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भारतबंद:सरकार ऊँघ रही थी और राहुल गांधी टृविटर पर इसे सलामी दे रहे थे

खरी-खरी            Apr 03, 2018


राकेश दुबे।
कल देश में हिंसक बंद था। ट्विटर से लेकर गोली तक जिसके हाथ जो लगा चला दिया। इस हिंसा के विरोध में नहीं इस मामले के मूल आरक्षण के विरोध में 10 अप्रैल को फिर एक बंद के आयोजन के संदेश सोशल मीडिया पर आ रहे हैं।

पूरा घटनाक्रम, सर्वोच्च न्यायलय का निर्णय, अब निर्णय की अपील और कल के बंद को एक दिन पहले से मिली ट्विटर सलामी यह प्रश्न खड़ा करती है कि इस देश के रहनुमा देश को कहाँ ले जाना चाहते हैं?

इस सबके चलते ही कल मध्य प्रदेश में 7, राजस्थान में 1 और उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद में एक शख्स की मौत ने इस आंदोलन को रक्तरंजित कर दिया। मरनेवालों की संख्या और बड़ी हो सकती है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आंदोलनकारियों ने पुलिस चौकी में आग लगा दी। राजस्थान के बाड़मेर और मध्य प्रदेश में आंदोलनकारी आपस में ही भिड़ गए जिसमें 30 से ज्यादा लोग जख्मी हो गए।

पंजाब, बिहार औऱ ओडिशा भी भारत बंद से त्रस्त रहा। इन सभी राज्यों के अलग-अलग जिलों में आंदोलनकारियों ने ट्रेन के पहिये थाम दिये और सड़कों पर जमकर हंगामा किया। इस आंदोलन का असर देश में 100 से अधिक ट्रेनों के संचालन पर पड़ा है। बंद को लेकर एक महाभारत के असर से देश त्रस्त है, 10 अप्रैल को फिर बंद के संदेशे तैरने लगे हैं।

बीते कल के बंद का अनुमान उस दिन ही हो गया था जब सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया था। सरकार ऊँघ रही थी और राहुल गांधी ट्वीट करके इसे समर्थन की सलामी दे रहे थे।

राहुल गाँधी के इस ट्विट ने “दलितों को भारतीय समाज के सबसे निचले पायदान पर रखना भाजपा और आरएसएस के डीएनए में है और जो इस सोच को चुनौती देते हैं उसे वो हिंसा से दबा देते हैं।हजारों दलित- भाई बहन आज सडक पर उतर कर मोदी सरकार से अपने अधिकारों की रक्षा की मांग कर रहे हैं। हम उनको सलाम करते है।” क्या इसे हवा नहीं दी?

भाजपा भी इसे वोट बैंक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है। भीमराव आंबेडकर का सम्मान हो या फिर आंबेडकर जी से जुड़े स्थलों को विकसित करने की रणनीति बीजेपी 2019 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति में दलितों को ऊपर रख रही है।

यह सब तमाशे देश को गलत दिशा दे रहे हैं। समय-समय पर अलग-अलग मुद्दों को लेकर देश में दलितों के होने वाले आंदोलन के कारण सत्तारूढ़ भाजपा मुसीबत में है तो कांग्रेस के लिए सियासत का मौका है। देश की किसी को फ़िक्र नहीं।

देश में दलितों के आंदोलन धीरे-धीरे ज्यादा हिंसक होते जा रहे हैं और इन हिंसाओं पर सियासत ने दलितों को सिर्फ मौत और मातम दिया है।

अब विरोधी आन्दोलन शंतिपूर्ण होगा? कोई इसकी जिम्मेदारी ले सकता है, शायद नहीं। देश को जिस ओर राजनीति भेज रही है यह दिशा ठीक नहीं है। देश के सामने वर्षों से खड़े इन सवालों के जवाब कहीं और नहीं समाज के भीतर हैं।

समाज को टटोल कर सही दिशा में ले जाने की जवाबदारी सबकी है, राजनीतिक दलों की और थोड़ी अधिक। अनमोल मानव जीवन का ह्रास, राष्ट्रीय सम्पति की बर्बादी और आपसी वैमनस्यता से देश कहाँ जायेगा ? सोचिये, यह देश हम सबका है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रतिदिन पत्रिका के संपादक हैं।

 


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