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राजनीतिक जानकारों और सियासत के नए खिलाड़ियों के लिए शोध का विषय बनता भोपाल चुनाव

राजनीति            May 06, 2019


राघवेंद्र सिंह।
मध्यप्रदेश में लोकसभा चुनाव के नतीजे चौकाने वाले आ सकते हैं। राजधानी भोपाल को ही देखें तो पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ‘दिग्गी राजा’ भाजपा की संन्यासिन प्रज्ञा सिंह ठाकुर से कड़े मुकाबले में हैं।

देशभर में चर्चित इस सीट पर रणनीति और चरणबद्ध कार्यक्रम के लिहाज से भाजपा के मुकाबले कांग्रेस मजबूत है। यह बात भाजपा के कर्ताधर्ता भी अंदरखाने में स्वीकार करते हैं। प्रदेश की 29 सीटों में से भाजपा 26 सीटों पर अपनी बढ़त बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है।

कांग्रेस के लिहाज से उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है। ऐसे में दिग्िवजय सिंह बनाम साध्वी प्रज्ञा के मुकाबले पर पूरा देश नजरें गढ़ाए हुए है। नतीजा जो भी आए, राजनीति के जानकार और सियासत के नए खिलाड़ियों के लिए भोपाल चुनाव शोध का विषय बनता जा रहा है। इस पूरे मामले में दिग्विजय बनाम भाजपा का सीन दिख रहा है।

1989 से भाजपा भोपाल की सीट पर काबिज है। यह कांग्रेस के लिए धर्म-जाति के मान से भी मुश्किल सीट रही है। दिग्विजय सिंह के चुनावी अनुभव के सामने साध्वी प्रज्ञा सिंह सियासत में एकदम नौसिखिया हैं लेकिन उनके पास भाजपा के संगठन की साख और संघ परिवार का समर्थन शुरुआत में आरामदायक जीत का इशारा कर रहा था।

इस चुनाव को समझने के लिए हमें भोपाल में 2003 के आसपास जाना पड़ेगा। फायरब्रांड लीडर उमा भारती का दौर था।

यहां दुर्गावाहिनी से भाजपा में आई तेजतर्रार राजो मालवीय को भोपाल नगर निगम चुनाव में महापौर प्रत्याशी के लिए मैदान में उतारा गया था। उस समय भाजपा प्रदेश की राजनीति में शिखर पर थी। लेकिन होशंगाबाद के सोहागपुर क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाली राजो मालवीय को भाजपा के घाघ और स्थािपत नेताओं ने चुनाव हरवा दिया।

असल में भोपाल में कुछ क्षत्रपों की टीम बाहरी नेताओं को तंबू नहीं गाड़ने देती। वह स्थािपत हों इसके पहले उनके बंबू उखाड़ देती है। यही वजह है कि उमा भारती भी राजो मालवीय को भोपाल मेयर का चुनाव जिता नहीं पाईं।

इस मामले में अब प्रज्ञा सिंह को जोड़कर देखा जाए। दिग्विजय सिंह के 10 साल के मुख्यमंत्रित्वकाल में भाजपा के दर्जनों नेताओं से निजी संबंध जगजाहिर हैं। कई बार उन्होंने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर उनकी मदद की। अब वह अकेले ऐसे कांग्रेसी हैं जो लोकसभा चुनाव में भाजपा नेताओं से मदद लेने की स्थिति में हैं।

जब कैलाश विजयवर्गीय विधायक के साथ इंदौर के महापौर भी थे, तब दिग्गीराजा ने कांग्रेस नेताओं के एतराज के बावजूद कैलाश को दोनों पदों पर रहने दिया। नियम के मुताबिक कांग्रेसियों का दबाव था कि कैलाश को विधायक या महापौर में से किसी एक पद पर रहने दिया जाए। उस समय अक्सर विधानसभा की लॉबी और उसके बाहर इस मुद्दे पर चर्चाएं भी होती थीं।

इसी तरह कैलाश सारंग, सुंदरलाल पटवा, कैलाश जोशी, विक्रम वर्मा से भी दिग्विजय सिंह के संबंध बहुत निकट के रहे हैं। भोपाल से चुनाव मैदान में उतरने के साथ ही यह कहा जाने लगा था कि भाजपा नेताओं से कैसे मदद लेनी है यह काम दिग्विजय सिंह से बेहतर कोई नहीं कर सकता।

भाजपा राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक का भी एक किस्सा याद आ रहा है जिसमें बतौर मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने समिति के सदस्यों को अपने निवास पर भोज के लिए आमंत्रित किया था। उस समय कार्यसमिति भोजन करने के मुद्दे पर विभाजित हो गई थी।

कुछ नेताओं ने कांग्रेसी नेता के नाते तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के यहां भोजन करने में असहमति जताई थी। उनके भोज पर आमंत्रण के सहज निर्णय को राजनीतिक पंडितों ने आदर्श कूटनीति का नाम दिया था। उस दौर में भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री गोविंदाचार्य ने दिग्विजय सिंह की सहजता को देखते हुए कहा था कि यदि उनके जैसा लीडर हमारे पास हो तो मध्यप्रदेश में हमें 20 साल कोई नहीं हरा सकता।

अलग बात है कि इस समय न तो गोविंदाचार्य भाजपा में हैं और न ही उस समय के धुरंधर भाजपा नेता मुख्य धारा में हैं। अटलबिहारी वाजपेयी समेत विजयाराजे सिंधिया और कई दिग्गज दिवंगत हो चुके हैं।

साध्वी प्रज्ञा सिंह के आक्रामक हिंदुत्व के खिलाफ दिग्विजय सिंह सॉफ्ट हिंदुत्व लेकर चल रहे हैं। अक्सर भगवा आतंकवाद और मुंबई एटीएस के चीफ हेमंत करकरे की शहादत को लेकर चर्चाओं में आए दिग्विजय सिंह नर्मदा यात्रा से लेकर चुनाव के दौरान मंदिर-मंदिर घूमकर यह साबित करने में लगे हैं कि उनका हिन्दुत्व किसी से कम नहीं है।

असल में भाजपा ने बजरिए संघ साध्वी प्रज्ञा को मैदान में उतारकर देशभर में यह संदेश देने में सफलता हासिल की थी कि मोदी के आक्रामक राष्ट्रवाद के साथ वह कट्टर हिंदूवाद की भी लाइन पर चल रही है। नतीजा जो भी आए भाजपा और संघ के नेताओं का कहना है कि जो हमारा उद्देश्य था वो काफी हद तक पूरा हो गया है।

भोपाल में भाजपा और कांग्रेस में बुनियादी फर्क नजर आ रहा है। रणनीति और गंभीरता के हिसाब से दिग्विजय सिंह का कार्यक्रम कई चरणों में पूरी योजना के साथ चल रहा है। दिग्विजय सिंह अपने जीवन का सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण चुनाव लड़ रहे हैं। इसमें उनका अनुभव और नर्मदा यात्रा करने के साथ जो धार्मिक छवि उभरी है उसका लाभ भी उनको मिल रहा है।

भाजपा को अनुमान था कि हिंदुत्व और मुसलमानों के बारे में अक्सर विवादित टिप्पणी करने वाले दिग्गी राजा चुनावी बयानवाजी में रोज कहीं न कहीं फंसेंगे। इत्तेफाक से अभी तक कोई बड़ा अवसर भाजपा को नहीं मिला है।

जेएनयू विवाद से चर्चा में आए बेगूसराय से वामपंथी प्रत्याशी कन्हैया कुमार की प्रशंसा के साथ भोपाल में सभा कराने के निर्णय पर जरूर दिग्विजय फंसते दिखाई दे रहे थे लेकिन उनके समर्थकों ने समय रहते चेताया और कन्हैयाकुमार की भोपाल यात्रा रद्द करा दी।

दिग्विजय सिंह के साथ उनका तजुर्बा तो है ही उनके मंत्री बेटे जयवर्धन सिंह, पत्नी अमृता सिंह भी चुनाव में सक्रिय हैं। अमृता का संबंध बिहार से है और वह भोपाल में करीब 2 लाख पूर्वांचल और भोजपुरी मतदाताओं से संपर्क कर रही हैं। नौकरी से लेकर भोजपुरी भवन और उनके जन्म प्रमाणपत्रों के साथ पूर्वांचल के लिए भोपाल से ट्रेन की मांग पर भी वह चुनाव के बाद काम करने का आश्वासन दे रही हैं।

दूसरी तरफ भाजपा की प्रज्ञा इस चुनावी चक्रव्यूह में अभिमन्यु की तरह प्रवेश तो कर गई हैं लेकिन उन्हें सुरक्षित निकालने के लिए भाजपा नेताओं का असहयोग संघ के दबाव के बाद भी ठीक नहीं हो रहा है। हर जगह वह अकेली पड़ती दिखती हैं।

चुनाव संचालन में वरिष्ठ नेता रघुनंदन शर्मा जैसे संगठक की दरकार थी लेकिन जो चुनाव की कमान संभाले हैं वह ज्यादा सक्रिय नजर नहीं आते। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तर्ज पर दिग्विजय सिंह ने मतदान तक पैदल यात्रा शुरू की है। लेकिन इसकी काट में भाजपा के दिग्गजों ने कोई रणनीति नहीं बनाई।

मध्यप्रदेश कांग्रेस ईवीएम को लेकर चिंतित है। मतदान और उसके बाद वोटिंग मशीनों पर सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग लाइव करने के बारे में सोच रही है। कांग्रेस का मानना है कि चुनाव में तो उन्हें बढ़त मिलेगी बस मतदान मशीनों में बदलाव न किया जाए। इसके लिए कोई जल्द ही बड़ी तैयारी पीसीसी कर रही है।

 

 


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भोपाल-में-कुछ-क्षत्रपों-की-टीम-बाहरी-नेताओं-को-तंबू-नहीं-गाड़ने-देती

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