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यही तीन क्षत्रप क्यों ढोएं कांग्रेस की पालकी ?

राजनीति            Sep 22, 2018


हेमंत पाल।
कांग्रेस और गुटबाजी मध्यप्रदेश में एक दूसरे पूरक हैं! जब भी कांग्रेस अपने चिर प्रतिद्वंदी भाजपा के खिलाफ कमर कसने की तैयारी करती है, पार्टी तीन हिस्सों में बंटकर अपने-अपने सेनापतियों के पीछे खड़ी हो जाती है। कांग्रेस के झंडे के तीन रंगों की तरह प्रदेश में इसकी तीन अलग धाराएं भी साफ़ नजर आती है।

इस बार भी कांग्रेस इस सबसे मुक्त दिखाई नहीं दे रही। चुनाव की नजदीकी भी कांग्रेस को ये सबक नहीं दे रही कि वे एकजुट होकर भाजपा से मुकाबले के लिए साथ खड़े हों। यहाँ तक कि चुनाव प्रचार में भी कांग्रेस कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह खेमे में बंटी दिख रही है।

बैनरों, पोस्टरों और नारों में भी कांग्रेस के बजाए नेताओं के नाम से जयकारे लगते हैं। तीन नेताओं की तीन धाराओं में विभाजित पार्टी यदि एक साथ प्रयास करे, तो भाजपा को चुनौती देना मुश्किल नहीं है। लेकिन, ऐसा हो नहीं पा रहा! यहाँ तक कि पार्टी के नेता ने चुनाव सभाओं के लिए भी अपने-अपने समर्थकों की सीटों का ध्यान रख रहे हैं। लेकिन, क्या कारण है कि पार्टी आलाकमान ने मध्यप्रदेश में पार्टी की पालकी इन्हीं तीनों को सौंप दी?

मध्यप्रदेश में कांग्रेस की तीन धाराएं प्रवाहित होती है। दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया की जटाओं से निकलकर ये पार्टी पूरे प्रदेश में बहती है। जब कभी पार्टी को जरुरत पड़ती है, ये धाराएं एक जगह इकठ्ठा हो जाती हैं और पार्टी का जनसैलाब बना देती है, जो कांग्रेस की ताकत के रूप में सामने आता है।

जैसे ही ये जरुरत पूरी हो जाती है, ये धाराएं फिर अपनी-अपनी दिशाओं में बहने लगती हैं। लेकिन, जिस दिन भी ये तीनों धाराएं कांग्रेस के झंडे के नीचे एक हो जाएंगी, किसी भी सरकार की जड़ों को उखाड़ना मुश्किल नहीं होगा! लेकिन, ऐसा हो नहीं रहा।

ये तीनों क्षत्रप पार्टी मंच पर तो कई बार साथ दिखे! इनके दल भी मिले, पर दिल नहीं! कांग्रेस नेतृत्व इन तीनों को एक जाजम पर बैठा पाने में सफल क्यों नहीं हो पा रहा, ये ऐसा सवाल है जिसका जवाब किसी के पास नहीं! जब तक ये तीन धाराएं एक-दूसरे में समाहित नहीं होंगी, डेढ़ दशक से प्रदेश में जमी भाजपा की जड़ों को हिला पाना इसके लिए आसान नहीं होगा!

विधानसभा चुनाव की तैयारी पर भी गुटीय राजनीति हावी है। पार्टी के कार्यकर्ताओं को कांग्रेसी न मानकर कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह गुटों में बांटकर देखा जा रहा है। यह वो संकेत है, जो पार्टी की रणनीति और भविष्य संकेत देता है।

अब तो चुनावी सभाओं में नारे भी पार्टी को छोड़, नेताओं के नाम के लगने लगे! इस बारे में कई बार नेताओं ने कार्यकर्ताओं को हिदायत भी दी, पर समर्थकों की प्रतिबद्धता पार्टी से ज्यादा अपने नेता के प्रति दिखाई देती है। इस सच्चाई को नाकारा नहीं जा सकता कि पिछले 15 सालों में मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने विपक्ष भूमिका भी ठीक से नहीं निभाई।

कांग्रेस की स्थिति पूरी तरह निष्प्रभावी राजनीति की रही है। अब तो कांग्रेस के निर्गुट कार्यकर्ता भी स्वीकारने लगे हैं कि यदि भाजपा मुकाबला करना है, तो पार्टी को एकजुट होना ही होगा! सिर्फ पार्टी अध्यक्ष बदलने से कांग्रेस में शक्ति का संचार होने का जो भ्रम था, वो भी चार महीने में खंडित हो गया!

जब तक कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस की कमान नहीं सौंपी गई थी, उनके समर्थक उनकी सांगठनिक क्षमता के कसीदे काढ़ने में देर नहीं करते थे। लेकिन, बीते महीनों में ऐसा कोई चमत्कार नहीं हुआ कि कांग्रेस मजबूत दिखाई दी हो। बल्कि, कई मामलों में पार्टी की स्थिति अरुण यादव के कार्यकाल से भी कमजोर लगी। जबकि, अरुण यादव के कार्यकाल को पार्टी के नेता शांतिकाल की व्यवस्था मानते हैं।

जब से कमलनाथ ने पार्टी की कमान संभाली, न तो भाजपा पर कोई बड़ा राजनीतिक हमला किया गया न मुख्यमंत्री की घेरेबंदी की गई। कई मामलों में तो पार्टी ठीक से अपनी सफलता को भी भुना नहीं पाई। सबसे ख़राब स्थिति पार्टी प्रवक्ताओं की हो गई, जो खुद कांग्रेस के प्रवक्ता न होकर अपने आका के गुणगान तक सीमित हो गए।

जबकि, अरुण यादव के कार्यकाल में केके मिश्रा ने कहीं ज्यादा प्रभावी ढंग से पार्टी का पक्ष सामने रखने का काम किया! सच्चाई ये है कि अभी तक कांग्रेस अपनी सेना भी ढंग से खड़ी नहीं कर सकी। सारा ध्यान नियुक्तियां करने और फिर उसे बदलने का ही है।

ये माना जा रहा था कि आने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रदेश में किसी चेहरे को सामने रखकर वोट मांगेगी! जैसा कांग्रेस ने पंजाब में किया था। लेकिन, अब ये बात स्पष्ट हो गई कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला! मध्यप्रदेश में पार्टी बिना चेहरे के ही चुनाव लड़ेगी।

पार्टी का मानना है कि चुनाव में चेहरे की जरूरत नहीं होती, जनता का समर्थन चाहिए। फिलहाल पार्टी जिस स्थिति में है, उसे देखते हुए यदि कोई चेहरा सामने किया गया तो पार्टी की हालत और ज्यादा ख़राब हो जाएगी। गुटीय राजनीति इस बात की इजाजत भी नहीं देती कि, पार्टी किसी चेहरे को सामने रखकर चुनाव लड़े। ऐसा हुआ तो दूसरा गुट उसे निपटाने पर तुल लाएगा।

वैसे भी आज कांग्रेस को किसी चेहरे पर फोकस करने के बजाए तहसील, ब्लॉक और जिला स्तर पर संगठन को मजबूत करने की जरुरत ज्यादा है। भाजपा ने अपने डेढ़ दशक के शासन में कांग्रेस को सबसे ज्यादा नुकसान संगठन के स्तर पर ही पहुँचाया है। गाँव-गाँव में कमल छाप कांग्रेसी मौजूद हैं। पार्टी को सबसे पहले इन्हें पहचानना होगा, तभी किसी सार्थक नतीजे की उम्मीद की जा सकती है। भाजपा के खिलाफ कांग्रेस की इस कथित एकजुटता को अब नीचे तक ले जाना जरुरी है, तभी बदलाव की जाना संभव है।

प्रदेश की मुखिया बनने से पहले कमलनाथ ने शिवराजसिंह चौहान और उनकी सरकार की कथित कलाकारी को चलने नहीं देने का दावा किया था। वे 2018 में उनकी सरकार को उखाड़ फैंकनें का दावा भी कर रहे थे, तो अब तक उन्होंने कुछ किया क्यों नहीं? लेकिन, कमलनाथ ने एक बात अच्छी कही कि मैं अपने ग्रामीण इलाके के दस कांग्रेसी नेताओं को रोज फोन लगाता हूँ, ताकि उनसे जीवंत संपर्क बना रहे। क्योंकि, जब तक लोग पार्टी में अपनापन महसूस नहीं करेंगें, तब तक संभव नहीं कि संगठन मजबूत बने।

हम अभी तक जो चुनाव हारे उसकी वजह है कि हम स्थानीय स्तर पर संगठित नहीं हो पाए। आज नए और पुराने दोनों ही तरह के पार्टी कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चलने की जरूरत है। कमलनाथ का ये फॉर्मूला कारगर नतीजे देने वाला हो सकता है, बशर्ते इस पर अमल किया जाए। दिन में दस ट्वीट करने से भाजपा घबराकर कांग्रेस को सत्ता सौंप देगी, ऐसा तो कुछ होगा नहीं, वास्तव में हो यही रहा है!

प्रदेश में चुनाव प्रचार धीरे-धीरे जोर पकड़ रहा है! भाजपा की तरफ से शिवराज सिंह पूरी मुस्तैदी से किला लड़ा रहे हैं, पर कांग्रेस के प्रचार में अभी गरमाहट दिखाई नहीं दे रही! कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया दोनों सभाएं तो कर रहे हैं, पर उनका 'अपना आदमीवाद' साफ़ दिख रहा है। दोनों नेता इस बात का भी ध्यान रख रहे हैं कि उनके समर्थक कहीं टिकट की दौड़ में पिछड़ न जाएं।

अभी चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की कोई सूची जारी नहीं हुई। लेकिन, जब वो समय आएगा, तब इन तीनों में खींचतान होना तय है। फिलहाल दिग्विजय सिंह ने अपने आपको भोपाल की राजनीति से अलग रखा है और प्रदेशभर में 'संगत में पंगत' कर रहे हैं। लेकिन, वे भी उम्मीदवारी की कानाफूसी से अलग नहीं हैं। देखना है कि ये तीनों मठाधीश कांग्रेस की पालकी को राजप्रासाद तक ले जाने में कैसे कामयाब होंगे।

 


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