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आलू की फसल से पश्चिम बंगाल में किसान हुये कंगाल

खास खबर            Jul 05, 2017


धर्मेंद्र कुमार उपाध्याय।
पश्चिम बंगाल अधिकतम आलू उत्पादक राज्य के रूप में शुमार किया जाता है। यहाँ के आलू के चिप्स बनाकर दुनिया भर में कम्पनियां बेचती है। ये सब सुहाने जुमले और आंकड़े है अब इन आंकड़ो पर विडम्बनाओं की की आंच लगने लगी है। ज्यादा आलू की उत्पादन करने की कामयाबी पर किसान इतराने के वजाए बहुत-सी समस्याओं के घेरे में आ गए है। कला,संस्कृति से समृद्ध और पूजा-पाठ, श्रम और खेती से जुड़े अधिकतम किसान आज अकेले पड़ गए है। वे अपने उत्पादित आलू की बोरियां न बाजार पहुंचा पा रहे है न ही सरकारी खरीद की दुकानों पर, उनके पास कोल्ड स्टोरेज भी नही है, जहाँ वे आलू की बोरियां रख सकें।

बाजार और सरकारी खरीद की दुकानों तक उनकी सीधी पहुंच भी नहीं है। ऐसे में बिचौलिए चांदी काट रहे हैं। बिचौलिए शुरू में ही अत्यंत सस्ते दामों पर किसानो से आलू खरीद लेते हैं। और बाद में कई गुना ज्यादा दाम पर बेच देते हैं, जबकि कर्ज लेकर खेती करने वाले किसान ऐसे में इतना टूट चुके है की वे आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं।

पश्चिम बंगाल में एक साल में चालीस से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। कथित तौर पर सरकारी स्तर से किसानों की आत्महत्या की खबरें दबा दी जाती है। राज्य में गैर सरकारी मुद्दे पर राजनीती होती है, लेकिन किसानो की आत्महत्या आए दिन मुख्य चर्चा का विषय नहीं बन पाती है।

पिछले दो दशकों से मेदिनीपुर जिले के सैकड़ों गाँवो का दौरा कर किसानों की स्थिति का अध्ययन कर रहे अमित (परिवर्तित नाम) बताते हैं कि किसानों की उनके महंगे और प्रिय वस्तुओं सोने ,चांदी के जेवरात, बनारसी साड़ियां आदि गिरवी रखकर कर्ज देने वाले महाजन इतने समृद्ध हो गए है की उन्होंने जेवरात की दुकानें खोल ली हैं और किसान अधिकतम आलू उत्पादन करके भी कंगाल बनते जा रहे हैं। किसानों की हालत में सुधार हो ही नहीं रहा है। मेदिनीपुर जिले के घाटाल के एक किसान भृगु मालिक (परिवर्तित नाम) से उनका हाल जानना चाहा तो उनके मुंह से शब्द नहीं निकले बल्कि उनके आँखों से आंसू बहने लगे।

यह हाल उस पश्चिम बंगाल का है, जहाँ 70 फीसदी से ज्यादा आबादी खेती और इसके सहायक धंधों पर आधारित है। पश्चिम बंगाल में किसान आत्महत्या नहीं करते थे लेकिन अब वे इस रास्ते पर चल पड़े हैं। लगातार घाटे के कारण वे कर्ज से इतने दब गए हैं कि उनके पास दूसरा कोई चारा नहीं है। राज्य में विकास की दौड़ में किसान पिछड़ गए हैं। जबकि उन्होंने अपने स्तर से श्रम करने में कोताही कभी नहीं बरती। बीज,खाद और कीटनाशकों के दाम लगातार बढ़ते जा रहे है और उनके उत्पादनों के कीमत में लगातार गिरावट आती जा रही हैं।

किसानों की मदद न सरकार कर पा रही है और न ही राजीनीतिक दल के सदस्य उनकी आवाज उठा रहे हैं। सताधारी राजनितिक दल के दबंग और भ्रष्ट कर्मचारियों की साठ-गांठ से किसानों को वह लाभ नहीं मिल पाता है जो सरकार की घोषित कल्याणकारी योजनाओं से मिलना चाहिए। इसे भी बिचौलिए ही ले उड़ते हैं। पश्चिम बंगाल में किसानों की कई पीढियां आलू की खेती करती आ रही है। खासकर वर्धमान ,हुगली ,मालदा, मेदिनीपुर आदि जिलों में सबसे अधिक आलू की खेती होती है।

इस साल राज्य में सबसे ज्यादा उत्पादन हुआ है, लेकिन उत्पादन बढ़ते ही उसके खरीद मूल्य में भारी गिरावट आ गयी है। बढ़े हुए दाम पर बीज खाद, और कीटनाशक झोंककर किसान हक्के-बक्के से रह गए हैं। उन्हें उम्मीद थी की ज्यादा उत्पादन से उन्हें ज्यादा पैसा मिलेगा। जहाँ एक ट्रक आलू की कीमत उन्हें 80 हजार रूपये से ज्यादा मिलती थी अब यह घटकर 37 हजार रूपये हो गई है। ये भी कीमत उन किसानों को मिल रही है जो बाजारों तक अपने उत्पादन को अतिरिक्त पैसे खर्च कर पहुंचा रहे हैं।

ज्यादातर किसानों के आलू बिचौलिए सस्ते दामों पर खरीद लिए। किसानों के पास रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज नही है, राज्य की ओर से नही पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज नही है। नतीजतन वे आलू सडकों पर फेंक रहे है या उन्हें जला रहे हैं। आलू की खेती करके पश्चिम बंगाल के किसान तबाह हो रहे हैं। उड़ीसा के किसानों ने आलू से तौबा कर ली है।

असल में किसानो को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। सिंचाई के लिए बिजली सस्ती नहीं है। थोड़ी सी सस्ती रात में होती है पर किसान रात को सिंचाई करने से बचते हैं क्योंकि रात को खेतों में सांप रेंगते मिलते हैं। कई किसान सर्प दंश से भी मर गए हैं। बैंको से कृषि लोन का प्रावधान है पर किसानों को इसके बारे जानकारी नहीं होती है। किसानों की मदद के लिए सरकार की ओर से तैनात अधिकारी-कर्मचारी हमेशा मौके से गायब रहते हैं।

प्राइवेट लोन समय पर जरुर मिल जाता है लेकिन इसके लिए किसानों को भारी कीमत चुकानी पड़ती है। गिरवी पर रखे सामान तो वे लौटा ही नही पाते उलटे ब्याज के पहाड़ से दब जाते हैं।
किसानों को उनके उत्पादन का वाजिब दाम मिले और अन्य जरूरी सहायता मुहैया करने की मांग पर रजनीतिक दल कोई उपाय करते नहीं दिख रहे हैं।

पर पश्चिम बंगाल सर्वोदय मंडल ने किसानों को उनके हक दिलाने के लिए “किसान सत्याग्रह” करने के लिए कमर कस ली है। सर्वोदय कार्यकर्ता किसानों का एक सम्मेलन बुलाने की तैयारी में जुटे हैं ताकि सत्याग्रह के तहत 200 किलोमीटर पदयात्रा कर राज्य सरकार को झकझोर सके। पश्चिम बंगाल सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष गाँधी मिशन ट्रस्ट के सचिव नारायण भाई कहते हैं कि विदेशी कम्पनियां किसानो को लूट रही है और सरकार तमाशबीन बनी हुई है।

राजनितिक पार्टियों की भूमिका केवल चुनावों में वोट लेने तक ही सिमित रहती है। पश्चिम बंगाल के किसानों को न केवल आलू और धान की कम कीमत मिलती है बल्कि इसके साथ-साथ जूट, धान,सरसों और हरी सब्जियों के दाम भी इतने कम होते हैं कि उससे उनकी लागत भी वसूल नही होती है।

नारायण भाई कहते हैं कि गाँधी जयंती के अवसर पर हुगली जिले के हाजीपुर गांव से कोलकाता तक दो हजार किसान पदयात्रा करेंगे और करीब दो सौ किलोमीटर की इस पदयात्रा में किसान परिवार के सभी स्त्री-पुरुष और उनके बच्चे भी शामिल होंगे। नारायण भाई का कहना है कि पदयात्रा के जरिए न केवल किसान उत्पादन के वाजिब कीमत की मांग करेंगे बल्कि अन्य लोगों को भी अपनी बेहाली से अवगत कराएंगे ताकि उनके समर्थन से बिगड़ गए माहौल में कुछ सुधर हो सके।

लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। संपर्क:8115073618

 

 



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