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खैर मनाईये! मध्यप्रदेश की राजनीति में कोई तीसरा विकल्प नहीं है

प्रदेश लार्इव            Apr 23, 2019


प्रकाश भटनागर।
कमबख्त ये बात तो हाजमोला खाने के बाद भी हजम नहीं हो पा रही। दिग्विजय सिंह कह रहे हैं कि सांसद बने तो भोपाल को ग्लोबल सिटी बनाएंगे। शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता को सुधारेंगे। सड़क, बिजली पर फोकस रहेगा। उन्होंने एक अप्रैल को यह बात कही होती तो भी ठीक था।

यह सोचकर शांत रहा जा सकता था कि मामला अप्रैल फूल का है। लेकिन वह मूर्ख दिवस गुजरने के पूरे 20 दिन के बाद ऐसा फरमा रहे हैं। इससे दो ही अनुमान लगते हैं। पहला, दिग्विजय खुद को धोखा दे रहे हैं। दूसरा, वे इस शहर की जनता को निपट मूर्ख समझ रहे हैं।

अरे भैया! पूरे दस साल इस प्रदेश की कमान आपके हाथ में रही। इसी भोपाल में बैठकर आप सरकार चलाते रहे। तब क्यों नहीं सूझा कि इसे ग्लोबल सिटी बना दिया जाए! शायद राजनीतिक पतंगबाजी में ही वह सारा समय बीत गया। यही वजह रही कि आखिर में जनता ने ऐसा पेंच मारा कि आप कटी पतंग में तब्दील हो गये।

खैर, नेतागिरी है तो वादे करने ही हैं। चुनाव है तो झूठ भी बोलना ही है। लेकिन कुछ ऐसा तो बोलिए, जो दशमलव एक प्रतिशत ही सही, किंतु सच के आसपास खड़ा नजर आये। यहां तो सच के पीछे लाठी लेकर दौड़ने वाली बात चल रही है।

आपका कहना है कि ग्लोबल सिटी से रोजगार के अवसर पाने की कोशिश की जाएगी। माफ कीजिए श्रीमान, लेकिन यह तो किन्नरों के मोहल्ले में प्रसूति गृह खोलने जैसी बात हो गयी। क्योंकि आप तो वही हैं, जिन्होने मुख्यमंत्री रहते हुए रोजगार देने नहीं, बल्कि लेने का काम किया था।

हजारों दैनिक वेतन भोगी आपकी कृपा से एक झटके में बेरोजगार हो गये थे। उनमें से कई ने इस सदमे से दम तोड़ दिया। अपनी नहीं तो कम से कम उनकी आत्मा की खातिर ऐसा मजाक न करें। क्या आपको लगता है कि पन्द्रह साल के अरसे में सब कुछ लोग भूल चुके होंगे। वैसे राजनीतिज्ञ तो मानते ही हैं कि जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है।

सब जानते हैं कि भोपाल शहर का विकास एक राजधानी के तौर पर यदि किसी ने किया तो उसका सीधा श्रेय तत्कालीन मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा और उनके खास मंत्री बाबूलाल गौर को जाता है। इस शहर को संवारने के लिए उन्होंने सीना तानकर कदम उठाए। स्थायी निर्माण से अधिक मजबूत रूप ले चुके अतिक्रमण एक-एक कर ढहा दिये।

भारत टॉकीज के सामने की व्यस्ततम सड़क यदि आज खुलकर सांस ले रही है तो उसका श्रेय पटवा और गौर को ही जाता है। रेत घाट पर बना पुल उसी सरकार की देन है। और आज जो विकास दिख रहा है उसका भी बहुत कुछ श्रेय बाबूलाल गौर और भाजपा सरकार के खाते में ही जाता है। और आप!

आपने तो हाल ही में फरमाया है कि बड़े तालाब के आसपास हो रहे निर्माण को रोकने के आप पक्षधर नहीं हैं। यानी, वही अतिक्रमण संस्कृति को बढ़ावा। भोपाल की खूबसूरती की बात भी कर रहे हैं और तालाब के आसपास अतिक्रमण और निर्माण के पक्ष में हैं। आपको तो याद होगा कि भोपाल तालाबों का शहर कहलाता था।

तालाब अगर भोपाल की जमीन से गायब हुए तो वो कांग्रेस की सरकारों का ही दौर रहा होगा। क्योंकि बीते पन्द्रह साल के पहले तो कोई और गैर कांग्रेसी सरकार पाचं साल कभी रही नहीं। खैर, मजबूरी है।

तालाब के आसपास आपके उस शिष्य का और उसके अलावा उसके पट्ठों का सर्वाधिक कब्जा है, जो हाल ही में आपको सच्चे धर्म निरपेक्ष हिंदू की उपाधि देकर गुरु दक्षिणा की एक किस्त चुकता कर चुका है। खैर, आपको यह बता दें कि ग्लोबल सिटी नामक मखमल में अतिक्रमण रूपी टाट कभी भी नहीं सुहाते।

वह किसी स्वस्थ शरीर पर कोढ़ की तरह दिखते हैं और आप इस कोढ़ को बढ़ावा देकर नासूर बनाने वाली बात करने के बाद ग्लोबल सिटी के सपने दिखा रहे हैं। धन्य हैं आप और आपकी इस बात पर यकीन कर लेने वाले।

दिग्विजय जी, भोपाल भूला नहीं है, अपनी वह पहचान जो उसे आपकी बदौलत मिली थी। आपके मुख्यमंत्री रहते हुए यह राजधानी नारकीय बिजली कटौती से जूझी। सारे प्रदेश का यही हाल था।

याद दिला दूं कि उस दौर में मशहूर हास्य कलाकार जसपाल भट्टी का इस राज्य में आना हुआ था। उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा, 'मैं कार से यहां तक आया। रास्ते में गड्ढों के बीच कहीं-कहीं सड़क होने का अहसास भी हो रहा था।' वह गड्ढे इस प्रदेश को आपकी देन थे।

यूं ही नहीं हो गया कि 'मिस्टर बंटाधार' और 'वाह मुख्यमंत्री जी! आप लाल बत्ती में और जनता मोमबत्ती में' वाले नारे को प्रदेश के मतदाता ने हाथों-हाथ लेकर आपको सत्ता से बाहर धकेल दिया था।

एक दशक के मुख्यमंत्रित्वकाल में आपने चाहे जो संतुष्टी हासिल की हो, लेकिन आपके किए का असर ऐसा रहा कि आपको हराने के बाद इस राज्य की जनता ने पूरे पंद्रह साल तक आपकी पार्टी पर यकीन करने में संकोच किया।

यहां तक कि इस अवधि के बाद, एंटी इंकम्बैंसी की भीषण आंधी के बावजूद मतदाता ने कांग्रेस को बहुमत नहीं दिया है। कमलनाथ की लंगड़ी सरकार वस्तुत: आपकी करतूतों की परिणति है।

कांग्रेस को आपके शासनकाल की प्रेत छाया से पूरी तरह बाहर आकर इस राज्य में पूरी तरह अपने पांव पर खड़ा होने के लिए अभी और संघर्ष करना होगा।

आपने कल फरमाया, मैंने कभी नर्मदा यात्रा का प्रचार नहीं किया। आज आपने याद दिलाया कि राघोगढ़ मंदिर की परिक्रमा, दशकों गोवर्धन परिक्रमा और पंढरपुर दर्शन का प्रचार नहीं किया तो यह बता कर आप क्या कर रहे हैं?

आप शायद भूल रहे हैं कि कुछ समय पहले ही आपने भाजपा नेताओं को चुनौती देते हुए कहा था कि वह आपकी तरह यह यात्रा करके दिखा दें! इस पूरी यात्रा के दौरान आप मीडिया से मिले। राजनीतिक बातचीत की। उस पर तुर्रा यह कि इसका प्रचार नहीं किया!

कितना झूठ! सच कहूं तो हिंदुत्व वाली बात को लेकर भी आपके दावे में मुझे सुराख दिख रहे हैं। पता नहीं आपके जासूसी तंत्र ने यह बात आप तक पहुंचायी थी या नहीं। मुख्यमंत्री पद से आपकी रुखसती के बाद एक अखबार ने भोपाल में संवाद कार्यक्रम किया था।

सीताराम येचुरी उसमें शामिल हुए। वहां वक्ता के तौर पर एक ऐसे वरिष्ठ पत्रकार भी थे, जो आपकी सरकार में राज्य मंत्री का दर्जा पा चुके थे। उन्होंने मंच से कहा था, 'मैंने दिग्विजयजी को कई बार कहा कि वह सरस्वती शिशु मंदिरों में दी जा रही एक खास किस्म की शिक्षा पर रोक लगायें। लेकिन मुझे बहुत दु:ख है कि कई बार इस ओर ध्यान दिलाए जाने के बावजूद उन्होंने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया था।

जबकि ये स्कूल साम्प्रदायिक किस्म की शिक्षा का प्रसार कर रहे थे।' दिग्विजय सिंह जी, आप तो तेज याददाश्त के धनी हैं। वह सज्जन कौन हैं, आपको तुरंत याद आ जाएगा। तो समय निकालकर एकाध बार उनसे मिलकर पुरानी यादें ताजा कर लीजिए।

हमें तो खैर आपका हिंदुत्व के प्रति विरोध साफ समझ आ रहा है। हो सकता है कि इस मुलाकात के बाद आपके कुछ फंडे भी साफ हो जाएं।

दिग्विजय सिंह जी, आप और कांग्रेस के दूसरे तमाम नेता भी, अपने को हिंदू होने की होड़ में शामिल हो कर अल्पसंख्यकों के साथ छलावा नहीं कर रहे हैं क्या? अभी पांच साल पहले तो आप उनके सबसे बड़े हितेषी थे। इतने कि दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी औसामा बिन लादेन को भी ओसामा जी कहते थे।

मुस्लिम धर्मगुरू और संदिग्ध गतिविधियों में शामिल जाकिर हुसैन आपके बगलगीर होते थे। मुंबई हमले पर आपको जांच की जरूरत महसूस होती थी। सोनिया गांधी को आप आजमगढ़ लेकर जाते थे लेकिन मोहन चंद शर्मा की शहादत आपको दिखाई नहीं देती थी और हेमंत करकरे की आतंकवादियों के हाथों शहादत में आपको शंका होती थी क्योंकि उन्होंने आपको बताया था कि उन्हें हिन्दू आतंकवादियों से धमकियां मिल रही है।

अब ये अलग बात है कि जनता की याददाश्त आपको कमजोर लगती हो लेकिन अब सबकी भी नहीं होती। हिन्दू होने के फेर में आप मुस्लिमों की समस्याओं और तकलीफों पर बात ही नहीं कर रहे हैं।

उन्हें लगता है पूरी कांग्रेस ने अकेला छोड़ दिया है। क्योंकि आपको लगता है आखिर ये भाजपा के पास तो जाने से रहे, कांग्रेस के अलावा जाएंगे कहां? खैर मनाईए, मध्यप्रदेश की राजनीति में कोई तीसरा विकल्प नहीं है।

 


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