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गूगल का Dive Deeper फीचर: क्या पब्लिशर्स का डिस्कवर ट्रैफिक और नीचे जाएगा?

मीडिया            Oct 10, 2026


मनोज खांडेकर।

पिछले एक से डेढ़ साल में डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स के लिए ट्रैफिक का ग्राफ शायद ही कभी लंबे समय तक सीधा रहा हो. कभी कोर अपडेट. कभी स्पैम अपडेट. कभी डिस्कवर में अचानक उछाल और फिर उतनी ही तेजी से गिरावट. 2026 में ही गूगल चार स्पैम अपडेट जारी कर चुका है. मार्च, जून, अगस्त और अब सितंबर. सितंबर का स्पैम अपडेट अभी भी रोलआउट में है.

हर अपडेट के आसपास तस्वीर लगभग एक जैसी दिखती है. ट्रैफिक में तेज उतार-चढ़ाव आता है. फिर कुछ दिन या हफ्तों बाद थोड़ा ट्रैफिक लौटता है और न्यूजरूम में लगता है कि रिकवरी शुरू हो गई.

लेकिन पांच या दस प्रतिशत की यह रिकवरी अक्सर पिछले महीने के मुकाबले होती है. क्योंकि पिछले डेढ़ साल में ट्रैफिक ऑलरेडी 30 से 40 फीसदी नीचे गिर चुका है. ऐसे में फिर गिरावट और उसके बाद थोड़ी सी रिकवरी 'बस दिल बहलाने के लिए गालिब ख्याल अच्छा है' बनकर रह जाती है.

अब जरा रॉयटर्स इंस्टिट्यूट की 2026 रिपोर्ट में चार्टबीट के 2,500 से ज्यादा न्यूज साइट्स के डेटा पर नजर डालेंगे तो सही तस्वीर, जो कि डरावनी भी है सामने आ जाएगी. इस रिपोर्ट में बताया गया कि नवंबर 2024 से नवंबर 2025 के बीच गूगल ऑर्गेनिक सर्च से आने वाला ट्रैफिक 33 प्रतिशत गिरा. इसी अवधि में गूगल डिस्कवर रेफरल्स में भी 21 प्रतिशत की गिरावट आई.

ऐसे में, जब पब्लिशर्स पुरानी रिकवरी और गिरती बेसलाइन को संभालने की कोशिश कर रहे हैं. छोटी-छोटी रिकवरी के बीच रास्ता तलाश रहे हैं, एक और नया संकट सामने आकर खड़ा है. गूगल ने डिस्कवर में 'डाइव डीपर' (Dive Deeper) नाम का नया प्रयोग शुरू कर दिया है. अब असली सवाल यह नहीं है कि ट्रैफिक कब वापस आएगा, बल्कि यह है कि क्या 'डाइव डीपर' जैसे फीचर्स के आने के बाद पब्लिशर्स का डिस्कवर ट्रैफिक और नीचे गिरेगा.

क्या है गूगल का नया 'डाइव डीपर' (Dive Deeper) फीचर?

18 सितंबर को गूगल सर्च के वाइस प्रेसिडेंट ऑफ प्रोडक्ट रॉबी स्टीन ने घोषणा की कि कंपनी डिस्कवर में 'डाइव डीपर' नाम का एक नया फीचर टेस्ट कर रही है, जिसकी शुरुआत वीडियो से की गई है.

जब कोई यूजर डिस्कवर में वीडियो के साथ दिए गए 'डाइव डीपर' विकल्प पर टैप करता है, तो वह सीधे किसी पब्लिशर या क्रिएटर के पेज पर नहीं पहुंचता. इसके बजाय, उसे गूगल के इंटरफेस के भीतर ही उसी आर्टिकल से जुड़ा एक छोटा 'टॉपिक ओवरव्यू' दिखाया जाता है.

 

डिस्कवर में किसी वीडियो के साथ यूजर को डाइव डीपर का विकल्प दिखाई दे सकता है. उस पर टैप करने के बाद उसे उसी वीडियो से जुड़े टॉपिक का एक एआई आधारित छोटा ओवरव्यू मिलता है. उसके साथ रिलेटेड स्टोरीज, कम्युनिटी रिएक्शन्स और ओरिजिनल रिपोर्टिंग के लिंक भी दिए जाते हैं. गूगल का कहना है कि वह आने वाले हफ्तों में इसके अलग-अलग डिजाइन भी टेस्ट करेगा.

यहीं बदलाव शुरू होता है.

पिछले एक साल में गूगल वेबसाइट्स और यूजर्स के बीच की सीधी लिंक में कई नए पड़ाव जोड़ चुका है.

अक्टूबर 2025 में गूगल ने डिस्कवर में एआई-पावर्ड प्रीव्यू शुरू किए थे. इसमें किसी ट्रेंडिंग टॉपिक का छोटा सार पहले ही दिखाया जाता है और उसके बाद यूजर आगे वेब कंटेंट देख सकता है. भारत भी उन बाजारों में शामिल था जहां यह फीचर उपलब्ध हुआ.

मान लीजिए आपने लिखा कि विराट कोहली ने सचिन तेंदुलकर का एक रिकॉर्ड तोड़ दिया. हेडलाइन में आपने रिकॉर्ड नहीं बताया, क्योंकि वही यूजर की क्यूरोसिटी है.

पहले वह जवाब जानने के लिए आपकी स्टोरी खोलता. लेकिन अगर गूगल उसी टॉपिक का सार पहले ही दिखा दे और तीन-चार लाइनों में बता दे कि रिकॉर्ड कौन-सा था, तो क्लिक की जरूरत वहीं कम हो सकती है.

इसके बाद डिस्कवर में सोशल और वीडियो कंटेंट का हिस्सा भी बढ़ाया गया. गूगल ने एक्स, इंस्टाग्राम और यूट्यूब शॉर्ट्स जैसे फॉर्मेट्स को डिस्कवर में ज्यादा जगह देने की घोषणा की थी. अब उसके भी बड़ा चैलेंज है डाइव डीपर.

अगर कार्ड दिखा, हेडलाइन या तस्वीर ने ध्यान खींचा और यूजर की दिलचस्पी बनी, तो उसके पब्लिशर तक पहुंचने की संभावना थी.

डाइव डीपर इस यात्रा में एक और लेयर जोड़ देता है.

अब तक पब्लिशर की सबसे बड़ी चिंता थी कि उसका कंटेंट डिस्कवर में दिखाई देगा या नहीं.

अगर कार्ड दिखा, हेडलाइन या तस्वीर ने ध्यान खींचा और यूजर की दिलचस्पी बनी, तो उसके पब्लिशर तक पहुंचने की संभावना थी. डाइव डीपर इस यात्रा में एक और लेयर जोड़ देता है.

मान लीजिए डिस्कवर में भारत और वेस्टइंडीज के मैच का वीडियो दिखाया गया. यूजर जानना चाहता है कि रोहित शर्मा कैसे आउट हुए.

पहले उसके पास आसान रास्ता था. वीडियो खोले या उससे जुड़ी स्टोरी पर जाए.

अब वह डाइव डीपर पर टैप कर सकता है.

वहां उसे मैच का छोटा संदर्भ मिल सकता है. रिलेटेड कवरेज मिल सकती है. दूसरे पब्लिशर्स की स्टोरीज दिखाई दे सकती हैं. कम्युनिटी रिएक्शन्स भी मिल सकते हैं.

अब पहला सवाल बदल जाता है.

पहले सवाल था, "कौन-सी स्टोरी खोलूं?"

अब सवाल हो सकता है, "क्या मुझे किसी स्टोरी को खोलने की जरूरत भी है?" यहीं पब्लिशर्स के लिए असली फर्क है.

डाइव डीपर किसी पब्लिशर लिंक को खत्म नहीं कर रहा. बल्कि गूगल खुद कह रहा है कि ओवरव्यू के अंदर रिलेटेड स्टोरीज और ओरिजिनल रिपोर्टिंग के लिंक मौजूद होंगे. लेकिन क्लिक तक पहुंचने का रास्ता बदल सकता है.

और इसमें तीन अलग आंसर संभव हैं.

पहला, यूजर को ओवरव्यू से ही जरूरी जानकारी मिल गई तो वह आगे नहीं जाएगा.

दूसरा, जिस पब्लिशर के कंटेंट ने शुरुआत में उसकी क्यूरोसिटी पैदा की थी, जरूरी नहीं कि अंतिम क्लिक भी उसी पब्लिशर को मिले. ओवरव्यू के अंदर उसे कई दूसरे सोर्स दिखाई दे सकते हैं.

तीसरा, डिस्कवर में इम्प्रेशन मिलना और फिर उसका क्लिक में कन्वर्ट होना दो अलग-अलग मुकाबले बन सकते हैं.

दिखने में यह बहुत छोटी बात है, लेकिन फर्क छोटा नहीं है.

अब तक अगर आपकी स्टोरी डिस्कवर में दिखाई दी तो आपने कम से कम यूजर का ध्यान जीत लिया था.

डाइव डीपर वाले मॉडल में ध्यान जीतने के बाद भी अंतिम ट्रैफिक के लिए आपको दूसरी बार मुकाबला करना पड़ सकता है.

एक बार डिस्कवर कार्ड पर. और दूसरी बार उस ओवरव्यू के अंदर जहां गूगल कई सोर्स एक साथ रख सकता है.

यही वह जगह है जहां डाइव डीपर सिर्फ नया फीचर नहीं रहता. यह ट्रैफिक के मौजूदा दबाव से जुड़ जाता है.

क्योंकि पब्लिशर्स पहले से उस दौर में हैं जहां सर्च से आने वाला ट्रैफिक कमजोर हुआ है, डिस्कवर में वोलैटिलिटी बढ़ी है और एआई ओवरव्यू के बाद जीरो-क्लिक सर्च को लेकर चिंता बढ़ी है. अब वही सवाल डिस्कवर के सामने भी खड़ा हो सकता है.

हालांकि सर्च और डिस्कवर में एक अहम फर्क है. सर्च में यूजर खुद सवाल लेकर आता है.

 वह पूछता है कि किसी शेयर का भाव क्यों गिरा, मौसम कैसा रहेगा या किसी घटना में क्या हुआ. एआई ओवरव्यू जवाब दे देता है और हो सकता है कि यूज़र वेबसाइट पर जाने की जरूरत महसूस न करे.

डिस्कवर में यूजर ने सवाल पूछा ही नहीं था. गूगल ने पहले उसके सामने कोई टॉपिक रखा.

उस टॉपिक ने उसकी क्यूरोसिटी पैदा की. और अब गूगल उसी क्यूरोसिटी को अपने इंटरफेस के भीतर समझाने का विकल्प भी दे रहा है.

यानी गूगल पहले यह तय करता है कि आपको किस टॉपिक में दिलचस्पी हो सकती है. फिर उसी टॉपिक को समझने का अगला पड़ाव भी अपने पास रखने का प्रयोग कर रहा है.

लेकिन यहां सिर्फ खतरा ही नहीं है.

अगर गूगल वास्तव में ओरिजिनल रिपोर्टिंग को प्रमुख जगह देता है तो किसी ऐसी रिपोर्ट को नया ट्रैफिक भी मिल सकता है जो सामान्य डिस्कवर फीड में यूजर के सामने नहीं आई होती.

इसलिए अभी यह कहना गलत होगा कि डाइव डीपर पब्लिशर्स का ट्रैफिक निश्चित रूप से कम करेगा.

लेकिन इस प्रयोग को नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है. क्योंकि अब तक पब्लिशर्स हर गूगल अपडेट के बाद लगभग एक ही सवाल पूछते रहे हैं.

ट्रैफिक कितना गिरा और कितना वापस आया? डाइव डीपर के बाद शायद उससे पहले एक और सवाल पूछना पड़े.

गूगल से ट्रैफिक कितना वापस आ रहा है, यह देखने से पहले यह देखना होगा कि गूगल यूजर को पब्लिशर तक आने की जरूरत कितनी छोड़ रहा है.

लेखक News 18 Languages के लिए ओरिजिनल वीडियो के एडिटर हैं यह आलेख उनके लिंकडन वॉल से लिया गया है

 



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