। फिल्म कहती है कि गांवों में लोग लोटा पार्टी करने इसलिए जाते हैं कि वे रूढ़ियों से बंधे हैं। फिल्म के अनुसार जो लोग दिसा मैदान को खुले में जाते हैं, वे ऐसा अपनी मर्जी से कर रहे हैं। फिल्म यह नहीं बताती कि भारत में एक तिहाई परिवार जिन घरों में रहते है, वे 258 वर्गफुट से भी कम के हैं और उन घरों में औसतन पांच लोग रहते हैं। एक व्यक्ति के लिए औसतन 60 वर्गफुट जगह भी उपलब्ध नहीं है। अमेरिका में जेल के कैदियों के लिए भी न्यूनतम 60 वर्गफुट जगह उपलब्ध कराई जाती है। अनेक गांव ऐसे हैं, जहां की महिलाएं दो-दो, तीन-तीन किलोमीटर दूर से पीने का पानी लाती हैं। ऐसे गांव में अगर शौचालय बना भी दिए जाएं, तो लोग उसका उपयोग नहीं कर पाएंगे। खैर, यह फिल्म है और फिल्म का मतलब है बिजनेस। सामान्य से डेढ़ गुना महंगा टिकिट लेकर मल्टीप्लेक्स में जो लोग टॉयलेट देखने जा रहे हैं, उनके लिए यह कोई समस्या नहीं है। टॉयलेट न होना, उनके लिए मनोरंजन की बात हो सकती है।

इस फिल्म में 46 से अधिक सहप्रायोजक हैं। मैंने ऊपर लिखा है कि फिल्म मतलब बिजनेस, उसी तरह अब टॉयलेट मतलब बिजनेस हो गया है। करोड़ों टॉयलेट बनाने का जिम्मा सरकार ने उठाया है और जब टॉयलेट बनेंगे, तो उसमें सीमेंट, पाइप, टाइल्स, टंकी आदि तो लगेंगे ही। इसलिए इस फिल्म में सहप्रायोजकों में टाइल्स बनाने वालों से लेकर पेटीएम तक शामिल है और प्रधानमंत्री की योजना होने के कारण कई चैनल, अखबार और मीडिया संगठनों ने इसके प्रमोशन की जिम्मेदारी ली है।

फिल्म में मोहब्बत चलती है, फिर टॉयलेट का मुद्दा आ जाता है। जुगाड़ूमल हीरो अपनी दुल्हन के लिए घर में टॉयलेट का जुगाड़ नहीं कर पाता। 36 साल का नौजवान अपने बाप को टॉयलेट की महत्ता नहीं बता सकता। कहानी में बाप को दकियानूसी पंडित बताया है, जो कहता है कि घर में टॉयलेट बनाना ठीक नहीं। जिस आंगन में तुलसी का पौधा हो, उस आंगन में शौचालय नहीं होना चाहिए। फिल्म में मनुस्मृति का भी जिक्र है, जिसमें कहा गया है कि सूरज के सामने और चांद के सामने शौच नहीं किया जाना चाहिए। अर्थ स्पष्ट है कि खुले में शौच पर निषेध है। वास्तुशास्त्र के हिसाब से घर के दक्षिणी भाग में शौचालय बनवाया जाना चाहिए, लेकिन हीरो है कि वह अपने बाप को समझा नहीं पाता।

हीरो की बेवकूफियां यहां भी खत्म नहीं होती, वह अपनी नई पत्नी को शौच के लिए रेलवे स्टेशन पर 7 मिनिट के हाल्ट वाली ट्रेन तक ले जाता है, लेकिन उसे इतना नहीं पता कि हर रेलवे स्टेशन पर महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग शौचालय होते ही हैं। उसके किसी भी दोस्त के घर में शौचालय नहीं है, जहां वह यह व्यवस्था कर पाए कि जब तक मेरे घर में व्यवस्था नहीं हो जाती, मेरी दुल्हन उसका उपयोग कर लेगी। ऐसा लगता है कि सिर्फ कॉमेडी और मोदी जी के स्वच्छ भारत के लिए कहानी बढ़ाई गई है।

फिल्म कभी टॉयलेट पर खिंचती है, तो कभी प्रेम कथा पर। प्रेम कथा के बीच में टॉयलेट आ जाता है और टॉयलेट प्रेम कथा को कॉमेडी में बदल देता है। बीच-बीच में टॉयलेट को लेकर भाषण भी आ जाते हैं। टॉयलेट निर्माण के नाम पर भ्रष्टाचार, नौकरशाही, लालफीताशाही, न्यूज चैनलों की टीआरपी की होड़ और दैनिक जागरण के संवाददाता के बहाने पत्रकारों की फजीहत आदि भी दिखा दी गई है।

टॉयलेट को लेकर ही पिछले वर्ष प्रवीण व्यास की एक डॉक्यु ड्रॉमा ‘मानिनी’ आई थी। उस फिल्म में भी एक लड़की शादी के बाद ससुराल में टॉयलेट नहीं होने का विरोध करती है। वह फिल्म भी प्रियंका भारती से प्रेरित थी, जो अपने ससुराल में टॉयलेट नहीं होने से ससुराल छोड़कर आ गई थी। प्रियंका को सुलभ इंटरनेशनल ने अपना ब्रांड एंबेसेडर बनाया था और पांच लाख रुपए का ईनाम भी दिया था। बिहार का सुलभ इंटरनेशनल शौचालय बनाने के काम में कई दशकों से सक्रिय है और पूरे देश में सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण और संचालन कर रहा है। सार्वजनिक शौचालय का दूसरा नाम ही सुलभ शौचालय पड़ गया है, उसके पहले भी सार्वजनिक शौचालय चलन में रहे हैं, जिन्हें बमपुलिस कहा जाता था। इन बमपुलिस में भी सफाई, रोशनी और पानी का पूरा इंतजाम होता था। फिल्म में सुलभ या बमपुलिस का कोई जिक्र तक नहीं। शहरों में झोपड़पट्टियों में रहने वालों के लिए शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं। इसका भी जिक्र तक फिल्म में नहीं है।

फिल्म का काफी भाग महेश्वर में फिल्माया गया है, लेकिन महेश्वर की खूबसूरती, नर्मदा और वहां के सुंदर घाट मुश्किल से ही पहचान में आते हैं। अक्षय कुमार ने छिछौरे नौजवान की भूमिका की है, जबकि भूमि पेंडणेकर ने अभिनय में बाजी मार ली। वे वही लगती है, जो भूमिका उन्हें मिली। अनुपम खेर, सुधीर पांडे, सना खान आदि खानापूरी करते हैं।

फिल्म में ‘भाभी जवान हो गई, दूध की दुकान हो गई’, ‘कबीर बेदी ने चार-चार कर ली और इनसे खून भरी मांग भी नहीं भरी जा रही’, ‘हर कोई सनी लियोनी को देख रहा है, कोई टीवी पर, कोई कम्प्यूटर पर, कोई मोबाइल पर’, ‘लंगोट में चीटी घुस गई’ जैसे डायलॉग भी हैं। अगर आपने भी स्वच्छ भारत का इरादा कर लिया है, तो फिल्म देख सकते हैं। इसका नाम टॉयलेट एक प्रेम कथा की जगह लोटा पार्टी या संडास की कॉमेडी होता तो बेहतर था।

 



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