पुस्तक संस्कृति पर चर्चा मे बोले वक्ता,जब तक मानव रहेगा, तब तक किताबें रहेंगी

वीथिका, मीडिया            Aug 12, 2017


मल्हार मीडिया भोपाल।
मनुष्य की प्रवृत्ति ज्ञान पिपासु है। यह उसे किताबों से ही मिल सकता है। इसलिए कहा जा सकता है कि जब तक मानव जिंदा है तब तक पुस्तकें जीवित रहेंगी। भले ही समय के साथ उसके स्वरूप में बदलाव आते रहें। इस आशय के विचार आज सप्रे संग्रहालय के सभागार में सुनाई दिए।

मौका था पुस्तकालय दिवस पर आयोजित परिचर्चा का। भारत में पुस्तकालय संस्कृति के जनक डॉ. रंगनाथन के जन्म दिवस 12 अगस्त के दिन आयोजित इस परिचर्चा का विषय पुस्तक संस्कृति ही था। कार्यक्रम का आयोजन संग्रहालय की नियमित श्रृंखला लोक संवाद के तहत किया गया था।

परिचर्चा की खासियत यह थी कि सभागार में उपस्थित हर व्यक्ति ने अपनी बात रखी। इस अवसर पर वरिष्ठ कथाकार गोविंद मिश्र,शशांक, उर्मिला शिरीष, कमलेश पारे, दीपक पगारे, विजय मनोहर तिवारी, सप्रे संग्रहालय के संस्थापक निदेशक विजयदत्त श्रीधर, निदेशक मंगला अनुजा,डॉ. रत्नेश सहित अन्य अनेक गणमान्य जन मौजूद थे।

वरिष्ठ साहित्यकार राधावल्लभ त्रिपाठी ने कहा कि भले ही आज संचार के विभिन्न माध्यम आ गए हों, लेकिन एक दिन हम पुस्तकों की ओर लौटेंंगे।

प्रशासनिक अधिकारी राजीव शर्मा ने कहा कि नई पीढ़ी किताबों की शौकीन है। आज किताबों के कलेवर भी बदले हैं। मनुष्य को ज्ञान की प्यास है। इसलिए जब तक मानव जिंदा है, किताबें भी जिंदा रहेंगी।

वसंत निरगुणे ने कहा कि जब लिपि नहीं थी, तब ज्ञान का हस्तांतरण वाचक परंपरा से होता था। पुस्तक परंपरा इसी ज्ञान परंपरा का व्यापक रूप है।

राकेश दीक्षित ने कहा कि आज हिंदी किताबें भले ही पाठकों की कमी महसूस कर रही हों, लेकिन अंग्रेजी किताबों के पाठकों की संख्या अधिक है। इसकी वजह यह है कि अंग्रेजी साहित्य में विविधता है। हिंदी लेखकों को भी विषयों का दायरा बढ़ाना होगा।

केजी व्यास ने कहा कि पुस्तकालय हमारी ज्ञान जरूरतों को पूरा करते हैं।

 



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