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ख़ैय्याम आपकी बज़्म के बगैर ज़िंदगी की ये सभा अंत तक अधूरी रहेगी

पेज-थ्री            Aug 20, 2019


नवीन रंगियाल।
लोबान था और उसका धुआं भी। कमरे में एक तरफ सूखे गुलाबों का एक गुलदस्ता महक रहा था। लेकिन लोबान की गंध ज्यादा तेज़ थी। ये कोई दरगाह सा समां रहा होगा।

जैसे अभी हम उठेंगे और दरगाह पर सुफ़ेद झालर वाली हरी चादर बिछा देंगे। फिर उस पर गुलाब रखेंगे और फिर घुटनों पर टिककर कहेंगे या मौला… हे ईश्वर, हमें दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत संगीत से मरहूम न रखो… हमारे सारे गुनाह माफ़ करो और हमें ऐसी मौसिक़ी बख़्श दो जिसे रूह ही गाए और रूह ही सुने।

एक छोटे से लम्हें के बाद पूरी दुनिया ने एक साथ मिलकर एक लफ्ज़ कहा, लफ्ज़ था… आमीन और फिर मन्नत पूरी हो गई।

लोबान के धूएं के बीच बाबा चिश्ती रियाज़ में थे। रियाज़ करते हुए उन्हें एक धुन याद आई और फिर जल्दी ही भूल भी गए। इस विस्मृति के बाद उन्होंने अपने शार्गिदों से पूछा कि वो क्या धुन थी जो हम गा रहे थे?

कोई नहीं बता सका कि वो क्या धुन थी। फिर कमरे के एक कोने में बैठे गुमसुम लड़के ने झिझक को किनारे रखकर कहा कि उसे याद है वो धुन जो अभी आप गुनगुना रहे थे बाबा। लड़के ने धुन गुनगुनाकर उनको सुना दी।

इसी दिन बाबा चिश्ती यानी उस दौर के फ़नकार ग़ुलाम अहमद चिश्ती ने इस लड़के के हाथ में अपने नाम का गंडा बांध दिया और हम सबके लिए वो लड़का ख़ैय्याम हो गया।

मोहम्मद जहूर हाशमी नाम का यह शख़्स हम सब के लिए बाद में मौसिक़ी का ख़ैय्याम हो गया।

सबसे अच्छा होता है भूली हुई धुनों को याद करना। भूली हुई पंक्तियों को फिर से याद करना। ठीक उसी तरह जैसे मेरा यकीन है कि सबसे अच्छा होता है एक तरफ जाकर रो लेना।

गुलाम अहमद चिश्ती कोई पीर फ़कीर नहीं थे और न ही ख़ैय्याम कोई कलंदर, लेकिन जो धुनें वो बनाकर चले गए वो हमारे ज़िंदगी के लिए सबद की तरह है। ये धुनें हमारी रुहानी कैफ़ियत के लिए सबसे ज्यादा क़रीब और मुफीद रहेगी।

अगर उस दिन बाबा चिश्ती की वो अनाम धुन ख़ैय्याम अपने ज़ेहन में सम्भालकर नहीं रखते तो ‘ऐ दिल ए नादान’ भी न होता और न ही ‘शामें ग़म की क़सम’ होता। न ‘सिमटी हुई ये घड़ियां’ होता और न ही ‘आप यूं फ़ासलों से गुजरते रहे’ होता और न ही ‘बहारो मेरा जीवन भी संवारों’ होता। और यक़ीनन कब्बन मिर्ज़ा भी नहीं होते। अंत में हमारी ज़िंदगी की बज़्म में कुछ नहीं होता।

ख़ैय्याम हम सबकी आत्माओं और उसकी कैफियत के लिए ताउम्र किसी क्राफ्टमैन की तरह धुनें बुनते रहे। जैसे बहुत सारे धागों को समेटकर एक रूह तैयार की जा रही हो।

हमारे इसी आस्वाद के लिए की गई मशक्कत में उनकी हथेलियां और देह ज़र्जर और ख़ुरदरी हो गई, लेकिन उनकी आत्मा अंत तक नाज़ुक और सब्लाइम बनी रही।

अपनी सारी नज़्मों और ग़ज़ल के लिए वो ऊपरवाले का शुक्र अदा करते रहे। ख़ैय्याम आपकी बज़्म के बगैर ज़िंदगी की ये सभा अंत तक अधूरी रहेगी।

#औघटघाट
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सबसे-अच्छा-होता-है-भूली-हुई-धुनों-को-याद-करना

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