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निर्माण के नाम पर शहर के विनाश का सामान तैयार करती एजेंसियां

प्रदेश लार्इव            Aug 09, 2019


प्रकाश भटनागर।
यह मेरी नजर का फेर नहीं है। दु:ख और गुस्से का चरम है। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में बीती रात एक युवक गड्ढे में डूबकर जान गंवा बैठा। अखबार में घटनास्थल की तस्वीर देखी। मुझे वह गड्ढा नहीं, बल्कि समूची व्यवस्था का कीचड़ भरा चेहरा महसूस हुआ।

करोड़ों की लागत से बने प्लेटिनम प्लाजा के ठीक पास में हुई यह घटना कई सवाल उठाती है।

स्मृति अपना विस्तार पूरे शहर के हालात तक करती है। वह हालात, जिनके चलते राजधानी दहशत का पर्याय बन गयी है। नारकीय असुविधाओं का ठिकाना बना दी गयी है।

दिग्विजय सिंह ने राज्य के शहरी और ग्रामीण इलाकों में सड़कों को गड्ढों में तब्दील किया था। कमलनाथ सरकार और राजधानी में पदस्थ संंबंधित अफसरान इस समूचे शहर को ऐसी ही हालत में ला चुके हैं।

बात केवल एक प्लेटिनम प्लाजा की नहीं है। गड्ढों के तौर पर शहर के चेहरे पर उगी चेचक हर ओर देखी जा सकती है। कोलार के इलाके में चले जाइए। किस जगह पानी के नीचे मौत आपका इंतजार कर रही है, कोई नहीं जानता।

छोटे तालाब से लेकर रेलवे स्टेशन और बस स्टेंड तक की सड़क तो जैसे सामूहिक दुराचार की शिकार बना दी गयी है। वाहन चलाना तो दूर, उस पर पैदल चलना तक जन्म-मरण का प्रश्न बन गया है।

स्मार्ट सिटी वाले निमार्णाधीन हिस्से के पास से गुजरते समय यही आशंका लगी रहती है कि वहां भी कहीं कोई गड्ढा बांहे पसारे इंतजार न कर रहा हो। यकीन न हो तो टी टी नगर स्टेडियम के दोनों छोर पर देख सकते हैं।

सड़क बनाने वाली एजेंसियों की अलग से निंदा करना अपनी ही कलम को कलंकित करने जैसा होगा, लेकिन उनका जिक्र तो पूरे आक्रोश के साथ करना ही होगा, जिन्होंने यहां-वहां खुदाई करने के अपराध को अपना पुनीत कर्तव्य तथा अधिकार मान लिया है।

निर्माण के नाम पर ये एजेंसियां शहर के विनाश का सामान तैयार करती हैं। जिसकी जहां मर्जी हुई, वहां गड्ढा खोद दिया। फिर मामला चाहे अत्यंत व्यस्त सड़क का भी क्यों न हो।

गंभीर बात यह कि गड्ढे खोदने के बाद उन्हें भरने का भी या तो जतन ही नहीं होता, या फिर यह काम भयावह तरीके से किया जाता है। बोल्डर भर कर। यानी यदि इंसान के गड्ढे में गिरने का खतरा कम किया जाता है तो यह सुनिश्चित कर दिया जाता है कि वह भारी भरकम पत्थरों पर गिरकर या मिट्टी में फिसलकर जख्मी हो अथवा काल का ग्रास बन जाये।

क्या यह अपराध उस कृत्य से कम है, जिसके तहत देश के कई हिस्सों में असफल बोरिंग को बंद करने का कोई प्रबंध नहीं होता! फिर ऐसा होता है कि कोई मासूम बच्चा उस बोरिंग में गिरकर मौत के मुहाने पर पहुंच जाए।

यह सही है कि निर्माण कार्यों के लिए सड़क सहित अन्य स्थानों को खोदे जाने की अनिवार्यता होती है। किंतु यह भी तो सही है कि खुदाई वाले स्थान को पूरी तरह भरा जाना संबंधित एजेंसी या विभाग का जिम्मा है। तो फिर क्यों नहीं इस दिशा में सख्ती से काम हो रहा है?

कोलार में एक पूर्व सैनिक ऐसे ही एक गड्ढे में घिरकर अपाहिज हो गया। उसकी पत्नी संबंधित विभाग के खिलाफ मुकदमा लड़ रही है। लेकिन ऐसा क्यों नहीं हुआ कि खुद सरकार ने तय किया हो कि ऐसे मामले में आपराधिक प्रकरण दर्ज कर कार्रवाई की जाएगी।

क्यों नहीं ऐसा होता कि सड़क पर गड्ढे मिलने की सूरत में उस क्षेत्र के जिम्मेदार अफसर के शरीर में लोहा उतारा जाए। ऐसा किसलिए नहीं कि ऐसे जानलेवा गड्ढों की दोषी एजेंसी या ठेकेदार को कानून के कटघरे में लाया जाए।

यदि राजधानी का आलम ऐसा है तो कल्पना कीजिए कि सुदूर ग्रामीण इलाकों में दशा और कितनी भयावह होगी। जाहिर है कि शासन तथा प्रशासन के सख्त न होने के चलते ऐसी प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल रहा है। बात केवल एक मौत की नहीं है, बात यह है कि गुरूवार के हादसे ने मरे हुए सिस्टम की सड़ती लाश को सामने ला रख दिया है।

क्या हम अभिशप्त हैं कि आये दिन ऐसे हादसों को देखें और यह सोच-सोचकर जीते-जी मर जाएं कि कहीं खुद हम या कोई हमारा अपना भी इस निकम्मे तंत्र की भेंट न चढ़ जाए! सड़क जैसे जनता के लिए न हुई निकम्मे शासन-प्रशासन के बाप का माल हो गई। जब चाहे सड़क उधेड़ों और साथ में लोगों के उधड़ने का इंतजाम भी करों। लानत है।

 


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