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इस गांडीव के तीर मर्मांतक जख्म देने में माहिर हैं

खास खबर            Aug 30, 2019


प्रकाश भटनागर।
कसम से। मन कर रहा है कि दिग्विजय सिंह के लिए सजदे में अपने घुटनों तक झुक जाऊं। उनके दस साल के उस स्वरूप को सरासर झूठ मानकर बिसरा दूं, जिसमें मुख्यमंत्री बनते ही वह पहले राजा और फिर तानाशाह बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ते चले गये थे। मामला ही कुछ ऐसा है।

पूर्व मुख्यमंत्री ने कमलनाथ मंत्रिमंडल के सदस्यों को पत्र लिखा है। वह जानना चाहते हैं कि मंत्रियों को उनके द्वारा प्रेषित किये गये पत्रों पर क्या-क्या कार्यवाही हुई है?

जाहिर है कि सिंह शब्दों के चयन में कुछ रियायत कर गये, वरना तो निश्चित ही उन्होंने पत्र में 'कार्यवाही' की जगह 'अमल' या 'आज्ञा का पालन' शब्द का प्रयोग ही किया होता।

अब समानांतर मुख्यमंत्री की व्यवस्था है तो तमाम मंत्रियों का बेचैन हो जाना स्वाभाविक है। हां, कुछ ऐसे हो सकते हैं जो इस राजा को अपने महाराजा की तुलना में न के बराबर तवज्जो देने के चक्कर में शायद समय न दें।

हां, यह तय मानिए कि बाकी विभाग जानकारी उपलब्ध कराने में विधानसभा सचिवालय से आने वाले प्रश्नों से भी अधिक फुर्ति दिखा चुके होंगे।

क्योंकि यहां 'जानकारी एकत्रित की जा रही है' या 'विस्तृत जानकारी पुस्तकालय में उपलब्ध है' वाली शैली राजकोप का शिकार बना सकती है। क्योंकि यह अविलंबनीय लोक महत्व का मामला है और जिस शख्स से जुड़ा है, उसे ध्यानाकर्षण से अधिक दक्षता काम रोको प्रस्ताव को अमल में लाने की है।

आखिर इस पत्र की जरूरत क्या पड़ गयी? कैबिनेट की अघोषित बैठक बुलाकर भी मंत्रियों से प्रोग्रेस रिपोर्ट तलब की जा सकती थी। लगे हाथ पता चल जाता कि प्रदेश में तबादला उद्योग कैसा चल रहा है।

जी हां, सिंह ने पत्र में विशेष रूप से जिक्र किया है कि उन्हें तबादलों से संबंधित कार्यवाही की भी जानकारी लेना है। राजा साब का जयघोष करने वालों की दृष्टि से देखें तो पूर्व मुख्यमंत्री ने ऐसा करके जता दिया है कि राज्य में सरकार चाहे जिसकी भी हो, असरकारी वह खुद ही हैं।

दिग्विजय को नजदीक से जानने वालों का नजरिया कहता है कि यह मंत्रियों पर अपनी पकड़ की कसावट को परखने का तरीका हो सकता है। उनसे नाखुश तबके का मत है कि ऐसा करके निर्वाचित सरकार के कामकाज में अनावश्यक हस्तक्षेप किया जा रहा है।

लेकिन अपना मानना है कि यह चर्चा में बने रहने के जतन से अधिक और कुछ नहीं है। क्योंकि इस पत्र को बकायदा सार्वजनिक किया गया है। दिग्गी इस शैली वाले खेल के पुराने उस्ताद हैं। इसमें किसी को राई बराबर भी संदेह नहीं होना चाहिए।

एक बात अच्छी है। दिग्गजों के ऐसे-ऐसे रुख के चलते इस प्रदेश को मिर्ची बाबा या कंप्यूटर बाबा जैसे मसखरों के कारनामे सुनने-झेलने की कोई जरूरत नहीं रह गयी है। जो हो रहा है, वह उच्चस्तरीय है।

उन लोगों के द्वारा किया जा रहा है, जिनका मानसिक एवं सियासी स्तर सत्ता सुख के लालच में दौड़े जा रहे किसी ढोंगी बाबा से बहुत ऊंचा है। कितने मंत्री पूर्व मुख्यमंत्री को मिलने का समय देते हैं, यह जानना महत्वपूर्ण नहीं है।

महत्व इस बात का है कि पत्र के बाद कमलनाथ के कितने वजीर खुद ही दौड़कर दिग्गी राजा के श्यामला हिल्स स्थित सरकारी किले की ओर दौड़ते नजर आएंगे। यह मैराथन ही बताएगी कि पूर्व मुख्यमंत्री का दम-खम अभी कितना बचा है।

तिवारी कांग्रेस के दौर में अर्जुन सिंह एक मर्तबा मध्यप्रदेश विधानसभा की अध्यक्षीय दीर्घा में आ बैठे थे। देखते ही देखते दिग्गी मंत्रिमंडल के कमोवेश सारे सदस्य दीर्घा में पहुंकर उनकी चरण रज माथे पर लगाते नजर आ गये थे।

दिग्विजय का पत्र भी इसी तरह का जतन है। ताकत दिखाने का, समर्पण देखने का। हां, यह याद दिला दें कि जो संख्या अर्जुन सिंह के चरणों में झुकी थी, उसका दशमलव प्रतिशत भी उनके साथ तिवारी कांग्रेस में नहीं गया था।

क्योंकि अर्जुन के पास तब सत्ता रूपी गांडीव नहीं था। उस पर दिग्विजय का कब्जा था। दिग्विजय खुशकिस्मत हैं कि राजनीतिक भाई ने अपना यह गांडिव उन्हें सौंप रखा है।

इस गांडिव के तीर मर्मांतक जख्म देने में माहिर हैं, यह किसी से नहीं छिपा है।

 


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