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मोदी लहर पर सवार मध्यप्रदेश भाजपा ने अब तक का सबसे कमजोर चुनाव लड़ा है

प्रदेश लार्इव            May 20, 2019


राघवेंद्र सिंह।
लोकसभा चुनाव में सातवें चरण के मतदान के साथ ही अनुमानों का दौर शुरू हो गया। अगर मोदी का अंडर करन्ट चला तो एनडीए फिर 300 के पार पहुंच जायेगा। मध्यप्रदेश के संदर्भ में भाजपा ने अबतक का सबसे कमजोर तरीके से चुनाव लड़ा। संगठन व प्रत्याशी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी लहर पर सवार थे।

भोपाल में भाजपा प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा सिंह से बेहतर कौन जान सकता है। मुकाबला कांग्रेस के अनुभवी दिग्विजय सिंह से था और प्रज्ञा के साथ भाजपा के छोटे और मंझोले कार्यकर्ता की टीम थी। सूबे की 29 में से 24 से 27 सीटें एग्जिट पोल भाजपा के खाते में जाते हुए दिखा रहे हैं।

कांग्रेस के पास 3 सीटें है और ये आंकड़ा कांग्रेस कैम्प 10 तक पहुंचने की उम्मीद रखता है। ये मौका नतीजे आने तक भाजपा में खुशी और कांग्रेस में मायूसी वाला हो सकता है। मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनकी टीम के लिए यह अनुमान बेचैन करने वाले है।

देश के सबसे लंबी अवधि तक थका देने वाले चुनाव 19 मई की शाम खत्म हो गये। इसके साथ ही प्रदेश के 29 और देश 542 लोकसभा सीटों पर उम्मीदवारों के साथ पार्टी और देश का भाग्य भी ईवीएम में बंद हो गया है।

नतीजे भाजपा के खिलाफ गये तो विपक्ष वोटिंग मशीन पर सवाल खड़े नही करेगा। लेकिन नतीजे उनके दाये-बाये गये तो चुनाव आयोग से लेकर ईवीएम के बुरे दिन 23 मई के बाद शुरू हो जाएंगे। हम फिर भोपाल और इन्दौर की लोकसभा सीट पर फोकस कर कांग्रेस की रणनीति और भाजपा की लापरवाही पर बात करेंगे।

विधानसभा चुनाव में किसान आंदोलन से प्रभावित प्रदेश के मालवा निमाड़ अंचल में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार मजबूत रणनीति नहीं बना पाई। विधानसभा चुनाव के दौरान मंदसौर में भाजपा सरकार के चलते किसान गोली कांड का लाभ कांग्रेस नही उठा पाई थी। मंदसौर 8 विधानसभा सीटों में से 7 पर भाजपा ने जीत दर्ज की।

उस समय कमलनाथ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष थे। यह संयोग है कि वर्तमान में मुख्यमंत्री के साथ कमलनाथ अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी निभा रहे हैं। ऐसे में यदि मालवा निमाड़ और चंबल क्षेत्र में कांग्रेस कमजोर प्रदर्शन करती है तो कही न कही कमलनाथ की प्रतिष्ठा को धक्का लगेगा।

दरअसल कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव के चलते किसानों के लिए दो लाख तक की कर्ज माफी की जो घोषणा की थी उसने भाजपा बेकफुट पर धकेल दिया था इसकी कोई काट नहीं होने के कारण भाजपा ग्रामीण क्षेत्रों किसानों के वोट पाने पिछड़ गई थी इसलिये उसका विजय रथ 116 के जादुई अंक से 7 कदम पीछे 109 पर रूक गया था।

कांग्रेस ने 21 लाख किसानों कर्ज माफी की सूची जरूर सार्वजनिक की है लेकिन असल में किसानों का दो लाख तक का कर्ज पूरी तरह माफ नही हुआ है। भाजपा इस मुद्दे पर कांग्रेस को चुनावी चक्रव्यूह में फंसाने में कामयाब हुई।

यही कारण है कि मालवा के मंदसौर से लेकर निमाड़ और महाकौशल बुंदेलखण्ड से चंबल तक कमलनाथ सरकार को भाजपा ने वादे की कच्ची सरकार साबित करने का अभियान चला दिया था।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मंदसौर में एलान किया था कि कांग्रेस सरकार बनी तो दस दिनों में किसानों का कर्ज माफ नही तो मुख्यमंत्री साफ। लेकिन भाजपा ने राहुल गांधी की घाेषणा को गलत बताते हुए लोकसभा चुनाव में कहां कि 6 माह से अधिक हो गये अबतक 50 लाख किसानों का दो लाख तक का कर्जा माफ नहीं हुआ है।

राहुल गांधी की घोषणा के मुताबिक अब तक कांग्रेस के कई मुख्यमंत्री साफ हो जाने चाहिए थे। इस मुद्दे पर कांग्रेस उलझ गई और चुनाव के आखिर दौर में भाजपा के आक्रमण की बजाये किसानों की सूची सफाई देने में गुजर गया।

कांग्रेस ने जिस ढंग से विधानसभा चुनाव में किसान कर्ज माफी के मुद्दे को घर-घर तक पहुंचाया था उसकी तुलना में बेरोजगार युवाओं के लिए न्याय योजना के रूप में 72 हजार रूपए सालाना देने की बात शहर से लेकर गांव के नौजवानों तक पहुंचाने में असफल रही।

जानकार इसे कांग्रेस की कमजोर कड़ी के रूप में देख रहे हैं। विधानसभा चुनाव में यदि कांग्रेस कर्ज माफी की बात नही कहती तो भाजपा की चौथी बार सरकार बनने पर किसी को आश्चर्य नही होता।

एग्जिट पोल में जो आ रहा है उससे भाजपा संगठन की बदहाली और गहरी हो सकती है। चुनाव जीते तो संगठन की कमजोर कड़ियां बरकरार रहेंगी पार्टी में कार्यकर्ताओं की बजाय फिर ईवेंट मैनेजर और मार्केटिंग के मास्टर लोगों का बोलबाला हो जायेगा।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारकों और उनके संस्कार कमजोर होने के बाद पार्टी से विदाई की स्थिति को प्राप्त हाेते दिखेगी। इस बार चुनाव प्रबंधन बिखरा हुआ था।

जीत के पीछे प्रबंधन और विचार का मिशन कम भाजपा मोदी की पीठ पर सवार ज्यादा थी। क्योंकि प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह जबलपुर में चुनाव जीतने के लिए संघर्ष कर रहे थे हालात सुधारने के लिए मोदी की सभा करानी पड़ी।

प्रदेश प्रभारी से लेकर हाईकमान के धुरंधर यदि विधानसभा की पराजय के बाद प्रदेश में डेरा जमाते तो स्थितियां और भी बेहतर होतीं।

चुनाव हारे बड़ा ऑपरेशन होगा और तो जीते सारी कमियां नजर अंदाज कर दी जायेंगी। फिलहाल तो एग्जिट पोल को देखकर भाजपाई लड्डू बनाने का आर्डर दे रहे होंगे और जो भी हारेंगे, हमारी सहानुभूति उनके साथ है....

 


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