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छोटी जात का बड़ा आदमी

वीथिका            Jun 18, 2018


वीरेंदर भाटिया।
शीर्षक पढ़कर चौंक गए? बेहुदा है ना शीर्षक। जिंदगी इससे भी बेहुदा है जनाब। इसलिए चौंकिए नही, पढिये और गुनिये।

जिस शख्स का चित्र मैंने लगाया है वे मेरे संसदीय क्षेत्र से दो बार चुने गए निवर्तमान सांसद हेत राम जी हैं। लोग इन्हें चौधरी हेतराम कहते थे, कुछ आज भी चौधरी साहब कह देते हैं लेकिन मुझे हेतराम जी किसी कोण से चौधरी नही लगे, ना वे चौधरी जैसी अकड़ रखते है ना रुआब और ना ही चौधरी की तरह अछूत-अछूत खेलना।

बड़ी जात के हजारों छोटे आदमी देखने के बाद मैं एकदिन छोटी जात के इस बड़े आदमी पर अटक गया। इनके पास बैठकर मुझे लगा जैसे मैं विश्व दर्शन का अनुभव कर रहा हूँ और तमाम देशीय सीमाओं के पार वैश्विक दृष्टि से चीजो को देखने की नजर मुझमें रोपित हो रही है। ऐसे आदमी के लिए जात क्या सीमा होगी, जात क्या बाउंडरी होगी और जात के रोके कब रुका है आदमी, ये सब सहज समझा जा सकता है।

जात के तमाम आग्रहों, गरीबी, पोलियो औऱ स्कूल की आसपास में उपलब्धता ना होने के बावजूद हेत राम जी ने डबल एम ए की, एल एल एम की, बैंक में मैनेजर लगे औऱ फिर सिरसा संसदीय क्षेत्र से दो बार सांसद चुने गए।

इस पूरी यात्रा में उन्हें उनकी जाति ने बहुत परेशान किया, उन्होंने भेद-विभेद का विश्व साहित्य पढा औऱ पाया कि भारत मे जो जातीय भेद है या रहा है वह सबसे वीभत्स है। इससे क्रूर कोई व्यवस्था नही थी भेद की। औऱ उन्होंने अपनी बेमिसाल नजर से मुंशी प्रेम चंद की दलित विमर्श की कहानियों पर समीक्षा लिख डाली, वे लिखते गए औऱ डायरी में बन्द करते गए।

मैंने एक दिन उनकी वह डायरी उनसे ले ली औऱ कुछ समीक्षाओं को टंकित करके व्यस्वस्थित करने की कोशिश की तो मैं सिहर उठा, कांप गया, अचम्भित रह गया, बहुत देर तक एक-एक वाक्य पर हैरत करता रहा कि समीक्षा ऐसी भी हो सकती है कोई।

हेतराम जी ने जो विश्व साहित्य पढ़ा है, वाद, विमर्श , धर्म पर जो पढा है वह उन समीक्षाओं में साफ पढा जा सकता है। प्रेमचंद की 3 पेज की 'कफ़न' कहानी पर उन्होंने 200 पेज की समीक्षा लिख डाली, मैंने वह समीक्षा टाइप कर दी, कुछ समय बाद मालूम हुआ कि उन्होंने कफ़न पर एक अलग समीक्षा औऱ लिख दी है। ठाकुर का कुआं, पूस की रात मन्दिर जैसी कुछ कहानियां ऐसी है कि हेतराम जी जहां से कहानी को पकड़ते हैं वहां तो शायद लेखक की सोच भी ना गयी हो।

ये समीक्षाएं शोध के विद्यार्थियों के लिए मील का पत्थर साबित होंगी, ऐसा मुझे लगता है, जल्द इन समीक्षाओं को पुस्तक रूप में लाने की कोशश की जाएगी।

इन दिनों हेतराम जी कैंसर से लड़ रहे हैं। शरीर मे जान नहीं बची, चलना फिरना दूभर है आंख उतनी तेज नही रही कि पढ़ सकें लेकिन वे कहते हैं कि मैं कैंसर से जीत चुका हूं। पिछले दिनों वे इतनी सारी किताबे खरीद लाये जबकि वित्तीय हालात नाजुक हैं, शारीरिक हालात भी नाजुक हैं लेकिन पुस्तक से ऐसा प्रेम कि सिरहाने ना रखी हो तो नींद ना आये। हिन्दी अंग्रेजी पंजाबी मूल भाषाओं में औऱ बंगलीज़ तमिल साहित्य अनुवाद में सब पढ़ चुके हैं। गांधी औऱ प्रेम चंद पर विशेष अध्ययन है उनका और गज्जब का अध्ययन है।

चंडीगढ़ पी जी आई इलाज के लिए गए तो सामान्य नागरिक की तरह वहां प्रस्तुत थे। ना चौधरी वाली सनक ना mp होने का रौब। रहने के लिए कभी सचिवालय या किसी राजनीतिज्ञ को फ़ोन नही किया कि सुविधा मुहैया करवा दें। किसी भी धर्मशाला में कमरा लिया और इलाज के लिए पी जी आई हाजिर होते रहे।

मैंने पूछा mp साहब से कि पूर्व एम पी होने का इतना लाभ तो लिया जा सकता था जब कष्ट इस कदर है तो। वे बोले, आम लोग भी तो इसी कष्ट में इलाज करवा ही रहे हैं। मैं कोई अतिरिक्त लाभ लेकर किसी आम आदमी का हक जरूर मार रहा हूँ। ऐसा मुझे गवारा नही।

मैं अक्सर उनके पास जाता हूँ, वे धार्मिक नही हैं और कष्ट में भी वे प्रगतिशील साहित्य पढ़ रहे है, बहुत कष्ट में होने के बाद भी वे गुस्सा नही करते, उन्होंने जातीय दुर्भावना झेली लेकिन जातीय आग्रह उनमें नही हैं।

बैंक से वित्तीय लाभ नहीं मिले, संसद सदस्यता जाने के बाद रोटी तक के सवाल खड़े हो गए, अल्प राशि मे घर चलाना औऱ बच्चों को पढ़ा लेना और ex mp का टैग ढोते हुए खुद का स्वाभिमान बचाये ऱखना आसान नहीं होता लेकिन पढ़ने पढ़ने और पढ़ने का यह लाभ होता है कि इंसाज भीतर से बहुत सशक्त होता जाता है।

मैंने पूछा mp साहब से कि इलाज के लिए कोई सहायता, फ़ोन या कोई...। उन्होंने मेरी बात काट दी। बोले प्रेमचंद जी को तब की रियासत ने 10 हजार रुपये की सहायता की पेशकश की। जो संदेशवाहक ये संदेश लेकर गया उनके सामने ही मुंशी जी को उल्टी हो आयी, संदेशवाहक को मुखातिब होते हुए वे बोले, देख भाई , एक दो उल्टी औऱ आयेगी औऱ बस, जब पूरी उम्र कोई सहायता नही ली तो अब तो कोई सवाल नही। हेतराम जी ने मेरी बात समेट दी।

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