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राजनीतिक विश्लेषण पूर्णतः आग्रहमुक्त नहीं हो सकते

खरी-खरी            Jun 30, 2026


हेमंत कुमार झा।

एक दौर बीतने के बाद इतिहास हर क्रांति और आंदोलन की शव परीक्षा करता है और उसके वास्तविक चरित्र को उजागर करता है। निर्भर इस पर करता है कि किसी आंदोलन के चारित्रिक विश्लेषण और उसके निष्कर्षों का सही समय कब आता है।

अन्ना आंदोलन और जेपी की संपूर्ण क्रांति के विश्लेषण में अंतर यह है कि जहां अन्ना आंदोलन की परतें एकाध बरस बीतने के बाद ही उधड़ने लगीं वहीं संपूर्ण क्रांति के प्रभाव इतने गहरे थे और फैलाव इतना व्यापक था कि इसके वास्तविक चरित्र और निष्कर्षों तक पहुंचने के लिए पचास वर्ष का अंतराल भी बहुत अधिक नहीं है।

जेपी आंदोलन के सेनानियों की पीढ़ी अभी पूरी तरह तिरोहित नहीं हुई है और जब तक वे हैं, नैरेटिव्स की एक धारा उनके साथ सतत चलती रहेगी। उस आंदोलन से जुड़े पत्रकार, बुद्धिजीवी और उत्साही सामाजिक योद्धाओं ने चिंतन और अनुभवों के जिस फ़लक पर जाकर जेपी की संपूर्ण क्रांति का विश्लेषण करते हुए किताबें लिखी हैं, आलेख लिखे हैं, लिख भी रहे हैं वे हमें उस दौर की चुनौतियों और जटिलताओं से रूबरू तो कराती हैं लेकिन उनमें किसी शोधप्रज्ञ के पूर्णतः तटस्थ मानस की तलाश हम नहीं कर सकते।

चूंकि वे उस दौर में जी रहे थे, अच्छे या बुरे अनुभवों से गुजर रहे थे तो उनके अपने आग्रहों का उनके लेखन के साथ चलते रहना स्वाभाविक है। वे हमारे लिए प्रामाणिक संदर्भ हो सकते हैं, निष्कर्षों तक तो किसी शोधप्रज्ञ को स्वयं ही पहुंचना होगा।

पांच दशक बीतने के बाद अब समय आ गया है कि जेपी की संपूर्ण क्रांति, उसमें समाजवादियों, राष्ट्रवादियों, साम्यवादियों और जनता के बीच के सामाजिक-आर्थिक वर्गों की भूमिकाओं का तटस्थ मूल्यांकन हो। यह भी देखना होगा कि वह क्रांति अपने नाम के अनुरूप कितनी और किन अर्थों में संपूर्ण या अधूरी थी और अपनी संपूर्णता या अधूरेपन में उसने भारतीय राजनीति और समाज पर क्या प्रभाव छोड़े।

आज अगर भारत में राजनीति का सांप्रदायिक रूप केंद्रीय भूमिका में है और आर्थिक वैचारिकी के मामले में विपन्न भाजपा ने देश को अविवेकी निजीकरण और संवेदनहीन श्रमिक नीतियों के जाल में उलझा दिया है तो इन परिस्थितियों के निर्माण में कितनी भूमिका अन्ना आंदोलन की है और कितनी भूमिका जेपी आंदोलन की, इस पर विचार करना होगा।

यद्यपि विश्लेषक इसकी जड़ें राम मनोहर लोहिया के "जिद्दी" गैरकांग्रेसवाद से भी जोड़ते हैं और इसके लिए उनके पास पर्याप्त आधार भी हैं, लेकिन यह भी देखना होगा कि जयप्रकाश नारायण के "इंदिरा विरोध" के आग्रहों में वह कैसी इंटेंसिटी थी, वह कैसा ज़िद्दीपन था जिसमें उन्हें उनके उस वक्तव्य से जोड़ा जाता है कि "यदि संघ फासिस्ट है तो मै भी फासिस्ट हूं"।

जेपी के इस वक्तव्य को लेकर विश्लेषकों के अपने अपने विचार और मत मतांतर हैं किन्तु इसमें संदेह नहीं कि संपूर्ण क्रांति और जनता पार्टी के गठन में तब के भारतीय जनसंघ को प्रत्यक्ष और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को अप्रत्यक्ष रूप से जोड़कर उन्होंने राजनीति की इस विवादास्पद और कई संदर्भों में "अस्पृश्य" मानी जाती धारा को जो स्वीकार्यता प्रदान की वह निर्णायक साबित हुआ।

भारतीय जनमानस में जेपी का बहुत अधिक सम्मान था और वे इसके हकदार भी थे। वे उस पीढ़ी के अग्रणी और अतिमहत्वपूर्ण नेताओं में थे जिन्होंने अपने व्यक्तिगत और पारिवारिक स्वार्थों को पूर्णतः तिलांजलि देकर अपने आपको भारतीय समाज के लिए समर्पित कर दिया था।

उनकी बातें जनता ध्यान से सुनती थी और उन पर न्योछावर होने के लिए तत्पर लोगों की कोई कमी नहीं थी।

कांग्रेस की समाजवादी धारा से निकले जेपी ने किन परिस्थितियों में और क्यों आरएसएस के प्रति ऐसी वैचारिक उदारता को एडॉप्ट किया और संघ, प्रकारांतर से जनसंघ ने अपनी स्वीकार्यता के विस्तार के लिए इसे किस प्रकार एक अवसर के रूप में लिया, यह अब की नई पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी बेहतर विश्लेषित कर सकती है।

इमरजेंसी, संपूर्णक्रांति, जनता पार्टी आदि की पृष्ठभूमि में इंदिरा गांधी के युगांतरकारी राजनीतिक-आर्थिक निर्णयों के प्रति तब की राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक शक्तियों की कैसी प्रतिक्रियाएं थीं, यह अब के समय में और आने वाले समय में बेहतर और अधिक तटस्थ तरीके से विश्लेषित, मूल्यांकित किया जा सकेगा, क्योंकि, यही सबसे महत्वपूर्ण और सबसे विवादास्पद अध्याय होंगे।

एक झटके में बैंकों के राष्ट्रीयकरण, रजवाड़ों के प्रिवी पर्स उन्मूलन आदि जैसे निर्णयों ने इंदिरा गांधी की आर्थिक, सामाजिक नीतियों का जो पक्ष उजागर किया था और पाकिस्तान को दो फाड़ कर बांग्लादेश के निर्माण और पोखरण के परमाणु परीक्षण ने एक प्रधानमंत्री और राजनीतिक नेता के रूप में उनके आभामंडल का जो विस्तार किया था, उससे तत्कालीन भारतीय समाज की कौन सी राजनीतिक-आर्थिक शक्तियां किस तरह प्रभावित हो रही थी, विदेशी ताकतों के अपने कौन से हित-अहित थे और इन संदर्भों में वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, किस तरह रिएक्ट कर रहे थे...इन तमाम तथ्यों की आग्रहमुक्त, तटस्थ पड़ताल की जरूरत है।

इमरजेंसी और जेपी की संपूर्ण क्रांति के गहन और तथ्यपरक विश्लेषण के लिए पांच दशकों का बीतना एक आवश्यक अंतराल मान सकते हैं क्योंकि उस दौर ने भारतीय राजनीति को अंतहीन विवादों की श्रृंखला से जोड़ दिया है और किसी शोधप्रज्ञ की तरह तटस्थ मानस ही इसके निष्कर्षों का तथ्यपरक विश्लेषण कर सकता है। इसमें न जेपी भक्ति की कोई भूमिका हो सकती है न इंदिरा  गांधी के वैचारिक समर्थन या विरोध की।

राजनीतिक विश्लेषण पूर्णतः आग्रहमुक्त नहीं हो सकते, इतिहास लेखन में भी इतिहासकार के आग्रहों की भूमिका से इन्कार नहीं कर सकते लेकिन इन्हीं सबके बीच वर्तमान और भावी पीढ़ी को निष्कर्षों का विश्लेषण करना होगा, तथ्यों तक पहुंचना होगा।

आज के भारत के राजनीतिक परिदृश्य को हम साठ के दशक के लोहिया के गैरकांग्रेसवाद, सत्तर के दशक के जयप्रकाश के संपूर्ण क्रांति आंदोलन, अस्सी के दशक के वीपी सिंह के बोफोर्स अभियान और नई सदी में अन्ना आंदोलन के सामूहिक फलितार्थों से जोड़ कर ही समझ सकते हैं।

स्वातंत्र्योत्तर भारत के इन चारों अध्यायों ने अपनी अपनी जरूरतों के अनुसार संघ के नेटवर्क का दोहन किया, उनका समर्थन हासिल किया, उन्हें समर्थन दिया और इस तरह क्रमशः क्रमशः एक ऐसी वैचारिकी को राजनीतिक वैधता देते गए जो अपनी रणनीतिक कुशलता से इसे जनस्वीकार्यता में बदलती गई और आज भारत की न सिर्फ केंद्रीय राजनीतिक शक्ति है बल्कि कई विश्लेषक मान रहे हैं कि यह शक्ति अब एकमात्र शक्ति के रूप में स्थापित होने और रहने की रणनीतियों पर भी काम कर रही है।

यह इतिहास तय करेगा कि ऊपर उल्लेख किए गए चारों दौर में तात्कालिक उद्देश्यों को हासिल करने के लिये जो राजनीतिक कदम उठाए गए उनमें कितनी दूरदर्शिता से काम लिया गया और देश के व्यापक हितों और जनपक्षीय राजनीति के संदर्भ में इन कदमों के क्या दूरगामी परिणाम हासिल हुए। निस्संदेह, उन चारों में सर्वाधिक जटिल होगा इंदिरा गांधी की इमरजेंसी और जेपी की संपूर्ण क्रांति के दौर का विश्लेषण।

इमरजेंसी लगाने की कितनी जरूरत थी, लगा दिए जाने के बाद संजय गांधी और उनकी कोटरी की संविधानेतर सत्ता के क्या दुष्परिणाम सामने आने लगे, पुलिस का कितना वीभत्स चेहरा सामने आया, इन परिस्थितियों का लाभ लेकर जनरोष की लहर पर सवार होकर किन देशीविदेशी शक्तियों ने, किन राजनीतिक, आर्थिक शक्तियों ने कैसे राजनीतिक खेल खेले, जयप्रकाश नारायण का कैसा उपयोग किया गया और खुद जेपी कहां के लिए चले थे और देश को कहां पहुंचा कर महाप्रयाण कर गए, संपूर्ण क्रांति की कोख से निकल जेपी सेनानी से राजनेता बने नई पौध के नेताओं ने भारतीय राजनीति में कैसी भूमिकाएं निभाई...इन सबों के निर्मम परीक्षण और विश्लेषण की जरूरत है।

समय आता है कि इतिहास अतीत के महानायकों और महान घटनाओं के मूल्यांकन में वर्तमान का विश्लेषण करते हुए नई कसौटियों का निर्माण करता है और उन्हें पुनर्परिभाषित करता है। पांच दशक बीतने के बाद अब की पीढ़ी सत्तर के दशक के उस दौर का यथासंभव आग्रहमुक्त, निर्मम और तथ्यपरक विश्लेषण कर सकती है, करने भी लगी है।

लेखक पाटलीपुत्र यूनिवर्सिटी में एसोशिएट प्रोफेसर हैं।

 


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