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राजहठ की सीमापार करते केजरीवाल लड़ किससे रहे हैं?

राजनीति, खरी-खरी            Jun 18, 2018


राकेश दुबे।
दिल्ली में सरकार औपचारिक रूप से हड़ताल पर है और अधिकारी अनौपचारिक रूप से हड़ताल पर हैं। अब मामला दिल्ली उच्च न्यायालय में भी गया है। दिल्ली के नागरिक पर्यावरण प्रदूषण से परेशान हैं और सियासी ड्रामा बढ़ता ही जा रहा है।

दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश है। मुख्यमंत्री संविधान को पढ़े बगैर हड़ताल पर हैं और केंद्र पता नहीं किस बात के इंतजार में है। दिल्ली में इस वक्त प्रदूषण के कारण हालात बहुत खराब हैं। जल संकट और बिजली की अघोषित कटौती से भी जनता हाहाकार कर रही है।

ऐसे समय में मुख्यमंत्री का अपने अधिकार बढ़ाने की जद्दोजहद में राजनिवास पर मंत्रियों के साथ धरने पर बैठना बचकानी हरकत है। पूरे देश में यह ऐसी पहली निर्वाचित सरकार है जो काम न करने के बहाने ढूंढती रहती है|

दिल्ली की पूर्व मुख्य मंत्री शीला दीक्षित की प्रतिक्रिया रेखांकित करने काबिल हैं। वे कहती हैं “जब हमारी सरकार थी तब हमने भी अधिकारियों के साथ काम किया और बेहतर ढंग से किया।

मैंने पूर्व में नियुक्त मुख्य सचिव और विभिन्न विभागों के अन्य सरकारी अधिकारियों को हटाने की कोई सिफारिश नहीं की। केंद्र सरकार की ओर से पूछा भी गया तो भी मना कर दिया।“ यह बात अलग है तब दिल्ली में यू पी ए की सरकार थी। शीला दीक्षित को कोई असुविधा भी नहीं थी।

यह मानने वाली बात नही प्रमाणित तथ्य है कि अधिकारी किसी एक राजनीतिक दल के नहीं होते। इसलिए केजरीवाल को पहले यही स्पष्ट करना चाहिए कि उनकी लड़ाई आखिर किसके साथ और किस मुद्दे पर है?

उपराज्यपाल अनिल बैजल कुछ कर ही नहीं सकते। वे संवैधानिक व्यवस्था से बंधे हैं। वैसे भी अधिकारियों के साथ प्यार और मिठास से काम लिया जाता है, जबरदस्ती या बदतमीजी से नहीं। कई राज्यों के उदहारण लिए जा सकते हैं।

जहाँ विधायिका और कार्यपालिका के समन्वय ने बेहतर प्रशासन दिया है। अधिकरियों के साथ हुई मारपीट सरकार के चरित्र पर प्रश्न चिन्ह लगती है “यह किस तरह की सरकार है जो पहले मुख्य सचिव को आधी रात अपने घर बुलाती है और फिर उनके साथ मारपीट करती है।

मुख्यमंत्री भी बाद में सब कुछ करते हैं, लेकिन मुख्य सचिव से माफी नहीं मांगते, खेद तक प्रकट नहीं करते।” केंद्र सरकार न्यायालय के निर्णय की बाट जोहे या इस सरकार के अवसान का इंतजार करे? उसका निर्णय है ,दिल्ली की जनता परेशान है और दोनों सरकारों को कोस रही है।

उसका अपराध यही है न उसने एक राजनीतिक विकल्प को चुना था। केजरीवाल को प्रधानमन्त्री से अपील के स्थान पर अधिकारियों से समन्वय बैठाना चाहिए ,धरने पर बैठने की जगह। राजहठ नागरिक एक सीमा तक सहन करते हैं, वो सीमा पार हो चुकी है न्यायालय दिल्ली के मुख्यमंत्री से पूछ सकता है किससे और क्यों लड़ रहे हो, केजरीवाल।


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