लड़का दूसरे मजहब में शादी करे तो किसी को एतराज नहीं है, वह एक प्रॉपर्टी लेकर आता है

वामा, खरी-खरी            Feb 10, 2018


राकेश कायस्थ।
कहानी वही पुरानी है सिर्फ़ किरदारों के नाम बदल गए हैं। दिल्ली के नौजवान अंकित सक्सेना की आंखों में हजारों सपने थे और दिल में था एक लड़की के लिए बेइंतहा प्यार. लड़की का नाम सलीमा था। दोनों जल्द ही शादी करने वाले थे। इश्क का कोई मजहब नहीं होता लेकिन, इश्क करने वाले भूल जाते हैं कि नफरत करने वालों का भी कोई मजहब नहीं होता। वे अपने ही मां-बाप और भाई-बहन हो सकते हैं।

जिस वक्त सलीमा दिल्ली के एक मेट्रो स्टेशन पर अंकित का इंतजार कर रही थी, उसी वक्त उसके मां-बाप और मामा उसके सपनों के राजकुमार का गला रेत रहे थे। जी हां वेलेंटाइन डे के दस दिन पहले प्रेमी नौजवान अंकित तड़पा-तड़पाकर मार दिया गया। अंकित के हत्यारों में उसकी होनेवाली पत्नी का नाबालिग भाई भी था। कहां से आई एक 15-16 साल के लड़के के मन में इतनी नफरत?

ऐसी ही एक घटना कोई दो महीने पहले बिहार में भी हुई थी। स्कूल में पढ़ने वाले दो बच्चों का `टीन एज अफेयर’ था। यहां भी लड़का हिंदू और लड़की मुसलमान थी। बच्चों के मामले को बातचीत से सुलझाया जा सकता था। लेकिन लड़के को धोखे से बुलाकर उसकी निर्मम हत्या कर दी गई।

ये दोनों घटनाएं उन लोगों को राहत दे सकती हैं कि जो शंभुलाल रैगर जैसे हत्यारे के पक्ष में कैंपेन चलाते हैं। पर ज़रा क्या अंकित के हत्यारों और शंभुलाल रैगर में कोई फर्क है?

पिछले दिनों राजस्थान से एक बेहद ख़ौफ़नाक वीडियो सामने आया था। `लव जेहाद' का इल्जाम लगाकर शंभुलाल रैगर नाम वाले एक व्यक्ति ने बंगाल से मजदूरी करने आए एक मुसलमान मजदूर को कुल्हाड़ी से काट डाला। रैगर ने इस हत्या का वीडियो बनाया और उसे सोशल मीडिया पर भी डाला।

गिरफ्तारी के बाद हुई जांच से जो कहानी निकलकर आ रही है, उसके मुताबिक रैगर की अपनी कथित मुंहबोली बहन से शारीरिक संबंध थे और मृतक को इसकी जानकारी थी। जिसकी वजह से उसकी हत्या हुई। अंतिम सच क्या है, यह तो अदालती फैसले के बाद ही साफ हो पाएगा। लेकिन जो सच स्थायी है, वह बताता है कि धर्म के आधार पर नफरत की जड़ें इस समाज में किस कदर गहरी हैं।

सबसे हैरानी की बात थी रैगर के समर्थन में आवाजों का उठना। कई लोग सोशल मीडिया पर रैगर के `कारनामे’ की खुलकर तारीफ कर रहे थे। उसकी मदद के लिए बकायदा चंदा इकट्ठा किया जा रहा था। हरकत कितनी भी `नीच’ हो, लेकिन मरने वाला दूसरे समुदाय से है, इसलिए हत्यारे को हीरो के रूप में स्थापित किया गया। आखिर यह सोच समाज को कहां ले जाएगी?

रैगर और अंकित के हत्यारों के नाम और मजहब अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन दोनों में कोई बुनियादी अंतर नहीं है। जो समाज दोनों घटनाओं को मजहबी नजरिए से अलग-अलग करके देखता है, उससे इस बात की उम्मीद करना बेमानी है कि वह नफरत की संस्कृति के खिलाफ एकजुट होकर लड़ पाएगा।

हम इतनी विकृत मानसिकता के हैं कि औरतों को प्रॉपर्टी समझते हैं फिर चाहे वो घर की हों या बाहर की

सलीमा का कसूर यह था कि उसने एक हिन्दू लड़के से प्यार किया। लेकिन क्या अगर सलीमा का भाई किसी हिंदू लड़की से प्यार करता, तब भी वह अपने मां-बाप की नज़रों में उसी तरह कसूरवार होता? क्या आपने कभी हिंदू संगठनों को किसी ऐसे मामले में गला-फाड़ते देखता है, जिसमें लड़की मुसलमान और लड़का हिंदू हो? ऐसे मामले ढूंढे से भी नहीं मिलेंगे यही है हमारे महान भारतीय समाज की पुरुष प्रधान कबीलाई मानसिकता, जो औरत को संपत्ति से ज्यादा कुछ नहीं समझती।

लड़की हिंदू हो या मुसलमान उसका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। चुनने की स्वतंत्रता और उसकी यौनिकता तक परिवार और समाज के हवाले है। प्रॉपर्टी दान में दी जाती है, प्रॉपर्टी ट्रांसफर की जाती है, लेकिन `प्रॉपर्टी’ अपने बारे में कोई फैसला नहीं कर सकती। स्वेच्छा से भी जो लड़कियां दूसरे मजहब में शादी करती हैं, उन्हे अपने पति का ही धर्म स्वीकार करना पड़ता है। विधर्मी लड़की के स्वधर्म में आने पर किसी को परेशानी नहीं होती है। परेशानी तब होती है, जब अपनी लड़की जाये। यह एक बहुत बड़ा कड़वा सच है कि औरतें धर्म की सत्ता को बनाये रखने के लिए सिर्फ़ एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल की जाती हैं।

लड़का दूसरे मजहब में शादी करे तो किसी को एतराज नहीं है, क्योंकि वह एक `प्रॉपर्टी’ लेकर आता है। अगर लड़का शादी न करे और सिर्फ लड़की से संबंध रखे तब भी कोई एतराज नहीं है। लेकिन एतराज तब होता है, जब लड़की अपने समाज की हो।

विधर्मियों के प्रति घृणा का पहला शिकार हमेशा औरते ही होती हैं। सांप्रादायिक दंगों के दौरान अनगिनत सामूहिक बलात्कार की घटनाएं और गर्भवती स्त्री का पेट चीर देने की घटनाएं इस मानसिकता की पुष्टि करती हैं।

सिस्टम भी औरत को कंट्रोल करना चाहता है
धार्मिक पूर्वाग्रह और स्त्री के वजूद को पूरी तरह नकारने की यह मनोवृति केवल समाज की ही नहीं है। अक्सर पुलिस, जांच एजेंसी और न्याय देनेवाली संस्थाएं भी इस पूर्वाग्रह का शिकार नज़र आती हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण केरल का अखिला उर्फ हादिया प्रकरण है। 24 साल की अखिला अशोकन होम्योपैथी की छात्रा थी। उसने भागकर अपने प्रेमी से शादी कर ली, जो एक मुसलमान था।

अखिला ने बाद में धर्म-परिवर्तन करके अपना नाम हादिया रख लिया। अगर समाज पुरुष प्रधान नहीं होता तो क्या अखिला धर्म-परिवर्तन करती? अखिला उर्फ हादिया एक व्यस्क है, इसलिए यह सवाल बेमानी है। लेकिन शादी के बाद जो कुछ हुआ वह बताता है कि सिस्टम भी किस तरह एक औरत के वजूद को नकारता है और उसे अपने नियंत्रण में रखना चाहता है। हादिया के पिता ने पुलिस से शिकायत की। सरकार ने माना कि यह मुद्दा इतना बड़ा है कि उसकी जांच एनआईए जैसी संस्था से कराई जानी चाहिए।

केरल हाईकोर्ट ने इस मामले में एनआईए की जांच का हवाला देकर कहा कि हादिया को फुसलाया गया है। कोर्ट ने उसकी शादी रद्द कर दी और हादिया को उसके पिता के हवाले कर दिया। यह अपने आप में एक अनोखा फैसला था, जब एक बालिग औरत की शादी तुड़वाने का फैसला अदालत ने दिया और उसकी मर्जी के ख़िलाफ़ उसे पिता के हवाले कर दिया।

हादिया के पति ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने फ़ैसला दिया कि अखिला उर्फ हादिया को अपना जीवन साथी चुनने और अपनी इच्छा से किसी भी मजहब को मानने का अधिकार है। इसलिए उसकी शादी को अवैध नहीं ठहराया जा सकता है। यह घटना अपने आप में एक बहुत बड़ी केस स्टडी है जो यह बताती है कि हमारे पूरे तंत्र में एक औरत का वजूद क्या है।

विभाजनकारी मानसिकता से ग्रसित तबके एक ही जैसी दो घटनाओं पर अलग-अलग तरीके से रीयेक्ट करते हैं। एक घटना उनका मान बढ़ती है और दूसरी घटना से उनकी इज्ज़त जाती है। समाज भूल जाता है कि प्रेम और यहां तक कि स्वेच्छा से बने आपसी संबंध भी दो व्यस्क लोगो का व्यक्तिगत मामला है। इस मामले में किसी तीसरे व्यक्ति को दखल देने का कोई हक नहीं है, चाहे वह कितना भी करीबी रिश्तेदार क्यों न हो।

अंकित नफ़रत का शिकार लेकिन सलीमा कौन?
सोशल मीडिया अंकित सक्सेना हत्याकांड से रंगा हुआ है। एक सभ्य समाज को इस तरह की घटनाओं का विरोध करना भी चाहिए। लेकिन सलीमा पर ज्यादा बात नहीं हो रही है। एक लड़की जिसकी आंखों में भविष्य के सपने थे। उसके अपनों ने ही उसके सपनों का बेरहम कत्ल कर दिया। सलीमा ने फिर भी हिम्मत दिखाई और मीडिया के सामने आकर सच कहा।

क्या उदार भारतीय समाज को सलीमा से कोई हमदर्दी है? क्या किसी ने एक लड़की के भविष्य के बारे में सोचा जो अपने भावी जीवन साथी को खो चुकी है। मां-बाप जेल में होंगे। अगर छूट भी जाएं तो वह हत्यारों के बीच में कैसे रहेगी? सलीमा के वीडियो खुलेआम सोशल मीडिया पर चल रहे हैं जिसमें वह पूरी घटना बता रही है। क्या अलग-अलग धर्मों के ठेकेदार अब उसे चैन से जीने देंगे? जिस दिन हम इस तरह की घटनाओं को सलीमा जैसी लड़कियों के नज़रिए से भी देखना सीख जाएंगे उस दिन सचमुच यह समाज सभ्य हो जाएगा।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और यह आलेख उनकी फेसबुक वॉल से लिया गया है

 


Tags:

नफरत-का-भी-मजहब-नहीं-होता

इस खबर को शेयर करें


Comments