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यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, एनटीए को भंग करने याचिका दायर

राष्ट्रीय            May 16, 2026


 मल्हार मीडिया ब्यूरो।

यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट (UDF) ने NEET-UG 2026 परीक्षा में कथित 'सिस्टमिक फेल्योर' को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) को भंग करने की मांग की है।

अधिवक्ता ऋतु रेनीवाल के माध्यम से दाखिल इस याचिका में संसद के कानून के जरिए एक नई वैधानिक राष्ट्रीय परीक्षा संस्था गठित करने की मांग की गई है, जिसे स्पष्ट कानूनी शक्तियां, पारदर्शिता मानक और संसद के प्रति प्रत्यक्ष जवाबदेही दी जाए।

याचिका में कहा गया है कि NTA का मौजूदा ढांचा, जो सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के तहत एक स्वायत्त सोसाइटी के रूप में काम करता है, “जवाबदेही का शून्य” पैदा करता है।

 UDF का कहना है कि UPSC और SSC जैसी संस्थाओं के विपरीत NTA सीधे संसद के प्रति जवाबदेह नहीं है। साथ ही यह शिक्षा मंत्रालय के अधीन काम करती है, जिससे यह प्रत्यक्ष CAG ऑडिट और अनिवार्य संसदीय समिति जांच से बाहर रहती है।

22 लाख छात्रों के भविष्य पर संकट

यह याचिका 3 मई 2026 को आयोजित NEET-UG 2026 परीक्षा रद्द किए जाने के बाद दाखिल की गई है। परीक्षा पेपर लीक के आरोपों के बाद NTA ने परीक्षा रद्द कर दी थी और मामले की जांच CBI को सौंप दी गई थी।

याचिका में कहा गया है कि NEET-UG देश में मेडिकल स्नातक प्रवेश का एकमात्र माध्यम है और इससे 22.7 लाख से अधिक छात्रों का भविष्य जुड़ा है। ऐसे में बार-बार परीक्षा में गड़बड़ी होना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत समानता और जीवन/रोजगार के अधिकार का उल्लंघन है।

हाईटेक सुरक्षा उपायों के दावों की खुली पोल

याचिका में आरोप लगाया गया है कि NTA द्वारा GPS ट्रैकिंग, AI आधारित CCTV और बायोमेट्रिक सत्यापन जैसे हाईटेक सुरक्षा उपायों के दावों के बावजूद परीक्षा 'गेस पेपर' रैकेट के कारण प्रभावित हुई। राजस्थान SOG और बाद में CBI की FIR में यह सामने आया कि परीक्षा सामग्री टेस्ट से पहले डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर प्रसारित की गई थी।

‘जीरो-लीक’ सिस्टम की उठी मांग

UDF ने सुप्रीम कोर्ट से NTA को मौजूदा स्वरूप में भंग करने, संसद से नई वैधानिक परीक्षा प्राधिकरण बनाने का निर्देश देने और आगामी राष्ट्रीय परीक्षाओं की 'जीरो-लीक' निगरानी के लिए कोर्ट मॉनिटरिंग कमेटी गठित करने की मांग की है। याचिका में यह भी कहा गया है कि बार-बार पेपर लीक से छात्रों और परिवारों को मानसिक, आर्थिक और सामाजिक संकट का सामना करना पड़ रहा है।

 



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