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हां, आज़ादी चरखे से आई थी....और ऐसे आई थी !

खरी-खरी            Jan 30, 2026


डॉ.पकाश हिंदुस्तानी।

(धीरज से पढ़िएगा)

30 जनवरी।  आज़ादी के बाद 1948 में आज ही के दिन महात्मा गांधी को एक पागल ने गोलियां मारी थीं। उसने किसी अंग्रेज़ को गोली नहीं मारी, उन लोगों में से किसी को नहीं मारी जो  अंग्रेज़ों के जाने से खुश नहीं थे और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री को लिख रहे थे कि साहब बहादुर, आप भारत छोड़कर मत जइयो! 

उस पागल के साथी कहते  हैं कि आज़ादी कोई चरखे से आई थी? वह तो क्रांतिकारियों के बलिदान से आई थी। बिलकुल सही, आज़ादी क्रांतिकारियों के साहस, बलिदान और लड़ाई से मिली थी, लेकिन एक और क्रान्ति की गई थी - चरखे की क्रान्ति।

विचार राई के बराबर था, लेकिन गांधी जी ने उसे पहाड़ बना दिया।  अमल आसान नहीं था, इसीलिए गांधी जी महानतम थे।                                                                                     ***

अंग्रेज़ लोग  मुगलों की तरह भारत में बसने नहीं आये थे. उनका इरादा था, वहीं बैठे-बैठे  भारतीय अर्थव्यवस्था को चूस लेना। उन्होंने  भारतीय बाज़ारों पर कब्ज़ा कर लिया था।

कपास भारत का था, वे  कपास औने पौने दाम पर खरीदते, उसके  कपड़े  लैंकेस्टर  की मिलों  में बनाते और भारत भेज देते। यह जगह लंकाशायर काउंटी में है। ये ब्रिटेन का कपड़ा व्यवसाय अंग्रेज़ों की इकोनॉमी की रीढ़ था। उनके कपड़े की 60 प्रतिशत खपत भारत में हो रही थी।

इसके अलावा अंग्रेज़ों की  मुख्य कमाई नमक और शराब पर टैक्स से होती थी।

वे भारत से कुल जितनी कमाई कर रहे थे उसका 8 प्रतिशत केवल नमक से थी। अंदाज़ लगाइए कि नमक रोटी या नमक भात खाना कितना मुश्किल कर दिया था, उन्होंने। गांधीजी ने नमक सत्याग्रह किया और कहा कि इसमें कौन सा रॉकेट साइंस है विदेशी हुकूमत का।  घर घर नमक बनने लगा था।

फिर गांधीजी ने कहा कि विदेशी वस्त्र क्यों खरीदें? ब्रिटेन में बने कपड़े का कोट, शर्ट हम क्यों पहनें? विदेशी वस्त्रों की होली जलाओ। ये कपड़ा गुलामी का प्रतीक है और हमारी दासता का पोषक।  न तो विदेशी कपड़ा खरीदो, न ही बिकने दो। 

1917 में साबरमती आश्रम में गांधीजी ने चरखा चलाना सीखा। 1918 में  गंगाबेन मजमुदार के माध्यम से पुराना खड़ा चरखा मिला और गांधीजी ने इसे अपनाया। इसी से खादी आंदोलन की व्यावहारिक शुरुआत मानी जाती है। गांधीजी ने इसे गरीबों के लिए राहत कार्यक्रम के रूप में शुरू किया।

असहयोग आंदोलन (1920-1922) के साथ चरखा और खादी को बड़े पैमाने पर प्रचारित किया गया।1921 में कांग्रेस ने चरखे को अपना प्रतीक बनाया और कांग्रेस के  झंडे में चरखा शामिल हुआ। फिर 1925 में अखिल भारतीय चरखा संघ  की स्थापना हुई, जिसने इसे संगठित रूप दिया।

गांधीजी ने चरखे को ऐसा स्थापित किया कि हर जगह चरखा चलता।  विदेशी कपड़ों की होली जलती।

ब्रिटेन से हर साल तीन अरब यार्ड इम्पोर्ट होनेवाला कपड़ा घटकर 16 करोड़ यार्ड से भी कम रह गया। बहिष्कार और तेज हुआ तो इंपोर्ट घट घट कर चार करोड़ यार्ड भी नहीं बचा। कहाँ तो तीन अरब यार्ड का इम्पोर्ट था, पर चरखे के बदौलत घटकर चार करोड़ यार्ड रह गया।

ब्रिटेन में मिलें बंद होने लगीं।  बेरोजगारी फ़ैल गई। ब्रिटिश मीडिया गांधीजी को खलनायक और राक्षस बताने लगा।  गांधी जी के कार्टून बनने लगे और उन्हें रक्तपिपासु बताया जाता। ब्रिटिश अखबारों के सम्पादकीय में  ब्रिटिश वस्त्रों के बहिष्कार पर तीखे सम्पादकीय छप रहे थे। गांधी को ब्रिटिश मजदूरों का दुश्मन बताया जा रहा था। भारत के लोग चरखे से बने ताने से बने कपड़े पहन रहे थे और उन्होंने  अंग्रेज़ों की पूरी इकोनॉमी की वाट लगा दी थी।

गांधीजी को ब्रिटिश अखबारों ने ब्रिटेन का नेशनल विलेन  बना दिया था? 1930-1931 के आसपास, खासकर दूसरे राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस के समय, कई ब्रिटिश अखबारों और  विंस्टन चर्चिल ने महात्मा गांधी को राष्ट्रीय खतरा, कुटिल धोखेबाज,  अधनंगा फकीर और साम्राज्य का दुश्मन निरूपित कर दिया था।                                                                                       ***

गांधीजी दूसरी राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में सितंबर 1931 में लंदन गए थे, और इसी दौरान उन्होंने डार्वेन , बर्नले, एजवर्थ में  मिल मजदूरों, ट्रेड यूनियनिस्टों और मिल मालिकों से मुलाकात की। वहां के मज़दूर उनके खून के  प्यासे थे।   गांधी जी का साहस देखिए कि वे बंद  मिलों के मज़दूरों से भी मिलने गए।

गांधीजी ने बहुत स्पष्ट और विनम्रता से समझाया कि भारत में गरीबी और भुखमरी इतनी गहरी है कि भारतीयों को अपनी खादी और देसी कपड़ा इस्तेमाल करना ही पड़ता है। आपको गरीबी का अंदाजा ही नहीं है।  गांधीजी ने कहा कि बहिष्कार तब तक चलेगा, जब तक भारत को पूर्ण स्वतंत्रता  की दिशा में ठोस प्रगति नहीं होती।

कोई तत्काल समझौता नहीं हुआ। मजदूर और मिल मालिक उम्मीद कर रहे थे कि गांधीजी बहिष्कार खत्म करने या कोई राहत देने का वादा करेंगे, लेकिन

गांधीजी ने लंकाशायर छोड़ा बिना कोई  आर्थिक रियायत दिए। मुलाकात से दोनों पक्षों में दुश्मनी या कड़वाहट कम हुई। मजदूरों ने गांधीजी को बहुत सम्मान दिया। 

भारत को आजादी 1947 में मिली, तब तक लंकाशायर की मिलें पहले ही बहुत कमजोर हो चुकी थीं।

अब अगर कोई कहे कि आज़ादी कोई चरखे से नहीं आई थी तब उसे समझा देना कि आज़ादी आने का एक प्रमुख कारण चरखा था, जिसे गांधीजी ने आज़ादी का  एक मन्त्र बना दिया था।

जैसे हम शहीदों को नहीं भूल  सकते, वैसे ही चरखे और गांधीजी को भी नहीं भूल सकते।

जय हिंद।

~डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी

30 जनवरी 2026.

 



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