वनौषधियों के भंडार भारत में ही कई पौधों की प्रजाततियां संकट में

खास खबर            Aug 30, 2021


डॉ. दीप नारायण पाण्डेय।

80% आयुर्वेदिक औषधियाँ वनों से प्राप्त हो रहीं हैं। खेती से केवल 20% का ही उत्पादन है।
विश्व में हर्बल औषधियों का बहुत बड़ा बाजार है। करीब 60 हजार औषधीय प्रजातियों से 6 से 7 लाख टन पदार्थ और कच्चा माल प्राप्त किया जाता है।

वर्ष 2014 में औषधीय पौधों के वैश्विक व्यापार का मूल्य 33 अरब डालर आँका गया था। एक शोध के अनुसार चौदह वर्षों की अवधि के लिये औषधीय पौधों में औसत वैश्विक निर्यात प्रति वर्ष 6,01,357 टन और 1.92 अरब डालर था।

वर्ष 2014 के लिये यह 7,02,813 टन तथा 3.60 अरब डालर आँका गया था। हाल के अनुमानों के अनुसार वर्ष 2020 में हर्बल मेडिसिन का कुल वैश्विक बाज़ार 98.60 बिलियन अमेरिकी डॉलर था और 2028 तक इसके 391.22 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।

इंडिया ब्रैंड इक्विटी फाउंडेशन के आंकड़े बताते हैं कि भारत में औषधीय पौधों का बाजार वर्ष 2019 में रुपये 4.2 बिलियन (56.6 मिलियन अमेरिकी डॉलर) आँका गया है जो 38.5 प्रतिशत की दर से बढ़कर वर्ष 2026 तक रुपये 14 बिलियन (188.6 मिलियन अमेरिकी डॉलर) होने का अनुमान है। कुल विश्व हर्बल व्यापार वर्तमान में 120 बिलियन अमेरिकी डॉलर आंका गया है।

आयुर्वेद की जड़ी-बूटियों और जड़ी-बूटियों के मूल्य-वर्धित एक्सट्रैक्ट्स का व्यापार भी बढ़ रहा है। उदाहरण के लिये वर्ष 2017-2018 में भारत ने पिछले वर्ष की तुलना में 14.22 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 330.18 मिलियन अमेरिकी डॉलर की जड़ी-बूटियों का निर्यात किया था।

साथ ही मूल्य-वर्धित एक्सट्रैक्ट्स का निर्यात 456.12 मिलियन अमेरिकी डॉलर था, जो पिछले वर्ष की तुलना में 12.23 प्रतिशत की वृद्धि दिखाता है।

जैसा कि ज्ञात है लगभग 95 प्रतिशत आयुर्वेदिक औषधियाँ पौधों से ही प्राप्त होती हैं और इन औषधीय पौधों का विदोहन प्रायः प्राकृतिक वनों से ही किया जाता है। कुल वैश्विक वार्षिक खपत का केवल 10 से 20 प्रतिशत हिस्सा ही खेती द्वारा प्राप्त किया जाता है। ट्रैफिक इन्टरनेशनल का अध्ययन बताता है कि अभी तो यूरोप जैसे विकसित भू-भाग में भी 90 प्रतिशत औषधीय पौधे प्राकृतिक वनों से ही एकत्रित किये जाते हैं।

आइये एक विश्व-प्रसिद्ध औषधि का प्रकरण देखते हैं। गुग्गुलु राजस्थान के वनों उष्णकटिबंधीय शुष्क वनों तथा मरुस्थलीय पारस्थितिकीय तंत्रों की एक अति महत्वपूर्ण परन्तु सर्वाधिक संकटापन्न लघु वृक्ष प्रजाति है। यों तो यह कुछ अन्य क्षेत्रों में भी मिलता है पर राजस्थान का गुग्गुलु सर्वश्रेष्ठ है। देवीकोट (जैसलमेर) और पलाना (बीकानेर) में उगने वाले गुग्गुलु के पौधों में गुग्गुलस्टेरोन की मात्रा हरियाणा व गुजरात में उगने वाले पौधों की तुलना में बेहतर मिली है

(देखें, ए. कुलहरि इत्यादि, फिजियोलॉजी एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी ऑफ़ प्लांट्स, 21: 71–81, 2015)।

गुग्गुलस्टेरोन में कोलेस्ट्रॉल कम करने तथा भूख को नियंत्रित करने के साथ-साथ इम्यूनोमॉड्यूलेटरी गतिविधि पायी जाती है इसीलिये यह बहु-उपयोगी औषधि कोविड-19 महामारी के दौरान लाभप्रद हो सकती है। कोविड-19 रोगियों में साइटोकाइन स्टॉर्म से होने वाले हाइपरइन्फ्लेमेशन को रोकने में गुग्गुलु उपयोगी हो सकता है। गुग्गुलस्टेरोन साइटोकाइन तूफान की गंभीरता को कम कर सकता है (देखें, एल. प्रीति इत्यादि, ओबेसिटी मेडिसिन, 24: आर्टि. 100346, 2021)।

पिछले कई दशकों से अति-विदोहन और विनाशकारी-विदोहन के कारण पुनरुत्पादन में कमी होने से गुग्गुलु के पौधों का प्राकृतिक पौध-संख्या घनत्व राजस्थान में निरंतर गिर रहा है। हालत यहाँ तक आ पहुँची है अब इस प्रजाति के मात्र चार हॉट-स्पॉट्स ही बचे हैं|

सबसे अधिक घनत्व 105.9 पौधे/ हेक्टेयर सवाई माधोपुर के कुछ क्षेत्रों में और सबसे कम 1.6 पौधे/ हेक्टेयर झालावाड़ जिले में मिले हैं। पहाड़ी ऊंचाई के अनुसार भी गुग्गुलु की प्राकृतिक संख्या घनत्व में भिन्नता मिली है। अधिकतम घनत्व 40 पौधे /हेक्टेयर मुख्य रूप से अरावली रेंज में समुद्र तल से 301-350 मीटर ऊंचाई सीमा में है, और ज्यादा ऊंचे

(समुद्र तल से 350 मीटर) और कम (समुद्र तल से 301 मीटर) ऊंचाई पर घनत्व कम मिला है

(देखें, यू.के. तोमर इत्यादि, जर्नल ऑफ़ एप्लाइड रिसर्च ऑन मेडिसिनल एंड एरोमेटिक प्लांट्स, 25, आर्टि. 100323, 2021)।
गुग्गुलु से रेसिन प्राप्त करने के लिये विनाशकारी-विदोहन पद्धति के कारण यह प्रजाति अब गंभीर रूप से संकटापन्न है और रेड-लिस्ट में सूचीबद्ध हो गयी है। औषधीय रेसिन निकालने के लिये कटान, वनों में पशुओं द्वारा चराई आदि के कारण वनों में गुग्गुलु का प्राकृतिक पुनरुत्पादन बहुत कम हो रहा है।

इस अति-विदोहन के परिणामस्वरूप भारत में गुग्गुलु ओलियो-रेसिन के उत्पादन में भारी गिरावट आई है। राजस्थान में गुग्गुलु के विदोहन पर प्रतिबन्ध लगाना पड़ा है। अन्य राज्यों का उदाहरण देखें तो गुजरात, जो कि उत्पादन का एक प्रमुख क्षेत्र रहा है, में वर्ष 1963 में उत्पादन 30 टन था जो वर्ष 1999 में गिरकर मात्र 2.42 टन रह गया।

वर्ष 2013 में यह मात्र 1.6 टन रह गया। नतीजा यह है कि अब गुग्गुलु का पाकिस्तान से भारत में लगभग 505 टन /वर्ष आयात किया जाता है। इसका उपयोग कर अनुमानित रूप से 193 टन प्रति वर्ष समतुल्य प्रसंस्कृत उत्पादों का निर्माण कर भारत से 42 देशों को निर्यात किया जाता है (देखें, ए.बी. कनिंघम इत्यादि, जर्नल ऑफ़ एथनोफार्माकोलॉजी, 223: 22-32, 2018)। अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिये वाणिज्यिक विदोहन के कारण गुग्गुलु के पौधों की संख्या में आ रही निरंतर गिरावट चिंताजनक है और वनों में व्यावहारिक संरक्षण, संवर्धन और पुनरुत्पादन तथा निजी जमीनों में खेती को बढ़ावा देने की तत्काल आवश्यकता है।

जहाँ तक गुग्गुलु की खेती का प्रश्न है, कुछ पहल 45 साल पहले हुई थी। राजस्थान में मंगलियावास के पास एक गुग्गुल हर्बल फार्म शुरू किया गया था। एक परियोजना और थी जिसका लक्ष्य 1,700 हेक्टेयर में गुग्गुलु की खेती करना था। राजस्थान के सभी जिलों में गुग्गुलु को नर्सरी में तैयार कर वितरण के लिये लगभग पांच लाख पौधे उगाना लक्ष्य था। लेकिन निजी जमीनों पर खेती के साथ साथ सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह है कि गुग्गुलु को वनों में संरक्षित और संवर्धित किया जाये।

वन विभाग द्वारा पौधे उगाने तथा वृक्षारोपण में लगाने हेतु कुछ प्रयास हुये हैं लेकिन इस ओर मजबूती से ध्यान देना आवश्यक है ताकि हमारी यह एंडेमिक प्रजाति राजस्थान से विलुप्त ना हो जाये। इस विषय में क्रियान्वयन हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता में आना आवश्यक है।
प्राकृतिक वनों से लगातार दोहन के साथ-साथ अब जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण प्रदूषण और निर्वनीकरण के कारण जड़ी-बूटियों की जैव-विविधता का विनाश औषधीय पौधों पर भारी संकट है। वनों से औषधीय पौधों के अति-विदोहन की सामाजिक और पर्यावरणीय कीमत को नज़रअंदाज़ करते हुये, केवल वित्तीय आधार पर औषधीय पौधों का मूल्य आंकने की अर्थशास्त्रीय-मूर्खता, भविष्य में ऐसी स्थिति ला सकती है जब ज्ञान और ज्ञानी तो उपलब्ध होंगे, पर उस ज्ञान के उपयोग से स्वास्थ्य-प्राप्ति के लिये जरूरी औषधीय पौधे नहीं रहेंगे।

भारत के वन औषधियों के भंडार हैं। औषधीय पौधों की बड़े पैमाने पर वनों के बाहर खेती एवं एवं वनों के अन्दर जैव-विविधता संरक्षण और प्रबंध के बिना आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध, सोवा रिग्पा, प्राकृतिक चिकित्सा, और होम्योपैथी के 7.5 लाख आयुष चिकित्सकों का विशाल वैज्ञानिक और अनुभवजन्य ज्ञान धरा रह जायेगा।

पिछले 25 वर्षों की शोध के निष्कर्ष यह बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन की दशा में भारत के वनों का वर्तमान भौगोलिक वितरण, प्राकृतिक पुनरुत्पादन, पुष्पन, फलन एवं बीजोत्पादन आदि में गंभीर अन्तर आ सकता है। भारतीय वनों पर इंडियन इन्स्टीट्यूट ऑफ साइन्स, बेंगलूरु द्वारा की गयी शोध से ज्ञात होता है कि जलवायु एवं मानसून में परिवर्तन की दशा में भारतीय वनों पर गंभीर कुप्रभाव पड़ने वाला है।

यह कुप्रभाव तब और गंभीर हो जाता है जब मानवजनित कारणों, जैसे अति-विदोहन आदि के कारण औषधीय प्रजातियाँ संकटापन्न होती जा रहीं हैं।

आयुर्वेदिक औषधियों के बिना आयुर्वेद की कल्पना भी नहीं की जा सकती है| आयुर्वेद-चिकित्सा के चार पादों में चिकित्सक के पश्चात औषधि का ही महत्व है। संकटापन्न पौधों की रेड-लिस्ट के अनुसार, भारत विश्व के उन दस देशों में शामिल है जहाँ पौधों की सर्वाधिक प्रजातियाँ संकटापन्न हैं। हालांकि भारत ने अपने 385 संकटापन्न पौधों की प्रजातियों की समस्या को हल करने की ओर कदम तो उठाया है, किन्तु अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

दुर्भाग्य यह भी है औषधीय पौधों पर निर्भर औषधि-निर्माता कंपनियों द्वारा देश के किसानों को मदद देकर औषधीय पौधों की खेती और सुनिश्चित खरीद के लिये कोई ठोस कार्य नहीं किया गया। यहाँ तक कि नेशनल मेडिसिनल प्लांट्स बोर्ड और स्टेट मेडिसिनल प्लांट्स बोर्ड्स की मदद से देश में जिन किसानों ने औषधीय पौधों की खेती को अपनाया, उनसे कच्चा माल खरीदने के बजाय औद्योगिक घरानों द्वारा वनों से एकत्रित सस्ती दरों पर उपलब्ध सामग्री को प्राथमिकता दी गयी।

व्यापारिक घरानों में उपयोग होने वाले औषधीय पौधों का लगभग पूरा का पूरा हिस्सा आज भी वनों के विदोहन और संग्रह से प्राप्त किया जा रहा है। शीघ्र ही इस दिशा में कंपनियों के स्वयं के स्तर पर ठोस कार्य नहीं किया गया तो दक्षिण एशिया के जिन 1.4 अरब लोगों की आयुर्वेद पर निर्भरता है उन्हें औषधियां मिलना दुष्कर हो जायेगा।

औषधियों के रूप में प्रयुक्त होने वाले पौधों की अधिकाँश जरूरत वनों से ही पूरी की जा रही है। अतः ऐसी रणनीति बनाना आवश्यक है जिसमें औषधीय प्रजातियों का न केवल वनों में यथा-स्थान संरक्षण हो, अपितु उनका डोमेस्टिकेशन किया जाकर खेती का अंग बनाया जाये। औषधीय पौधों की प्रजातियों के विलुप्त होने के बाद उन पर उपलब्ध ज्ञान की सार्थकता शेष नहीं रह पायेगी। जिन प्रजातियों की खेती की विधियाँ केन्द्रीय औषधि एवं सगंध पादप संस्थान, लखनऊ द्वारा विकसित की गयी हैं, उन्हें शीघ्र बड़े पैमाने पर खेती के लिये प्रोत्साहन देना आवश्यक है।

आयुष फार्मा कंपनियों द्वारा बीज एवं खेती की तकनीक को किसानों तक पहुंचाया जाना अत्यन्त आवश्यक है। उगाई गयी फसल के वापस खरीदने की व्यवस्था को भी विकसित करना अनिवार्य है।भारत में जिस प्रकार अनाज, दलहन, तिलहन आदि के लिये समर्थन मूल्य घोषित किये जाते हैं, उसी प्रकार का समर्थन मूल्य लगभग 1000 औषधीय प्रजातियों के लिये घोषित किया जाना उपयोगी हो सकता है। समर्थन मूल्य के साथ-साथ औषधीय पौधों के विपणन के लिये देश के हर जिले में मंडियों एवं भण्डारण की भी समुचित व्यवस्था लाभकारी रहेगी।

आयुर्वेदिक औषधशालाओं एवं किसानों के मध्य उपज खरीद का अनुबंध हो। इस प्रकार के अनुबंध से किसानों को अपनी उपज का सुनिश्चित बाजार तथा औषधशालाओं को उनकी आवश्यकता के अनुरूप उच्च कोटि के औषधीय पौधे प्राप्त हो सकते हैं।

एक महत्वपूर्ण रणनीति जो औषधीय प्रजातियों की निरंतरता एवं उपलब्धता सुनिश्चित करेगी वह यह भी है कि गांवों एवं शहरों के परिवारों द्वारा परंपरा से उगाये जा रहे होम गार्डन्स में इन पौधों को उगाया जाये। पूरे देश में घरेलू बाग़-बगीचों की परंपरा न केवल अत्यन्त प्राचीन है, अपितु अत्यंत लोकप्रिय भी है।

इन होम गार्डन्स में अनेक प्रजातियां लोगों द्वारा अपनी जरूरत के मुताबिक उगायी जाती है। किंतु, यह परंपरा धीरे-धीरे क्षीण हो रही है, जिसे पुनर्जीवित करना उपयोगी है। राजस्थान सरकार द्वारा वर्ष 2021 में पांच वर्ष के लिये प्रारम्भ की गयी घर-घर औषधि योजना इसी सिद्धांत के अनुरूप देश की सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण पहल है।

लेखक भारतीय वन सेवा में वरिष्ठ अधिकारी हैं,उनका यह आलेख संकल्प प्राकृतिक कृषि के फेसबुक वॉल से लिया गया है।

 



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