द्वेष न राग, साबित करना है कैलाश-अनुराग

खरी-खरी            May 04, 2026


राघवेंद्र सिंह।

बात पुरानी है तब दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में सुभाष यादव उप मुख्यमंत्री हुआ करते थे। श्री यादव ने अपने मंडला दौरे के समय गड़बड़ी मिलने पर थोक में इंजीनियर्स को सस्पेंड किया था। उनके इस फैसले से सियासी और सरकारी हलके में सनाका खिंच गया था। इस निर्णय में तब के कलेक्टर अनुराग जैन की सकारात्मक सक्रिय भूमिका की उप मुख्यमंत्री ने इस कॉलम के लेखक से खासी प्रशंसा की थी और कहा था एक यंग कलेक्टर है अनुराग जैन बड़ा अच्छा काम कर रहा है। ये आगे जाएगा। उस समय उनके प्रेस अधिकारी आदिल ख़ान भी मौजूद थे।

कुल जमा बात ये कि एक राजनेता की पारखी नज़र ने इस हीरे को तभी पहचान लिया था। हम सब देख रहे हैं कि भोपाल,मंदसौर और मंडला में कलेक्टर रहने के बाद दिल्ली में मोदी सरकार में काम की अनूठी छाप छोड़ी।

नतीजा ये कि मुख्यमंत्री मोहन यादव की पसंद को दरकिनार कर दिल्ली के दखल से मध्यप्रदेश के मुख्यसचिव बनाए गए। उन्होंने कहा था वे रिटायर होने के बाद भोपाल में ही रहेंगे।

इससे सभी को ये उम्मीद भी जगी कि प्रदेश के साथ राजधानी भोपाल भी रहने लायक बनाने के लिए सारे आदर्श मापदंड हासिल करने के लिए सड़क,सीवेज,लाइट,ट्रेफिक सिग्नल, सी सी टीवी कैमरे,साफ़ सफ़ाई,हरियाली,झीलों की सुरक्षा मास्टर प्लान जैस काम हो जाएंगे।

उनको मिली सेवावृद्धि ने भी इस किसिम की उम्मीदों को आगे बढ़ाया। इस कॉलम में उनके सीएस बनने के बाद लिखा था -अनुराग याने द्वेष न राग …

सीएम डॉ मोहन यादव को भी कोई कम अपेक्षाए नहीं थी और अभी भी हैं, आशा हैं वे पूरी होंगी। लेकिन सीएम ने जब चालू वर्ष को कृषि वर्ष घोषित किया तो लगा कि कोई नई योजनाएँ भले ही न आए किसानो के लिए जो चल रहीं उन प्रभावी तरीक़े से अमल हो जाए । लेकिन बड़ा काम आया एमएसपी पर गेहूं खरीदी का और उसमे सरकारी तंत्र बुरी तरह फ़्लॉप रहा।

इसमें सीएम डॉ यादव की तरफ़ से कोई त्रुटि नही हुई उन्हें तो मुश्किल में डाल दिया सिस्टम की असफलता ने। वैसे भी सूबे का किसान हर दिन डॉ यादव की तुलना शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्रित्व काल से करता है।

चर्चा होती है किसानों के प्रति जो प्यार और दर्द चौहान में था वह यादव और उनकी नौकरशाही में नहीं दिखता। गेहूँ ख़रीदी में भारी लेटलतीफ़ी व अव्यवस्था का डैमेज कंट्रोल करने खुद सीएम यादव को ज़मीनी निरीक्षण के मोर्चे पर आना पड़ा। यह स्थिति चिंताजनक है। ओला बारिश में हो रहे नुक़सान ने सरकार की परेशानी बढ़ा दी है।

एक मुख्यमंत्री किसान व जानता की जरूरत को देखते हुए फ़ैसले करता है उनके निर्णय यशस्वी भी रहे लेकिन उन ठीक से अमल नही होने से सब गुड गोबर हो गया। अब इस पर कितनी भी सफाई दी जाए मगर जो बिगड़ना तो वो बिगड़ ही गया।

किसान फिर शिवराज सिंह चौहान को याद कर रहे हैं। ये बड़ी घटना है और हम तो बस इसे हांडी के एक चावल की तरह टटोल कर देख रहे हैं।

अफ़सरों के कार्यकाल पूरे हो जायेंगे लेकिन ज़िम्मेदारी मानी जाती है राजनीतिक नेतृत्व की। कल के दिन जब वोट मांगने के दिन आएंगे तो जवाब और हिसाब सीएम के सिर ही आएगा।

अभी वक्त है श्री अनुराग जैन निसंदेह बेहद काबिल अनुभवी अधिकारी हैं वे हालात को सुधारने का माद्दा रखते भी हैं। अपनी विदाई से पहले सब ठीकठाक कर देंगे।

जबलपुर में बरगी बांध का हादसा भी बड़े दोषियों पर कठोर कारवाई कर नज़ीर पेश करने का दुखद ही सही बड़ा अवसर है।इनमे जितनी देर लगेगी नुकसान उतना बड़ा होगा।क्योंकि किसी के बारे में धारणा एक दिन में न तो बनती है न ही बिगड़ती है।

पुलिस में भी…

इसी तरह सूबे को भाग्य से कैलाश मकवाना जैसे बेहद साफ-सुथरी छवि के कर्मठ व ईमानदार डीजीपी मिले। लेकिन अभी तक उनकी इमेज के मुताबिक पुलिस का एक्शन नजर नहीं आया। लगता है उन्हें फ्री हैंड नहीं मिला। केवल अफसरों की ट्रांसफर पोस्टिंग से ग्राउंड ज़ीरो पर एक्शन होता हुआ नही दिख रहा है। पुलिस पर लूट-डैकेती जैसे संगीन केस तक दर्ज हुए।

मगर कमजोर केस बनाने से केस ही खारिज होना एक दूसरे अपयश का कारण बन गया। पुलिस पर सड़कों से लेकर थाने तक जानलेवा हमले कानून व्यवस्था की दुर्गति का ढोल पीट रहे हैं।

विभाग में प्यार मोहब्बत और थानों में शाम के नशे में पुलिस कर्मियों की खबरें चौकाने वाली है। जो सबको पता है वह सब या यूं कहे उससे भी ज़्यादा सीएस और डीजीपी को मालूम होगा। उम्मीद है सब अच्छा होगा क्योंकि उम्मीद पर दुनिया क़ायम है…

 


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