किसान जाये तो जाये कहां?

वीथिका            Dec 24, 2017


अक्षय नेमा मेख।
आज किसान दिवस है भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह की जयंती। चौधरी चरण सिंह किसानों के सर्वमान्य नेता थे। उन्होंने भूमि सुधारों पर काफ़ी काम किया था। उनका मानना था कि खेती के केन्द्र में है किसान, इसलिए उसके साथ कृतज्ञता से पेश आना चाहिए और उसके श्रम का प्रतिफल अवश्य मिलना चाहिए।

पर आज जब किसानों को खुद अपनी ही फसल का मुनाफा नहीं मिलता, अपनी ही मेहनत की दिहाड़ी नहीं पड़ती तो किसान जाए कहां..? जब उसकी चुनी सरकारें ही उस पर ज्यादतीयां करने लगे, तमाम योजनाओं के बाद वो मन्नते करे, और घर-परिवार के भरण-पोषण के बोझ में दोहरा हो जाए तो निश्चित है वो ऐसी ज़िन्दगी जीना पसंद ही नहीं करेगा।

यही कारण है कि दिन प्रतिदिन, साल-दर साल किसानों की आत्महत्याएं बढ़ती जा रही हैं। नहीं तो जीना कौन नहीं चाहता? चिता पर रखे 100 साल के बुजुर्ग मुर्दे के जिस्म में यदि प्राण आ जाएं, और कोई इस पर ध्यान न दे तो वह खुद उठकर दूर खड़ा हो जाएगा क्योंकि उसमें जीने की इच्छाएं शेष होती हैं जबकि वह तो संभवतः सब कुछ देख चुका होता है।

फिर यह किसान क्यों अपनी आधी जिंदगी और छोटे-छोटे बच्चे छोड़कर आत्महत्याएं कर लेते हैं.? इसे कोई कुछ समझे पर यह कोई शौक नहीं बल्कि परेशानी है जो तब कटना संभव नहीं रहती तो प्रायः यही एक कदम सूझता है। हालांकि इसमें कोई दोमत नहीं कि आत्महत्या पाप है।

आज किसानों की जो स्थिति बनी है वह बेहद दयनीय और चिंतनीय है। किसान आत्महत्या करने विवश है। गत वर्ष आई एनसीआरबी के रिपोर्ट के मुताबिक किसानों और खेतों में काम करने वाले मजदूरों की आत्महत्या का कारण कर्ज, कंगाली, और खेती से जुड़ी दिक्कतें हैं।

इसके लिए सरकारी व्यवस्थाएं या लालफीताशाही तो जिम्मेदार है ही साथ ही कई पारिवारिक फसाद भी किसानों की जान लेने का काम कर रहे हैं। यह फसाद घरेलु होने के चलते सार्वजनिक नहीं हो पाते साथ ही इनकी कोई शिकायत भी नहीं होती जिससे ये वास्तविकता सामने नहीं आती कि मूल वजह क्या है। पर जो भी कारण हो हकीकत तो सिर्फ यह है कि किसान बांकई में परेशान है।

कई मामले तो ऐसे होते हैं जिनमें पुरखों की जायदाद का बटवारा हो जाने के बाद सम्पन्न भाई-बंध ही अपने बेबस और असहाय किसान भाई पर, जिसे खुद पिता ने थोड़ी अधिक जमीन दी होती है। उसे इतना प्रताड़ित कर देते हैं कि वह स्वंय अपना सबकुछ इन्हीं स्वार्थीयों को समर्पित कर दे। इतने पर भी यदि मन नहीं भरता तो कोट-कचहरी का डर दिखा-दिखा कर, आर्थिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित कर उसे मरने बिबस कर देते हैं।

तो आज किसान किसके भरोसे रहे..? एक किसान होने के नाते इतना जरुर कहूंगा कि जो किसान की मांग होती है वह भी बेहद कम और मामूली सी होती है। सत्ता को चाहिए कि वह किसान के साथ खड़ी रहे। अपने लिए खुद किसान कुछ विशेष की माँग नहीं करता। पर हां उसके साथ लालफीताशाही न बरती जाए। पारिवारिक फसाद यदि कचहरी आते हैं तो उनपर भी त्वरित फैसला हो। किसान वाकई में बहुत परेशान है। उसके साथ मजाक करने की जगह उसके घावों को कोई तो सहलाकर किसान जयंती को सार्थक करें।

 



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