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समाज में सकारात्मक पक्ष सामने लाएं पत्रकार: राज्यपाल

वामा, मीडिया            Aug 11, 2018


सप्रे संग्रहालय में आधी दुनिया की पत्रकारिता पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ

मल्हार मीडिया ब्यूरो। भोपाल। राज्यपाल आनंदीबेन पटेल का कहना है कि पत्रकारों को समाज में सकारात्मक पक्ष को सामने लाना चाहिए। इससे एक स्वस्थ वातावरण बनेगा जो देश तथा समाज को प्रगति के पथ पर ले जाने में सहायक होगा। राज्यपाल आज सप्रे संग्रहालय के सभागार में महिला पत्रकारिता पर एकाग्र राष्ट्रीय संगोष्ठीपत्रकारिता में आधी दुनिया के शुभारंभ अवसर पर बोल रही थीं। दो दिनी इस संगोष्ठी का आयोजन माधवराव सप्रे स्मृति समाचार एवं शोध संस्थान द्वारा महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के सहयोग से किया जा रहा है। शुभारंभ सत्र की अध्यक्षता हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र कर रहे थे। इस अवसर पर माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति जगदीश उपासने तथा कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय,रायपुर के कुलपति डा.मानसिंह परमार विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद थे।

अपने उद्बोधन में राज्यपाल ने आगे कहा कि आज जीवन के सभी क्षेत्रों में महिलाएं आगे हैं। खुशी की बात यह है कि वे आत्मनिर्भर बन रही हैं। ऐसी बातों को मीडिया में जगह मिलनी चाहिए जिसे पढ़कर या सुनकर और लोग भी आगे बढऩे के लिए प्रेरित हों। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस संगोष्ठी से निकले निष्कर्षों का लाभ नई पीढ़ी को मिलेगा।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि पत्रकार, पत्रकार होता है उसका स्त्री या पुरुष में विभाजन नहीं किया जा सकता। मीडिया की दुनिया में इलेक्ट्रानिक मीडिया ने चमत्कारी परिवर्तन किए हैं। इसके अच्छे और बुरे दोनों ही पक्ष हैं। लेकिन पत्रकारिता समाज का विवेक जाग्रत करने वाली होती है। इसलिए उसमें प्रतिकार करने की क्षमता भी पैदा करनी चाहिए। उन्होंने मीडिया में बाजारवाद के प्रभाव तथा आज के दौर के नए मीडिया सोशल मीडिया के दुरुपयोग पर चिंता जताई। कार्यक्रम के विशेष अतिथि जगदीश उपासने ने कहा कि दीगर क्षेत्रों की तरह मीडिया में भी आज महिलाएं बड़ी संख्या में आ रही हैं। स्त्री प्रकृति से ही संवेदनशील होती है जिसका प्रभाव उसकी रिपोर्टिंग पर भी दिखाई देता है। अखबार के दफ्तरों में साथ काम करते-करते पुरुषों का नजरिया भी बदला है और वे उसे एक सहकर्मी की तरह स्वीकारने लगे हैं। उन्होंने भी स्त्री-पुरुष के भेद को गैरजरूरी बताया। कार्यक्रम के दूसरे विशेष अतिथि डा मानसिंह परमार का मत था कि आज मीडिया में महिलाओं की संख्या बढ़ी है। जिस तरह से वे भागीदारी कर रही हैं उससे लगता है कि आने वाले समय में मीडिया भी बच्चियों के लिए सुरक्षित भविष्य का साधन बनेगा। विषय प्रवर्तन करते हुए पत्रकार प्राध्यापक डा. वर्तिका नंदा ने कहा कि मीडिया में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के बीच 'मीडिया के भीतर की महिला और मीडिया के बाहर की महिलाÓ यह भी चर्चा के केन्द्र में है। इस पर भी विचार की जरूरत है। उन्होंने मीडिया में महिलाओं के प्रवेश के इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि इलेक्ट्रानिक मीडिया महिलाओं के सौंदर्य के प्रति भले ही संवेदनशील रहा हो लेकिन चैनलों के आने के बाद महिला पत्रकारों को राजनीति, अपराध जैसी बीट में भी भेजा जाने लगा है। आज प्रबंधन के अन्य ओहदों पर भी महिलाएं काबिज हो रही हैं। न्यूजरूम में भी उनकी भागीदारी बढ़ रही है। इतना ही नए युग के मीडिया के बाद छोटे शहरों और गांवों में भी महिलाएं जुड़ रही हैं। यह जुड़ाव सार्थक मुकाम तक पहुंचाएगा।

सप्रे संग्रहालय के संस्थापक-संयोजक विजयदत्त श्रीधर ने प्रस्तावना वक्तव्य देते हुए बताया कि आयोजन के पीछे उद्येश्य यही है कि पत्रकार को पत्रकार के रूप में ही पहचाना जाए न कि स्त्री-पुरुष पत्रकार का भेद विभेद हो। दोनों के प्रति समान दृष्टि विकसित हो। संगोष्ठी के विमर्श और निष्कर्षों का पुस्तक के रूप में दस्तावेजीकरण किया जाएगा। उन्होंने संग्रहालय में संजोई गई संपदा का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां करीब 500 साल पुरानी पांडुलिपियां तथा 200 साल पुराने पत्र-पत्रिकाएं संरक्षित हैं। समाज के विभिन्न लोगों द्वारा अब तक करीब 5 करोड़ पृष्ठों की सामग्री भेंट की गई है। यह संग्रहालय शोधार्थियों के लिए एक तरह के तीर्थ के समान है। आरंभ में संग्रहालय की ओर से प्रकाशित पुस्तक ग्रामीण पत्रकारिता का विमोचन भी हुआ। मासिक पत्रिका आंचलिक पत्रकार की प्रति निदेशक मंगला अनुजा ने भेंट की। आभार प्रदर्शन करते हुए कोलकाता से आए कृपाशंकर चौबे ने कहा कि सप्रे संग्रहालय केवल पत्र-पत्रिकाओं का संग्रह स्थली ही नहीं है बल्कि ज्ञान का खजाना है। यहां आए बिना पत्रकारिता का शोधकार्य मानो अधूरा ही है। कार्यक्रम का संचालन रंजना चितले ने किया। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार महेश श्रीवास्तव, हिन्दी सेवी कैलाशचंद्र पंत, इतिहासविद् शंभूदयाल गुरु, पत्रकार राजेश बादल, ब्रजेश राजपूत सहित हिन्दी विवि वर्धा, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल तथा कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय,रायपुर के विद्यार्थी उपस्थित थे।

राज्यपाल को भेंट की गई चित्रकृति
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि राज्यपाल आनंदीबेन पटेल को अद्भुत चित्रकृति भेंट की गई। वर्ष 1933 में प्रदेश की यात्रा पर आए महात्मा गांधी जब नरसिंहपुर जिले के बरमान घाट से नौका द्वारा नर्मदा पार करना चाह रहे तो नाविक ने बिना पांव पखारे नाव में बैठाने से इंकार कर दिया था। तब बापू की दुविधा थी कि नर्मदा के जल से पैर कैसे धो सकता हूं। ऐसे में वहां मौजूद बुजुर्गों ने समाधान निकाला कि पहले आप नर्मदा के चरण स्पर्श कर लें उसके बाद नाविक आपके पांव धो लेगा। बापू के नर्मदा पूजने के बाद नाविक ने उनके चरण पखारे और नर्मदा पार कराया। बापू के साथ चल रहे उस समय के युवा स्वतंत्रता सेनानी पं. सुंदरलाल श्रीधर ने बाद की पीढ़ी को यह प्रसंग सुनाया था उसी आधार पर कला शिक्षक नीलेश उपाध्याय ने इसे रंग रेखाओं में उकेरा। यह चित्रकृति माधुरी श्रीधर और नीता ने राज्यपाल को भेंट की।

राज्यपाल की नई पहल
राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने कार्यक्रमों में फूलों से स्वागत् करने के स्थान पर फलों से स्वागत् करने की नई परंपरा डाली है। यह फल आंगनबाड़ी के बच्चों के लिए पौष्टिक आहार के रूप में काम आते हैं। इस परंपरा का पालन यहां भी किया गया, जिसके तहत संग्रहालय के उपाध्यक्ष राजेन्द्र हरदेनिया तथा राकेश दीक्षित ने राज्यपाल को फलों से भरी टोकर भेंट की। अंत में स्वयं राज्यपाल ने अपने हाथों से बच्चों में फल वितरित किए।



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