स्त्री अस्मिता के सम्मान को खारिज करता खास पैटर्न, महिला पत्रकार बिरादरी की पवित्रता पर सवाल

वामा, मीडिया            Apr 21, 2018


अजय बोकिल।
संभव है कि कुछ लोग इसे किसी खास विचारधारा अथवा दल के खिलाफ चलाया गया अभियान मानें, लेकिन जो घटनाएं घट रही हैं, उनमें छिपे संदेशों में एक ‘खास पैटर्न’ पढ़ा जा सकता है। ऐसा पैटर्न जो हमारे वास्तविक सांस्कृतिक आग्रहों को खारिज करता है।

यानी एक अोर स्त्री की आरती उतारने आग्रह तो दूसरी अोर स्त्रीत्व की अस्मिता को तार-तार करने की राक्षसी सोच। यह उस पुरूष मानसिकता का प्रतीक भी है, जो आज भी स्त्री को भोग्या रूप में ही देखने की आदी है।

संयोग से ये सभी घटनाएं मीडिया और उससे जुड़ी महिला पत्रकारों से सम्बन्धित हैं और एक पखवाड़े के दौरान की हैं।

यूं मीडिया में महिला पत्रकारों के लिए काम करने की ‍स्थितियां और चुनौतियां अन्य कई क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा कठिन रही हैं। इसके बावजूद महिलाएं दमदारी से इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं। यही बात शायद दकियानूसी सोच वालों को रास नहीं आ रही।

स्त्री के प्रति यह असम्मान अथवा उसे गुलाम समझने का ताजा सिलसिला तमिलनाडु के राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित द्वारा एक महिला पत्रकार के गाल पर ( दादाजी के भाव से) हाथ फेरने और उस पत्रकार द्वारा गहरी नाराजी जताए जाने पर माफी मांगने से शुरू होती है।

बीते मंगलवार की शाम चेन्नई में एक प्रेस कॉन्फ्रेन्स में जब एक महिला पत्रकार ने राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित से एक अहसज करने वाला सवाल पूछा तो जवाब देने के बजाए महामहिम उस महिला पत्रकार का गाल सहलाने लगे। अंग्रेजी मैग्जीन के लिए काम करने वाली इस पत्रकार ने राज्यपाल से राज्य के मदुराई विवि में डिग्री दिलवाने के बदले सेक्स डिमांड से जुड़ा सवाल पूछा था।

बनवारीलाल पुराने कांग्रेसी हैं। वे नागपुर में कांग्रेस से एमपी, एमएलए रहे। कांग्रेस में उनको महत्व कम मिलने लगा तो वे राम लहर में भाजपा में आ गए। बाद में उनके भाजपा नेता स्व. प्रमोद महाजन से गंभीर मतभेद हुए तो कांग्रेस में लौट गए। कांग्रेस में भाव नहीं‍ ‍मिला तो पुरोहित ने अपनी ‘विदर्भ राज्य पार्टी’ बनाई।

वहां भी कामयाबी नहीं मिली तो वे फिर भाजपा में आए। भाजपा ने उनकी ‘बहुविध प्रतिभा’ को देखकर दो साल पहले असम का राज्यपाल बना दिया। एक साल बाद ही वे तमिलनाडु के राज्यपाल बना दिए गए।

कहा जा सकता है कि पुरोहित मूल रूप से भाजपा संस्कृति के नहीं हैं, शायद इसीलिए उन्होंने पोती समान पत्रकार से ‘स्नेह जताने’ का यह (अशोभनीय) तरीका चुना। लेकिन आश्चर्य यह कि पुरोहित के इस ‘स्नेह प्रदर्शन’ के समर्थन में राज्य के भाजपा नेता एस.वी. शेखर आगे आए।

उन्होंने अपने ब्लाॅग में पूरी महिला पत्रकार बिरादरी की पवित्रता पर ही सवाल खड़े कर दिए। शेखर ने बेहद अभद्र ढंग से कहा कि कोई भी महिला बड़े लोगों के साथ सोए बिना न्यूज रीडर या रिपोर्टर नहीं बन सकती। उन्होंने तिरूमलाई नामक एक व्यक्ति की पोस्ट भी शेयर की।

इसमें लिखा गया कि ‘हाल ही में की गई शिकायतों से कड़वी सच्चाई बाहर आ चुकी है। इन (गाली) महिलाओं ने गवर्नर पर सवाल उठाए हैं। मीडिया के लोग तमिलनाडु के तुच्छ, नीच और असभ्य जन हैं। कुछ अपवाद हैं। मैं सिर्फ उनकी इज्जत करता हूं, अन्यथा तमिलनाडु का पूरा मीडिया अपराधियों, धूर्तों और ब्लैकमेलर्स के हाथ में है।‘

इस पोस्ट से चेन्नई का पूरा मीडिया भड़क उठा। पत्रकारों ने इस टिप्पणी के खिलाफ प्रदर्शन कर अपना कड़ा विरोध जताया। तिरूमलाई नामक यह व्यक्ति कट्टर भाजपा समर्थक बताया जाता है। जब पोस्ट पर बवाल मचा तो शेखर ने पोस्ट डिलीट कर दी। उधर फेसबुक ने भी शेखर को ब्लाॅक कर दिया।

एक और मामला एनडीटीवी डाॅट काॅम पर एक महिला पत्रकार के ब्लाॅग से उजागर हुआ। इस पत्रकार के मुताबिक मोदी सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री ( नाम स्पष्ट नहीं है) ने कुछ हफ्ते पहले उसकी देह दशा पर पैनी नजर डालते हुए कहा कि वो मोटी हो गई है।

पत्रकार के मुताबिक मंत्री ने यह कमेंट एक आॅ‍फिशियल इवेंट को कवर करने के दौरान किया। जिस वरिष्ठ मंत्री ने यह कमेंट किया उसकी महिला पत्रकार से कोई आत्मीयता भी नहीं थी। मंत्री की इस अप्रत्याशित टिप्पणी से झेंपी महिला पत्रकार ने धीमी और लड़खड़ाती आवाज में प्रतिप्रश्न किया- सच में?

इसी संदर्भ में एक चौंकाने वाली रिपोर्ट एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स(एडीआर) की आई। इसमेंं तथ्यों के साथ बताया गया है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में सबसे ज्यादा सत्ताधारी बीजेपी के सांसद और विधायक शामिल हैं। दूसरे दलों की तुलना में पार्टी ने ऐसे लोगों को ज्यादा टिकट भी दिए।

हालांकि बसपा मुखिया मायावती और तृणमूल कांग्रेस मुखिया ममता बनर्जी ने भी महिलाओं के खिलाफ उत्पीड़न के आरोपियों को काफी संख्या में टिकट बांटे। ये चौंकाने वाले आंकड़े कुल 4896 सांसदों और विधायकों में से 4845 लोगों के चुनाव लड़ने के दौरान जमा हलफनामे की जांच के बाद सामने आए।

इनमें बीजेपी के सबसे ज्यादा 12 सांसद-विधायकों के खिलाफ महिलाओं से जुड़े अपराध के मामले में मुकदमा चल रहा है। दूसरे नंबर पर शिवसेना के 7 और फिर तृणमूल कांग्रेस के 6 सांसद विधायक हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 327 ऐसे लोगों को टिकट दिए गए, जिनके खिलाफ महिलाओं से जुड़े मामलों की सुनवाई चल रही थ। पिछले पांच वर्षों के बीच भाजपा ने 45 ऐसे लोगों को टिकट दिए।

यहां मुद्दा किसी पर लांछन लगाने की बजाए, उस प्रवृत्ति को उजागर करना है, जो संस्कृति की दुहाई देते-देते सत्ता के महासागर में डूब कर उद्दंडता, स्त्री अस्मिता से खिलवाड़ और उसके अपमान में गर्व महसूस करने लगती है।

वरना क्या कारण है कि एक राज्यपाल किसी सवाल का जवाब महिला पत्रकार के गालों को सहला कर देने लगे? इसका क्या औचित्य था? भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों द्वारा आशीष देने, स्नेह जताने के शालीन और मर्यादित तरीके हैं, इनमें किसी युवती के गाल सहलाना कहीं से भी शामिल नहीं है। और फिर राज्यपाल के कृत्य को जायज ठहराने पूरी महिला पत्रकार‍ बिरादरी के स्त्रीत्व की पवित्रता पर सवालिया निशाना लगाना कौन-सी सोच दर्शाता है?

एक अन्य महिला पत्रकार से मंत्री द्वारा उसकी देह को लेकर टिप्पणी किस मानसिकता और संस्कार को दर्शाती है? इसका अर्थ नहीं कि यह सब पहली बार हुआ है, पहले भी हुआ होगा लेकिन तब संस्कृति के ढोल इतनी ऊंची आवाज में सुनाई नहीं देते थे।

माना कि ऐसे कुछ लोग ही होंगे, लेकिन तालाब के पानी को सड़ांध में बदलने वाली इन चंद मछलियों को सही ठहराने और उन्हें बचाने की कुचेष्टा क्या संदेश देती है? जरा सोचिए!
‘राइट क्लिक’

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और उनका यह आलेख ‘सुबह सवेरे’ में ‍ 21 अप्रैल 2018 को प्रकाशित हुआ है।

 


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