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उप्र में योगी को पीछे कर मोदीजी ने कमान सम्हाल ली है

राजनीति            Dec 19, 2021


शैलेष शर्मा।

उप्र में 18 दिसंबर को हुई इनकम टैक्स की छापेमारी के कई मायने हैं। एक तो इसे मायावती को खामोश रखने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है,दूसरा उप्र के चुनावों को दो पक्षीय दिखाने के तौर पर, याने भाजपा बनाम सपा और तीसरी बड़ी वजह आज की कांग्रेस की अमेठी में होने वाली बड़ी रैली से लोगों का ध्यान हटाने के लिए जिसमे राहुल आज अपने पुराने संसदीय क्षेत्र में ढाई साल बाद लौटे।

सरकार नहीं चाहती कि रैली में उमड़ी भारी भीड़ देख कर जनता ये न मान बैठे कि राहुल कहीं उप्र में अपने पैर न जमा लें। पहले कांग्रेस जो उप्र से ढाई दशक पहले उखड़ चुकी थी धीरे—धीरे अपने पैर जमाते दिख रही है।

जानकार बताते हैं कि जिस कांग्रेस की हैसियत महज़ 6%  या 7% की थी वो इस चुनाव में भले ही सीट 10 से 15 जीते पर कुल वोट 13% से 15% तक ले जा सकती है।

इसलिए भाजपा की तरफ से योगी की जगह मोदी जी ने कमान सम्हाल ली है और हिन्दू हृदय सम्राट योगी जी को पीछे कर दिया गया है।

यदि ऐसा न होता तो ये छापे सपा के छुटभैये नेताओं के बजाय शिवपाल सिंह यादव, रामगोपाल यादव, मुलायमसिंह और अखिलेश यादव के यहां पड़ते और शाम को इनकम टैक्स विभाग की टीम बोरे में भर कर नोट ले जाती और इन नेताओं के घर के बाहर योगी जी का बुलडोजर उनका स्वागत करता।

भाजपा और संघ का पूरा ध्यान मायावती के दलित वोट बैंक की तरफ है और पिछले एक साल से इस दिशा में काम भी चल रहा है जिसके तहत दलित लोगों के यहां चुनाव तक फ्री का राशन दिया जा रहा है और पिछड़ों को बड़ी तादाद में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान भी मिल रहे हैं।

उप्र की चुनौती गंभीर है क्योंकि मुसलमान और यादव एक तरफा सपा के साथ है और कांग्रेस 2022 की नहीं बल्कि सन 2024 की तैयारी कर रही है। क्योंकि सन 2022 में उसे अपना हश्र मालूम है अलबत्ता उसके साथ ऊंची जाति की महिला और उच्च जाति के वोट फिर मुड़ते दिखाई दे रहे हैं।

यकीन मानिए कि यूपी का चुनाव मोदी बनाम दूसरे दल बनता दिख रहा है जो बाद में हिन्दू बनाम मुस्लिम बन सकता है।

बहरहाल अभी भी भाजपा थोड़ा सा आगे है लेकिन अखिलेश भी तेजी से ऊपर आते दिख रहे हैं और मोदी जी के लाल टोपी के बयान की यदि पुनरावृत्ति हुई तो उप्र के चुनाव बंगाल के चुनाव बन सकते हैं तभी तो इन चुनावों की कमान योगी के बजाय मोदी और शाह के हाथों में है।

यकीन मानिए यदि हिन्दू-मुस्लिम का तिलस्म टूटा तो ये चुनाव बेहद दिलचस्प दौर में पहुंच जाएगा।

लेखक स्वतंत्र लेखक हैं और यह टिप्पणी उनकी फेसबुक वॉल से ली गई है।

 


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