चट्टानों ने कब ककहरा पढ़ा था? पहाड़ों ने कब पहाड़े रटे थे? कैसी जिद है कौअे की..

खरी-खरी            Jul 29, 2019


अवधेश बजाज।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी।
आप के प्रति अपने दृढ़ विश्वास तथा आशंका, दोनों से वशीभूत होकर एक दावा कर रहा हूं। वह यह कि आप के पुस्तकालय से गुरू गोलवलकर की किताब ‘बंच ऑफ थॉट्स’ (विचार प्रभाव) निकालकर जलायी जा चुकी होगी।

मौजूदा प्रक्रिया के तहत भाजपा तथा संघ से जुड़े एक-एक व्यक्ति एवं विचार के दिलो-दिमाग से इस पुस्तक के एक-एक अंश को कुरेदकर बाहर निकाल फेंकने का जतन जोरों पर चल रहा होगा।

निश्चित ही आप के लिए ऐसा करना बहुत आवश्यक हो चुका है। वजह यह कि पुस्तक गोलवलकर का वह विचार सामने रखती है, जिसमें व्यक्ति को ईश्वरत्व प्रदान करने से बचने की बात कही गयी है और आप इसी ईश्वरत्व को पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।

आप के इसी रूप के चलते लोकतंत्र खतरे में है। आप ने अरुणाचल प्रदेश में जनमत को कुचला। यही कोशिश उत्तराखंड में की गयी।

हालांकि जनतंत्र की किस्मत थी कि वहां उसकी लाज बच गयी। किंतु वह गोवा और कर्नाटक में ऐसा सौभाग्यशाली नहीं रहा। राजनीतिक चौसर पर गणतंत्र वहां हारा और उसकी मर्यादा को तार-तार कर दिया गया।

देश में आपातकाल के समय बड़ी हायतौबा मची थी। तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने उस दौर की मशहूर सिने तारिका विद्या सिन्हा को एक होटल में नाचने पर विवश कर दिया था।

लेकिन आज तो अघोषित आपातकाल में चहुं ओर लोकतंत्र के शील को भंग कर उसे बाजार की नचनिया बनाने के जतन तेजी पर हैं।

जिन राज्यों में आप ने हुकूमतों पर डाका डाला, वहां इसके लिए जमकर खरीद-फरोख्त की गयी। आलम यह कि दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी को आपने वेश्या के कोठे में तब्दील कर दिया है। ऐसी जगह, जहां पैसा फेंककर किसी के ठुमकों के माध्यम से दिल के बहलाने का इंतजाम किया जाता है।

बल्कि मैं तो साफ कहूंगा कि आप मामले को कोठे से भी एक कदम आगे उस जगह तक घसीट लाए हैं, जहां चंद पैसे की दम पर किसी को स्ट्रीप्टीज बनाकर एक-एक कर अपने कपड़े उतारते हुए नृत्य करने के लिए पेश कर दिया जाता है।

प्रधानमंत्री जी यदि आप के भीतर आत्मा के नाम पर राई के एक दाने बराबर भी तत्व बचा होगा तो मेरा दावा है कि आप मेरे उक्त कथन को अतिशयोक्ति की संज्ञा नहीं दे सकेंगे।

ऐसे हालात ही तो इस समय सारे देश में दिख रहे हैं। किसी ने जरा तेज आवाज की और आप उसे खत्म करने पर आमादा हो जाते हैं।

हरेक कलम पर भय हावी है। सोच पर दहशत तारी है। लबों पर ताले नहीं, कांटे लग चुके हैं। जुबान सिलने का चलन तो कब का बीत चुका। अब तो उसे जड़ से काटकर चील-कौओं के लिए फेंकने का चलन जोरों पर है।

मैं यहीं स्पष्ट कर दूं कि मेरे इस आरोप के केंद्र में स्वयं आप, अमित शाह और आप दोनों की घातक कैमिस्ट्री से है और ‘तेज आवाज’ से आशय आपके विरोध में उठने वाले स्वरों से है।

सत्ता के मद में आप तीनों अंधे हो चुके हैं। तीनों ने मोटी चमड़ी ओढ़ ली है। इस तिकड़ी के सुनने की ताकत इतनी तीक्ष्ण कि वहां आवाज उठी और यहां उसे समूल कुचलने का बंदोबस्त कर दिया गया।

आप ने पत्रकारों की उस जमात को कुचलकर रख दिया, जो सच को सच कहने की ताब रखती थी। जो आपके आधीन हो गये, उन्हें गुलाम बना दिया गया। जिन्होंने ऐसा नहीं किया, उनको कुछ भी और करने के लायक नहीं छोड़ा गया।

जिस कलम ने आप के अनुकूल स्याही नहीं उगली, उसे या तो अर्बन नक्सलाइट का जामा पहना दिया गया या फिर वामपंथी कहकर दबाने के दुष्प्रयास हो रहे हैं।

आपकी हुकूमत में सोचने की ताकत शोचनीय स्थिति में लायी जा चुकी है। जनवादी या प्रगतिशील लेखक आपस में मूक-बधिरों की तरह संवाद करने को विवश हैं।

कारण है आपके द्वारा पनपायी गयी आतंक की खेती। यह अमरबेल बनकर देश के हर स्वच्छ एवं स्वस्थ विचार को चूसकर खत्म करती जा रही है।

यहां मैं पूर्ण श्रद्धा के साथ दिवंगत राजेंद्र यादव की स्मृति को नमन करना चाहूंगा। उन्हें सच्चा भविष्यदृष्टा कहूंगा। यादव ने ‘हंस’ पत्रिका में गुजरात दंगों के बाद आपकी तुलना एक आक्रांता के साथ की थी।

आज उनका वह लिखा शब्दश: सही साबित हुआ है। आप भी सारे देश को तहस-नहस करने पर आमादा हैं। सच मानिये यादव आज जीवित होते तो अपने लिखे में एक बहुत आवश्यक संशोधन करते। वह आपको आक्रांता की बजाय आततायी बताते।

मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरे द्वारा आपके लिए ‘आततायी’ शब्द का प्रयोग स्वर्गीय यादव के लिए सच्ची श्रद्धांजलि साबित होगा।

कभी आंख खोलकर देखिये कि हो क्या रहा है। शबाना आजमी सच कहती हैं तो उसका जवाब पायल रोहतगी दे रही हैं। ग्लैमर जगत में जिस्म-दिखाऊ छवि की धनी रोहतगी तो आप की ब्रांड एम्बेसेडर बन गयी प्रतीत होती हैं।

रही-सही कसर आप ने पैसों के लिए ठुमके लगाने वाली सपना चौधरी को पार्टी में शामिल कर के पूरी कर दी है। अब होगा यह कि शबाना को भी सच बोलने वाले अन्य लोगों की तरह हालात की कालकोठरी में धकेल दिया जाएगा और रोहतगी तथा चौधरी जैसे चेहरे आपके आशीर्वाद से राज्यसभा का माहौल कलंकित करते नजर आने लगेंगे।

मोदी जी, अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता फिर कायम होने के बाद की बात है। कई छायाचित्र देखे थे उस समय। किसी को पीट-पीटकर नमाज के लिए बाध्य किया जा रहा है। किसी पर हमला मात्र इसलिए कि उसने दाढ़ी नहीं रखी थी। फिर बमियान में गौतम बु:द्ध की प्रतिमाओं पर बम बरसाने के दृश्य तो आप ने भी देखे ही होंगे।

क्या मामूली परिवर्तित, किंतु बेहद घातक स्वरूप के साथ ही ऐसा यहां भी नहीं हो रहा है! मॉब लिंचिंग गैंग। वंदे मातरम् गिरोह। भारत माता की जय वाला माफिया। सच की हरेक अलख पर की जा रही अघोषित बमबारी। यह सब तालिबानी शासन नहीं है तो और फिर क्या है?

सच कहूं तो दिल्ली इस समय आतंक के संचार का मुख्य स्रोत बनकर रह गयी है। आम आदमी आपसे खौफजदा है। नोटबंदी और जीएसटी के परिणाम देखता हूं तो मस्तिष्क पटल पर मानो हिरोशिमा और नागासाकी के विनाश की तस्वीरें चलने लगती हैं।

नोटबंदी ने दो करोड़ लोगों का रोजगार छीन लिया। ऐसे बेकसूर आपके न्यू इंडिया की बलिवेदी पर कुर्बान कर दिये गये! अब आपका नया विनाश चक्र चलता दिख रहा है।

तमाम सरकारी उपक्रमों का निजीकरण किया जा रहा है। छोटे और फुटकर व्यापारी आपकी राजनीतिक मंडी में निर्वस्त्र कर नीलामी के लिए खड़े कर दिये गये हैं। करोड़ों परिवार रोजी-रोटी से वंचित होने की कगार पर लाये जा चुके हैं।

निश्चित ही ऐसे लोग और उन के परिवारों का रुदन आप के कान तक नहीं पहुंचता है। क्योंकि परिवार नामक संस्था से आपने रेशे मात्र तक का नाता नहीं रखा।

विवाहिता होने के बावजूद त्याज्य का जीवन जीतीं जशोदाबेन। छोटा-मोटा व्यवसाय कर परिवार का पेट पालते आपके भाई। केवल आपकी यूएसपी की खातिर रह-रहकर इस्तेमाल की जातीं आपकी माताजी।

ये सब आपकी महानता नहीं, अपितु आपकी आत्मरति का जीता-जागता और घृणास्पद उदाहरण हैं। जब आप अपनी अनर्थकारी अर्थ नीतियों से देश के अनगिनत परिवारों के चूल्हे पर पानी डालते हैं, तब यही समझ आता है कि ऐसे षड्यंत्रों को वही शख्स अंजाम दे सकता है, जो परिवार नामक संस्था का अपनी सियासी आकांक्षाओं वाले काले सागर में पहले ही तर्पण कर चुका है।

फिर आप तो अपने दल को ही दलदल में धकेलने का पूरा बंदोबस्त कर चुके हैं। भाजपा में अब अटल बिहारी वाजपेयी का कोई नामलेवा नहीं बचा। उन्हें बचने नहीं दिया गया। जो है, मोदी है। बचा-खुचा यदि कुछ है तो वह मोदीमय अमित शाह है।

मोदी जी, गुरू गोलवलकर ने तो व्यक्तिवाद का विरोध किया था, तो उन का नाम जपने वाले आप क्यों पूरी तरह व्यक्तिवाद लागू करने पर उतारू हो गये हैं? कहां गयी भाजपा की वह पीढ़ी, जिसे पंडित दीनदयाल उपाध्याय या श्यामाप्रसाद मुखर्जी का नाम पूरी श्रद्धा एवं अनुसरण के भाव से लेने का रियाज कराया गया था?

यह सब षड्यंत्रपूर्वक आपके द्वारा खत्म किया गया। परिणाम यह कि अब भाजपा नहीं मोदी शेष है। अब संगठन नहीं, शाह का ही अस्तित्व बचा है। आप के मंत्री भयाक्रांत हैं। भाजपा के सांसद हर समय ‘सिट्टी-पिट्टी गुम’ वाले भाव से घिरे दिखते हैं।

प्रधानमंत्री जी, मीसाबंदियों की खासी आबादी अब भी जिंदा है। इस पत्र के माध्यम से मैं उन से पूछना चाहूंगा कि इंदिरा गांधी का आपातकाल क्या आप के इस संस्कारित आपातकाल से ज्यादा भयावह था?

मोदी जी, आप से मेरी पहली मुलाकात स्व. सुंदरलाल पटवा के आवास पर हुई थी। तब आप प्रभात झा से मध्यप्रदेश में दौरे करने संबंधी टिप्स ले रहे थे। किस कदर विनम्र दिखे थे तब आप।

वजह यह कि वह आपके गरजमंद होने का समय था। अब आप केवल गरज रहे हैं, वह भी मंद स्वर में नहीं, अपितु पूरी ताकत से।

ताकत उस लोकतंत्र की, जिसे आप ने अपने अधीन बना रखा है। आरम्भ से लेकर अब तक बताये गये प्रपंचों के माध्यम से। अरुणाचल प्रदेश में आप ने जनमत का चीरहरण किया।

एक कामयाबी मिली तो आप और शाह पेशेवर की तरह इस काम में जुट गये। गोवा में कांग्रेस लगभग खत्म कर दी गयी। कर्नाटक में सरकार का वध किया गया। अब मध्यप्रदेश और राजस्थान आपके राडार पर बताये जा रहे हैं।

आप की मोडस ऑपरेंडी देखकर मुझे पूरी आशंका है कि इन दो राज्यों में भी आप अपने सर्वाधिक विश्वसनीय तड़ीपार से मिलकर गणतंत्र को मर्यादा की सीमाओं से तड़ीपार करने का खाका तैयार कर चुके होंगे।

आप अपने अहं की तुष्टि के लिए लोकतंत्र को शोकतंत्र बनाने पर आमादा हैं और वह भी पूरे शौक के साथ।

पूरी आशंका यही है कि इस शोकतंत्र को आप और शाह अब भोगतंत्र में तब्दील करने में कोई कसर नहीं उठा रखेंगे। लेकिन याद रखिए कि इसकी प्रतिक्रिया होगी। उनकी ओर से जो आप से आज भी नहीं डरते।

ऐसा वे भी करेंगे, जिनके भीतर सच के अंगारे आपकी तमाम कोशिशों के बाद भी बुझ नहीं सके हैं। ऐसे समूह की ओर से ही आप को कुछ पंक्तियां समर्पित कर रहा हूं।

किसी ने लिखा है, ‘चट्टानों ने कब ककहरा पढ़ा था? पहाड़ों ने कब पहाड़े रटे थे? ये कैसी जिद है कौअे की कि सब उसकी भाषा बोलें!’ इसके भीतर का भाव तो आप समझ ही गये होंगे। अब इस भाव के साकार रूप में अपने सामने आने का इंतजार कीजिए। यकीन मानिए, ऐसा होगा और उसका बहुत जल्दी होना तय है।

-लेखक बिच्छू डॉट कॉम के संपादक हैं



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