हाथ में डिग्री की जगह हुनर जरूरी

खास खबर            Jul 06, 2019


राकेश दुबे।
बड़े डरावने आंकड़े हैं, बढ़ती बेरोजगारी के। ज्यादा चिंताजनक है, शिक्षित बेरोजगारों के आंकड़े।

देश में जब से शिक्षा बाज़ार का विषय हुई है, ऐसे शिक्षित बेरोजगारों की फ़ौज निकल रही है, जिनके पास डिग्री डिप्लोमा है पर हाथ में काम नहीं है। हाथ में डिग्री लिए भटकते नौजवान हर जगह दिखते हैं।

हुनर कौशल या इसे कुछ भी नाम दे, इन हाथों में नहीं है। इसका समाधान महात्मा गाँधी ने आज़ादी के पहले ही सुझाया था।

किसी सरकार ने नहीं माना अब पिछले दो सालों से कौशल विकास की बात चली है। नतीजे कब आयेंगे, राम जाने।

महात्मा गांधी ने मैकाले से पृथक एक नई पद्धति नई तालीम पर जोर देते हुए ठीक ही कहा था कि “नयी तालीम का विचार उनका अन्तिम एवं सर्वश्रेष्ठ योगदान है।“ उसे किसी ने नहीं माना और स्कूल से लेकर व्यवसायिक शिक्षा के दरवाजों को बाज़ार के लिए खोल दिए।

आज स्कूल से लेकर व्यवसायिक महाविद्यालय से निकलने वाले नौजवानों के हाथ में डिग्री तो होती है, हुनर या कौशल नहीं।

गांधीजी ने जीनव-पर्यन्त किये सत्य के अन्वेषण एवं राष्ट्र के निर्माण हेतु सक्रिय प्रयोगों के माध्यम से लम्बे समय तक विचारों के गहन मंथन के परिणामस्वरूप नयी तालीम का दर्शन एवं प्रक्रिया परिभाषित की।

जो केवल भारतवर्ष ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण मानव समाज को एक नयी दिशा देने में सक्षम थी। दुर्भाग्यवश, इस सर्वोत्तम कल्याणकारी शिक्षा-प्रणाली का राष्ट्रीय स्तर पर भी समुचित प्रयोग नहीं हो पाया।

जिसके फलस्वरूप आज तक देश सार्थक और सही स्वराज प्राप्त करने में असमर्थ रहा।
इसके विपरीत आज तो आलम यह है कि शैक्षणिक,सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से भारत पुनः पाश्चात्य साम्राज्यवाद के अधीन निरन्तर सरकता चला जा रहा है।जिससे भारत की अस्मिता एवं संस्कृतियों के उदय, विकास और विलोम होते जा रहे हैं।

आज केवल प्राचीन आध्यात्मिक धरोहर एवं सांस्कृतिक परम्पराएं ही नहीं, अपितु समस्त विविध जीवन–पद्धति, अस्मिता एवं स्थानीय विधाओं का समूल नाश वैश्वीकरण के नाम पर हो रहा है।

आज इस देश की अधिकांश शिक्षा-व्यवस्था पूंजीपतियों पर या नवधनाड्य राजनीतिज्ञों पर आश्रित है। अधिकांश राज्याश्रित शिक्षण-संस्थाएँ, संसाधन एवं अनुशासन के अभाव में निष्क्रिय हैं। इसलिए गुणवत्ता से युक्त शिक्षा देने में असमर्थ हैं।

इसी प्रकार पूजीपतियों पर आश्रित सभी शिक्षण-संस्थाएं व्यावसायिक रूप में सक्रिय हैं, जो गरीबों की पहुंच से बाहर हैं। उनमें सिर्फ सम्पन्न लोगों के बच्चे ही पढ़ सकते हैं।

भारत की स्वाधीनता के इतने वर्ष बीतने के पश्चात् भी ऐसे बच्चों की संख्या अभी भी अधिक है, जिन्होंने विद्यालय के द्वार तक नहीं देखे हैं। इसके विपरीत जो विद्यालय जाने का सामर्थ्य रखते हैं,उन्हें लॉर्ड मैकाले की परम्परा से चली आ रही अंग्रेजी शिक्षा के अतिरिक्त कुछ भी प्राप्त नहीं होता।

यह बात नहीं कि भारतीय शिक्षा देनेवालों का अभाव है, परन्तु सभी अभिभावकों में यह इच्छाशक्ति एवं साहस नहीं है कि अपने बच्चों को सरकारों अथवा पूंजीपतियों द्वारा निर्धारित अंग्रेजी शिक्षा को त्यागकर भारतीय शिक्षा दिलावें।

जनसाधारण की कायरतापूर्ण मानसिकता में जब तक परिवर्तन नहीं होगा , तबतक नयी तालीम सहित कोई भी भारतीय शिक्षण-प्रणाली इस देश में पनप नहीं सकती।

ऐसी स्थिति में शिक्षा-स्वराज्य की सम्भावना लगभग क्षीण ही लगती है। एक ओर जहां आधुनिक शिक्षा रोजगार उन्मुख होने का दावा करती है तो दूसरी ओर तथाकथित शिक्षित बेरोजगारों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होती चली जा रही है।

उसी प्रकार एक ओर मूल्य-शिक्षा, नैतिक शिक्षा, पर्यावरण सम्बन्धी शिक्षा आदि की चर्चा होती है तो दूसरी ओर शिक्षित जगत् में अनैतिक आचरण करनेवालों की बहुलता दृष्टिगोचर हो रही है, एक वर्ग इसे पूरी तरह साम्प्रदायिक बनाने पर आमादा है।

इन विरोधाभासों को साक्षात् देखते हुए भी उनका समाधान खोजने का साहस किसी में नहीं है।

इसलिए विद्यालयों को राज्याश्रित अथवा पूजीपति आश्रित न होकर श्रमाश्रित एवं स्वावलम्बी बनाया जाय।

हमें इसी ओर सतत प्रयास करना होगा। यह भी नितान्त आवश्यक है कि जब तक सामाजिक संरचना एवं आदर्शों में परिवर्तन न हो तब तक शिक्षा की दिशा में भी आमूल परिवर्तन अत्यन्त दुष्कर है।

 


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