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छंद के बिना गीत की कल्पना नहीं की जा सकती : डॉ. रामवल्लभ आचार्य

वीथिका            Oct 24, 2026


मल्हार मीडिया भोपाल।

हिंदी लेखिका संघ की छंद, मात्रा, गीत एवं नवगीत पर केंद्रित कार्यशाला में रचनाकारों ने सीखी काव्य-सृजन की बारीकियाँ

मध्यप्रदेश हिंदी लेखिका संघ, भोपाल द्वारा छंद, मात्रा, गीत एवं नवगीत पर केंद्रित एक ज्ञानवर्धक कार्यशाला का आयोजन किया गया। इसमें साहित्यकारों एवं रचनाकारों को छंद विधान, मात्रा गणना तथा गीत और नवगीत की विशेषताओं एवं रचना-प्रक्रिया की व्यावहारिक जानकारी दी गई।

कार्यशाला के प्रथम सत्र में उज्जैन से पधारे सर्वश्री अशोक रक्ताले, कमलेश श्रीवास्तव एवं श्री हरिओम श्रीवास्तव ने विषय के विभिन्न पक्षों पर मार्गदर्शन दिया। द्वितीय सत्र में डॉ. रामवल्लभ आचार्य तथा जबलपुर के श्री संजीव वर्मा ‘सलिल’ ने गीत-नवगीत की रचना प्रक्रिया और छंद के रचनात्मक पक्षों पर विचार व्यक्त किए।

संस्था की अध्यक्ष डॉ. साधना गंगराड़े ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि छंद विधा को समझने और उसके व्यावहारिक पक्षों से परिचित कराने के उद्देश्य से इस कार्यशाला का आयोजन किया गया है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के आयोजन रचनाकारों को साहित्य की तकनीकी बारीकियों से परिचित कराने के साथ उनकी सृजनात्मक क्षमता को भी समृद्ध करते हैं।

श्री अशोक रक्ताले ने मात्रिक एवं वर्णिक छंदों की विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने वर्णिक छंदों के गणों को याद रखने के सूत्र ‘यमाताराजभानसलगा’ की व्याख्या की तथा उदाहरणों के माध्यम से कविता की पंक्तियों में मात्रा गणना करने की विधि समझाई।

श्री कमलेश श्रीवास्तव ने नवगीत की आवश्यकता और प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि नवगीत कम शब्दों में गहरी बात कहने की क्षमता रखता है और पाठक पर प्रभाव छोड़ता है। उन्होंने दोहा जैसे मात्रिक छंद की मात्रा-व्यवस्था और उसकी अभिव्यक्तिगत विशेषताओं को भी स्पष्ट किया।

श्री हरिओम श्रीवास्तव ने कुंडलिया छंद की विशेषताओं और रचना-प्रक्रिया को उदाहरणों के माध्यम से समझाया। उन्होंने बताया कि इस छंद में प्रारंभिक शब्द या शब्द-समूह की पुनरावृत्ति अंत में होती है, जिससे इसकी संरचना में विशिष्टता आती है।

डॉ. रामवल्लभ आचार्य ने गीत में लय और छंद के महत्त्व को रेखांकित करते हुए कहा, “छंद के बिना गीत की कल्पना नहीं की जा सकती।” उन्होंने गीत रचना में लय, छंद और भाव के परस्पर संबंध को स्पष्ट किया।

श्री संजीव वर्मा ‘सलिल’ ने रचनाकारों को मौलिकता बनाए रखने की प्रेरणा देते हुए कहा कि छंद को अपने बच्चे की तरह समझें और अपनी रचनात्मकता के अनुरूप उसे विकसित करें। उन्होंने रचनाकारों से मौलिक प्रयोग करने, अपनी विशिष्ट पहचान बनाने और स्वयं अपनी मिसाल बनने का आह्वान किया।

 

कार्यशाला में उपस्थित पचास से अधिक प्रतिभागियों ने छंद विधान, मात्रा गणना तथा गीत-नवगीत लेखन से जुड़े प्रश्न पूछे। वक्ताओं ने उदाहरणों सहित उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया। इस संवादात्मक प्रक्रिया ने कार्यशाला को और अधिक उपयोगी बनाया।

कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. रंजना शर्मा के स्वस्ति वाचन तथा मधुलिका सक्सेना की सरस्वती वंदना से हुआ। प्रथम सत्र का संचालन डॉ. वर्षा चौबे ने किया तथा महिमा वर्मा श्रीवास्तव ने आभार व्यक्त किया।

 



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