
साधना गंगराडे।
कुछ आयोजन बस होते नहीं, वे सीधे दिल में उतर जाते हैं।
8 अगस्त का दिन मेरे लिए भी कुछ ऐसा ही रहा।
हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने के ऐतिहासिक अवसर पर हिंदी लेखिका संघ, मध्यप्रदेश, भोपाल द्वारा सप्रे संग्रहालय के ज्ञानतीर्थ सभागार में आयोजित विमर्श “दो सदियों की साक्षी : हिंदी पत्रकारिता–महिला पत्रकारों की महती भूमिका” मेरे लिए केवल एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि हिंदी पत्रकारिता की दो सौ वर्षों की यात्रा को श्रद्धा से नमन करने और उन अनगिनत स्त्रियों को याद करने का अवसर था, जिन्होंने अपनी कलम से समाज की आवाज बनने का साहस किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं सेवानिवृत्त विशेष पुलिस महानिदेशक एवं गांधीवादी सुश्री अनुराधा शंकर जी का एक वाक्य मन में गहरे उतर गया—“उठी हुई कलम से समाज के आखिरी व्यक्ति का लाभ होना चाहिए।”

कितनी बड़ी बात है एक कलम की जिम्मेदारी!
कलम सिर्फ शब्द नहीं रचती, वह विचारों को जन्म देती है, सवाल खड़े करती है, आवाज़ को पहचान देती है और कई बार पूरे समाज की दिशा ही बदल देती है।
अनुराधा जी ने प्रकृति से केवल लेने के बजाय समाज को लौटाने की बात कही। उन्होंने स्त्रियों की संवेदनशीलता और मार्मिकता को कमजोरी नहीं, बल्कि उनकी सबसे बड़ी ताकत बताया। उनके विचारों ने पूरे विमर्श को एक गहरी मानवीय दृष्टि से भर दिया।
मुख्य अतिथि विजयदत्त श्रीधर ने पत्रकार के लिए निरंतर पढ़ने और सीखते रहने की आवश्यकता पर बल दिया। सच ही है—जिसकी दृष्टि जितनी व्यापक होगी, उसकी लेखनी उतनी ही समृद्ध होगी।

वरिष्ठ पत्रकार सुश्री शिफाली पांडे स्टेट हेड ईटीवी ने आज की पत्रकारिता की चुनौतियों पर खुलकर बात की। उनका यह कथन विशेष रूप से मन में रह गया—
“पत्रकारिता में टिके रहना है तो मेकअप से पहले माइंड मेकअप जरूरी है।”कितनी सरल भाषा में कही गई, पर भीतर तक उतर जाने वाली बात!
डॉ. ऋतु मिश्र माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय ने साहसी पत्रकारिता के उदाहरणों के माध्यम से बताया कि जब कलम उन लोगों तक पहुँचती है जिनकी आवाज़ अक्सर दबा दी जाती है, तभी पत्रकारिता अपने असली अर्थ को पाती है।
डॉ. मंगला अनुजा सप्रे संग्रहालय ने हिंदी पत्रकारिता की समृद्ध परंपरा, सप्रे संग्रहालय की चार दशक लंबी यात्रा और महिला संपादकों व लेखिकाओं के योगदान पर प्रकाश डालते हुए हमें अपनी जड़ों से जोड़ा। महादेवी वर्मा जैसी विभूतियों के संपादकीय योगदान को याद करना अपने आप में प्रेरणा से भर देने वाला था।

श्रीमती अंजली राय नवदुनिया ने पत्रकारिता और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन के अपने अनुभव साझा करते हुए एक बहुत सच्ची बात कही—“पत्रकार कभी सेवानिवृत्त नहीं होता।”
इन सभी विचारों को सुनते हुए मन में बार-बार यही प्रश्न उठता रहा—
हमारी कलम आखिर किसके लिए है?
हम किसकी आवाज़ बन रहे हैं?
और हमारे शब्द समाज को क्या दे रहे हैं?
संस्था की अध्यक्ष के रूप में इस विमर्श का स्वागत करते हुए मेरे भीतर भी यही भाव था कि 200 वर्षों की पत्रकारिता यात्रा को केवल स्मरण करना पर्याप्त नहीं है; उससे सीख लेकर आने वाली पीढ़ी के लिए एक अधिक संवेदनशील, जिम्मेदार और नैतिक पत्रकारिता की नींव रखना भी हमारा दायित्व है।
महिला पत्रकारों की यात्रा संघर्षों से भरी रही है, पर उनकी संवेदना, साहस और जिजीविषा ने पत्रकारिता को एक नया मानवीय आयाम दिया है। आज आवश्यकता है कि इस विरासत को केवल इतिहास में न सहेजा जाए, बल्कि उसे जीवित अनुभव की तरह नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए।

कार्यक्रम को सफल बनाने में जुड़े सभी साथियों—सुश्री ममता यादव (मल्हार मीडिया )ने सहजता और आत्मीयता से पूरे कार्यक्रम का संचालन किया। सुषमा पटेल ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की, कमल चंद्रा ने आभार प्रदर्शन किया।
कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार सर्वश्री प्रकाश दुबे जी,प्रकाश हिंदुस्तानी जी, राजेश बादल जी,राजेश चतुर्वेदी जी उपस्थित थे। साहित्यकार बंधु श्री महेश सक्सेना जी,गोकुल सोनी जी ,डॉ संजय सक्सेना जी राजेंद्र गट्टानी जी,छायाकार जगदीश कौशल जी के साथ सभी का हृदय से आभार।
इनके अतिरिक्त सुश्री इंदु चौधरी, सुश्री ज्योति शर्मा, श्री नीरज चतुर्वेदी उपस्थित रहे।
हिंदी लेखिका संघ की कार्यकारिणी एवं साहित्यकार बहनों का भी धन्यवाद।
साथ ही भोपाल के मीडिया जगत के सभी मित्रों, समाचार पत्रों का हृदय से आभार जिन्होंने कार्यक्रम को प्रमुखता से प्रकाशित किया।
मेरी यही कामना है—
जब भी हमारी कलम उठे, उसमें संवेदना हो, सत्य हो, विवेक हो और समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचने की बेचैनी हो।
लेखिका मप्र महिला लेखिका संघ की अध्यक्ष हैं
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