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स्मृति: विशुद्ध संत संपादक मामा माणिक चंद वाजपेयी

वीथिका, मीडिया            Dec 29, 2017


डॉ राकेश पाठक।
27 दिसंबर को मूर्धन्य पत्रकार,संपादक मामा माणिक चंद वाजपेयी की पुण्यतिथि थी। वे विशुद्ध संत संपादक थे।। एकदम खांटी देहाती पहनावा और वैसे ही सहज सरल। नई पीढ़ी के पत्रकार शायद उन्हें ठीक से जानते भी न हों इसलिए आइये आज उनके बारे में बात करते हैं।

मामाजी बटेश्वर (आगरा) के रहने वाले थे। अटलबिहारी वाजपेयी भी वहीं के हैं। बचपन में दोनों ने साथ में यमुना में खूब डुबकियां लगाईं थीं। अटलजी उम्र में छोटे हैं सो हमेशा माणिक चंद जी को बड़ा भाई माना। माणिक चंद पढ़ाई के लिए ग्वालियर आये और यहां मुरार में दीक्षित परिवार में रहे। इस परिवार के बच्चों के वे मामा थे इसीलिये कालांतर में माणिक चंद जगत "मामाजी" कहलाये।

यहां वे 'राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ' के संपर्क में आये। पढ़ाई के बाद वे अड़ोखर(भिंड) में शिक्षक हो गए। भिंड में संघ और जनसंघ के प्रचार प्रसार में मामाजी की महती भूमिका रही। कालांतर में मामाजी जनसंघ के संगठन मंत्री बने। जनसंघ ने मामाजी को 1962 के लोकसभा चुनाव में राजमाता विजयाराजे सिंधिया के खिलाफ ग्वालियर में मैदान में उतारा। राजमाता कांग्रेस की प्रत्याशी थीं और उन्होंने मामाजी को करारी शिकस्त दी। राजमाता को एक लाख 73 हज़ार 171 वोट मिले जबकि मामाजी को मात्र 24 हज़ार 351 वोट। मामाजी ने इस चुनाव के बाद राजनीति से तौबा कर ली।

संघ ने बाद में उन्हें "दैनिक स्वदेश" इंदौर का दायित्व सौंपा। मामाजी प्रखर पत्रकार के रूप में स्थापित हुए और 'स्वदेश' के 'प्रधान संपादक' बने। मुझे भी मामाजी के सानिध्य में स्वदेश ग्वालियर में काम करने का सौभाग्य मिला। वे इतने सहज थे कि प्रायः अपने विशेष संपादकीय तक लोकेन्द्र पाराशर Lokendra Parashar और मुझ जैसे अदने से रिपोर्टर को चैक करने दे देते थे। हमेशा कहते- देख लेना कुछ गलत लिख गया हो तो ठीक करने के बाद ही कंपोज़िंग में देना।

( लोकेन्द्र जी बाद में स्वदेश, ग्वालियर के संपादक बने और अब बीजेपी के प्रदेश मीडिया प्रभारी हैं )

मामाजी के प्रति अटलजी की विशेष श्रद्धा सदैव बनी रही। अटलजी लखनऊ स्वदेश के संपादक रहे थे। उस समय अटलजी पर 'पांचजन्य' और 'राष्ट्रधर्म' जैसे प्रकाशनों का भी दायित्व था।
अटलजी जब प्रधानमंत्री बने तब उनके निवास 7 रेसकोर्स पर मामाजी के सम्मान का कार्यक्रम हुआ। इस समारोह में अटलजी ने मामाजी के चरणस्पर्श कर आशीष लिया था।
सचमुच संत संपादक थे मामाजी। उनकी स्मृति को नमन।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

 


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