मल्हार मीडिया भोपाल।
एक जिले को मांग से ज्यादा बजट एक जिले के कलेक्टर की चीट्ठियां बेअसर
मध्यप्रदेश के अनुसूचित जाति कल्याण संचालनालय में बजट आवंटन की प्रक्रिया सवालों के घेरे में आ गई है।
मामला कहीं माल-ए-मुफ्त-दिल-ए-बेरहम है तो कहीं अंधा बांटे रेवड़ी चीन्ह-चीन्ह कर की तर्ज पर चल रहा है।
एक तरफ लंबे समय तक आवंटन रोककर रखा जाता है तो वहीं दूसरी ओर जितनी डिमांड नहीं होती उससे ज्यादा का आवंटन जारी कर दिया जाता है।
मामला दरअसल अनुसूचित जाति के छात्रावासों में सामग्री सप्लाई की प्रक्रिया का है।
सूत्रों की मानें तो सागर जिले में छात्रावासों के लिए 1 करोड़ 99 लाख 50 हजार रुपये की मांग भेजी गई, लेकिन दस्तावेजों के अनुसार करीब दो महीने बाद 2 करोड़ 4 लाख 50 हजार रुपये से अधिक का बजट मंजूर कर लिया गया।
वहीं, धार जिले के कलेक्टर द्वारा छात्रावासों के लिए राशि आवंटन की मांग को लेकर कई बार पत्र भेजे जाने के बावजूद सुनवाई नहीं होने का आरोप है।
उधर झाबुआ के सहायक आयुक्त का पत्र मिलने के बाद राशि आवंटित किए जाने की बात सामने आई है। सूत्रों के अनुसार आवंटन प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और लेनदेन को लेकर भी विभाग में चर्चा होने का दावा किया जा रहा है। इन मामलों ने आयुक्त की कार्यशैली और बजट आवंटन के नियमों के पालन पर सवाल खड़े किए हैं।
यह दिलचस्प बजट आवंटन का खेल अजब गजब मध्यप्रदेश के अनुसूचित जाति कल्याण संचालनालय के मुख्य पद पर बैठे एक अफसर की कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है।

सूत्रों से प्राप्त जानकारी और दस्तावेजों के अनुसार एक मामला है, सागर के जनजातीय कार्य विभाग का पत्र क्रमांक/ आदि/स्टोर/ 2026-27/ 813 दिनांक 29-07-2026 को छात्रावासों में लगने वाली सामग्री पलंग, सीलिंग फैन, थाली, ग्लास, सीसी टीवी कैमरा, ट्यूबलाइट, आर ओ, अलमीरा, study table, कुर्सी इत्यादि, क्रय करने के लिए 199.50 लाख ( 1 करोड़ 99 लाख) की डिमांड पत्र मुख्यालय को भेजता है।
दो महीने गुजरने के बाद जब शैक्षणिक सत्र एक चौथाई गुजर जाता है तो अनुसूचित जाति विकास की तरफ से माँग से 5 लाख रुपए से ज्यादा यानि 2,04,50000 दो करोड़ चार लाख पचास हजार रुपए से ज्यादा स्वीकृत कर भेज दिए जाते हैं
वित्त विभाग के नियमों के अनुसार विना डिमांड के अधिक राशि का आवंटन अफसरी लापरवाही मानी जाएगी। ऐसा ही एक मामला धार जिले का हैं।


धार कलेक्टर ने कम से कम तीन बार जनजातीय विभाग के छात्रावासों के लिए राशि आवंटन कों लेकर मांग पत्र भेजे। कलेक्टर साहब की सुनवाई नहीं हुई।
एक दिन सहायक आयुक्त अनुसूचित जाति कल्याण विभाग झाबुआ का पत्र पाते ही राशि आवंटित कर दी गई।
यह किसी एक जिले की कहानी नहीं है बल्कि प्रदेश के अधिकांश जिलों में मांग आवंटन की यही प्रक्रिया निर्बाध रूप से जारी है।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर अलग-अलग जिलों की मांगों पर कार्रवाई में अंतर क्यों? वित्त विभाग के नियमों के अनुसार विना डिमांड के अधिक राशि का आवंटन वरिष्ठ अधिकारी की लापरवाही मानी जाएगी।
ऐसा ही एक मामला धार जिले का हैं। धार कलेक्टर ने कम से कम तीन बार जनजातिय विभाग के छात्रावासों के लिए राशि आवंटन कों लेकर मांग पत्र भेजे। कलेक्टर साहब की सुनवाई नहीं हुई।


एक दिन सहायक आयुक्त अनुसूचित जाति कल्याण विभाग झाबुआ का पत्र पाते ही राशि आवंटित कर दी गई।
सूत्रों की जानकारी पर विश्वास करें तो कथित तौर पर विभाग में चर्चा है कि आवंटन को लेकर मोटा लेनदेन होता है। लेनदेन की जानकारी ऊपर बैठे अधिकारियों को भी है लेकिन कार्यशैली में कोई बदलाव न होना कई सवाल
सूत्रों के अनुसार पूर्व वित्तीय वर्ष में स्वीकृत अथवा आवंटित राशि के सरेंडर हो जाने के कारण कुछ जिलों में सामग्री की आपूर्ति किए जाने के बावजूद आपूर्तिकर्ताओं के भुगतान लंबित रहने की शिकायत है।
Comments