शादियों के कूड़ाघर में सड़ते विवाहेतर संबंध

वामा            Oct 30, 2017


दिलीप सी मंडल।
भारत अपनी अंतर्वस्तु में एक अनैतिक समाज है, यहां नैतिकता का बोझ औरत उठाती है और पुरुष पर कोई नियम लागू नहीं होता। कुल मिलाकर पूरा समाज एक कचरे का ढेर है। पूरी अराजकता है। कचर-कचर मचा हुआ है। गांव, कस्बा, शहर हर जगह किस्से ही किस्से हैं।
पश्चिम में कमिटमेंट की निशानी के तौर पर औरत और मर्द दोनों आम तौर पर एक अंगूठी के अलावा कुछ नहीं पहनते।

पश्चिम में लगभग हर विवाहेतर संबंध का अंत तलाक में होता है। भारत में शादियों के अंदर कूड़ाघर पलता है, जहां कई विवाहेतर संबंध सड़ते रह सकते हैं।

भारत में शादी या रिश्ते में होने की सारी निशानियां औरतों को पहननी होती हैं। सिंदूर, मंगलसूत्र, बिछिया, शांखा, पोला, बिंदी, खास तरह के गहने, लोहे का कड़ा। भारत के अलग— अलग हिस्से में अलग—अलग चीजें पहचान के लिए हैं।

मतलब कि आप भारत में विवाहिता औरत को पहचान सकते हैं वहीं, विवाहित पुरुष सांड है, जहां चाहे मुंह मार ले। नैतिकता का कोई बोझ उस पर नहीं है क्योंकि, पत्नियां आम तौर पर आर्थिक रूप से उन पर निर्भर हैं, इसलिए वे इन छुट्टा सांड को झेलने के लिए मजबूर हैं।

ऐसे में जब एक रिपोर्टर ने कंगना राणावत से पूछा कि, शादीशुदा से प्यार क्यों किया? तो यह गलत सवाल था। इससे बड़ा सवाल है, उस शादीशुदा कमीने रितिक ने पत्नी को धोखा देते हुए कंगना से प्यार का नाटक क्यों किया? लड़की ने कम से कम प्यार तो किया। उस आदमी का क्या जिसने घर में बीवी बच्चों के रहते, 'प्यार का नाटक' किया।

महिलाओं के लिए विवाहेतर संबंध में रहना अक्सर आर्थिक, सुरक्षात्मक या भावनात्मक मजबूरी है। भारत में ज्यादातर महिलाएं करियर, नौकरी या पैसे के अभाव में विवाहेतर संबंध में जाती हैं। मुख्य कारण आर्थिक होता है। पुरुष ऐसी महिलाओं का आखेट करते हैं। ऐसी महिलाएं वे खोजते रहते हैं। यह कोई दूर देश की कथा नहीं है। यह हो नहीं सकता कि आप अपने आसपास ऐसे दस लोगों को न जानते हों। वे बड़े मेहनती लोग हैं। They try very hard.

इस आखेट के लिए वे नारीवादी बन सकते हैं। प्रगतिशील बन सकते हैं। वे कुछ भी बन और कर सकते हैं। इसे वे अपनी मर्दानगी की सफलता मानते हैं। मजबूर औरतों के साथ ऐसे संबंधों को वे ट्रॉफी की तरह सजाते हैं। दोस्तों के बीच चटखारे लेकर बताते हैं कि कितनी महिलाओं को फतह किया।

पुरुषों से लिए यह सांडपंथी है। विवाहेतर संबंधों में स्त्री और पुरुष की लोकेशन अलग है, इसलिए दोनों का दोष समान नहीं है। इस मामले में यूरोपीय और अमेरिकी समाज बहुत नीतिवान है। वहां के मेरे सारे दोस्त यही बताते हैं कि वहां विवाहेतर संबंध को लेकर जीरो टॉलरेंस हैं। औरतें अक्सर इस आधार पर तलाक देती हैं और तलाक मिल भी जाता है।

वहां यह सुविधा जरूर है कि तीन या चार बार तलाक देने वाली महिलाओं के लिए भी नया वैवाहिक जीवन शुरू करने का विकल्प होता है, तलाक वहां स्टिग्मा यानी अपमान बोधक नहीं है, सामान्य बात है। अलग होने की आसान सुविधा के साथ यूरोप हमसे ज्यादा नैतिक है।
भारत संबंधों के मामले में सड़ता हुआ डस्टबिन है।

फेसबुक वॉल से व्हाया आदि वत्सल।

 


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