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बापू की त्रिशंकु अवस्था का पाप हम सभी के माथे पर है

खरी-खरी            Oct 04, 2019


प्रकाश भटनागर।
तो लो भाई लोगों। मन गया बापू का हैप्पी बर्थडे। अखबारों और टीवी चैनलों सहित सोशल मंंडिया (जी हां, आशय सोशल मीडिया से ही है) में इतनी अधिक सामग्री चाट डाली कि एक ही दिन में खुद को कहीं दक्षिण अफ्रीका के पीटरमारिट्जबर्ग रेलवे स्टेशन पर औंधे मुंह गिरा पाया तो कहीं साक्षात नाथुराम गोडसे की तीन गोलियां अपनी ओर आती महसूस कर लीं।

यूं नहीं कि मेरे भीतर बापू आ गये थे। ये कलाकारी तो मीडिया की उस टीआरपी की देन थी, जो कल दिन भर शबाब पर रही। शुक्र मनाइए कि बापू को याद करते हुए कोई न्यूज एंकर कैमरे के सामने ही दहाड़ मारते हुए नहीं रोने लगा।

यह भी गनीमत रही कि गुजरे हुए कल के अखबार महात्मा के स्मरण में भावुक हुए संपादकों के आंसू से तर होकर हम तक नहीं पहुंचे। नेताओं को यहां-वहां चरखा चलाते और बापू को फूल अर्पित करता देखकर मेरा यह यकीन और भी गाढ़ा हो गया कि अब जमाना नौ सौ चूहे खाकर हज की ओर जाने वाला नहीं रहा।

अब नौ हजार से भी अधिक ‘सब-कुछ खा-पीकर’ डकार मारने के बाद बापू की प्रतिमा की ओर जाने का युग आ चुका है।

अब यह आपकी मर्जी है कि इस परिवर्तन को आप ‘वक्त है बदलाव का’ से जोड़ लें या फिर इसकी परिधि में ‘अच्छे दिनों’ को खींचकर ले आएं।

दरअसल, कोई रस्म विधिवत निभाने में हम भले ही कच्चे हों, लेकिन उसके लिए आडंबर करने के मामले में भारतीय प्रतिभाओं का दुनिया में और कहीं सानी नहीं है। यही कल भी हुआ। यही आने वाले पूरे एक साल तक बापू की 150वीं जयंती मनाने के नाम पर किया जाएगा।

खादी वस्त्र भंडार चीख-चीखकर कहेंगे कि उनके यहां चरखे सहित बापू की प्रिय खादी पर भारी डिस्काउंट दिया जा रहा है। लेकिन उनकी पुकार विदेशी कंपनियों के आउटलेट्स की चमक-दमक में कहीं खपकर खो जायेगी।

तमाम पार्टी दफ्तरों में सत्य और अहिंसा की शपथ लेने के तुरंत बाद यह तय होने लगेगा कि किस पद अथवा चुनाव के लिए किन ऐसे-ऐसे महानुभवों की सेवाएं ली जाना चाहिए, जिनके राशन कार्ड में महज एकाध हत्या का मामला संबंधित की बहुत बड़ी कमजोरी माना जाएगा।

आम नागरिकों के कत्लेआम के लिए पुलिस को मात्र पंद्रह मिनट तक हटाने की थ्योरी इजाद करने वाले नेता भी साम्प्रदायिक सौहार्द्र की कसमें खाने लगेंगे। सोशल मीडिया के नौटंकीबाज नायक/नायिकाएं ‘बापू-बापू’ की ऐसी करुण पुकार लगाएंगे, जिस शिद्दत से उन्होंने कभी अपने जीते-जागते पिता तक को नहीं पुकारा होगा।

मीडिया बापू के सम्मान में होने वाले तमाम कार्यक्रमों का पूरी ईमानदारी से कवरेज करेगा और साथ ही वह विज्ञापन दिखाने/प्रकाशित करने से भी नहीं हिचकेगा, जिसमें किसी नामी-गिरामी शराब कंपनी के इस उत्पाद का अप्रत्यक्ष रूप से प्रचार होता है।

ये कहना तो गलत होगा कि बापू के प्रति किसी के भी मन में सच्चा आदर नहीं है, किंतु यह कहना सिरे से झूठ होगा कि महात्मा की याद में कल झुके करोड़ों शीश में से सभी के भीतर उनके सिद्धांतों की गंगा बह रही होगी।

फिर बापू तो नाटकीयता बरतने के सर्वाधिक सुलभ साधन हैं। वह ईश्वर नहीं बन सके। इसलिए उनके नाम पर हर किस्म का आडंबर करने की खुली आजादी है।

बापू ईश्वरत्व को प्राप्त हो गये होते, तो यकीन मानिए कि उनकी आह मात्र से 30 जनवरी, 1948 के बाद से अब तक कई सफेदपोश अकाल मौत के शिकार हो जाते। लेकिन ऐसा नहीं है। इसलिए वही हो रहा है, जैसा चलता चला आ रहा है।

हम ढील मिलते ही अंगुली से पोंचा पकड़ने वालों की निर्लज्ज जमात का हिस्सा हैं। हमारा मानना है कि गणपति महाराज भोले-भाले हैं, इसलिए गणेशोत्सव पर उनकी प्रतिमाओं से मनचाहा खिलवाड़ करने को हमने अपनी धार्मिक प्रक्रिया का हिस्सा बना लिया है। लेकिन चूंकि हम देवी को गुस्से वाली मानते हैं, इसलिए दुर्गोत्सव में घिग्घी बांधकर ईश्वर के सम्मान का हम पूरा-पूरा ध्यान रखते हैं।

यकीनन गांधीजी भी गुस्सैल नहीं थे। इसलिए यदि उन्हें देवत्व मिलता, तो भी वह गणेश जी जैसी तासीर के ही बताए जाते। फिर भी कम से कम उनके गुस्से का कुछ डर तो रहता। कम से कम इसी बहाने नौटंकी में वास्तविकता कुछ प्रतिशत में तो आ ही जाती।

आज तो हालत यह कि हमारे स्वांगमय आयोजनों ने गांधी को न इंसान रहने दिया और न ही भगवान बनने के लायक छोड़ा है। देश की आजादी के लिए सर्वस्व का बलिदान करने वाले इस महापुरुष की इस त्रिशंकु अवस्था का पाप हम सभी के माथे पर है। कम से कम मैं तो इस पाप के लिए उनसे पूरी शिद्दत से क्षमायाचना करता हूं।

 


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