
डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी।
अक्षय कुमार 'हैवान' में सायको किलर बने हैं, पर लगते नहीं। सैफ अली खान काबिल के ऋतिक जैसे दृष्टिहीन बने हैं, पर लगते करीना के पति ही हैं। यह पिच्चर दर्शकों के धैर्य की असली परीक्षा है। प्रियदर्शन की दस साल पुरानी मलयालम फिल्म ओप्पम की रीमेक है। दही की गाढ़ी लस्सी बोल के छाछ टिकाने जैसा !
फिल्म की दर्शक की आँखें कब बंद होने लगती हैं, पता ही नहीं चलता। कभी लगता है कि यह क्राइम थ्रिलर है, कभी एक्शन है, कभी कॉमेडी ! दे खींच, दे खींच करके पौने तीन घंटे से ज्यादा लम्बी। इसमें न 'काबिल' जैसे कसावट है , न 'अंधाधुन' जैसा रहस्य। हैवान है, कोई देवता थोड़े ही है!
क्या मुंबई की टॉप क्लास हाउसिंग सोसयटी में दृष्टिहीनों को मैंटेनेंस मैनेजर बनाया जा सकता है? (अगर हां, तो अच्छा है !) क्या कोई दृष्टिहीन चार-चार हट्ठे कट्ठे पुलिसवालों को उन्हीं के ठिकाने पर 'दे दनादन, दे दनादन' धो सकता है? क्या रिटायर्ड सीजेआई के घर सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं होता?
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी अभिनय नहीं, स्क्रीनप्ले है। कहानी में तो कई दिलचस्प तत्व हैं जैसे दृष्टिहीन गवाह, हत्या, अपराधी, पुलिस, बच्ची, न्यायाधीश, रहस्य, पीछा, बदला और दो बड़े सितारे। इतना मसाला हो तो खाना स्वादिष्ट होना चाहिए। लेकिन यहाँ कई बार लगता है कि रसोई में हर मसाला एक साथ डाल दिया गया है।
पुलिस की क्रूरता चरम पर दिखाई गई है। बोमन ईरानी का किरदार कहानी को गंभीरता देता है। वे एक विवेकशील रिटायर्ड न्यायाधीश की भूमिका में हैं और उनका अभिनय फिल्म के मजबूत हिस्सों में आता है लेकिन असरानी हंसाने वाली बातें करते हैं और राजपाल यादव गंभीर रोल ! श्रिय़ा पिलगांवकर का ट्रैक भी है, जिसमें घरेलू हिंसा और पारिवारिक समस्याएँ हैं। सैयामी खेर पुलिस अधिकारी हैं।राजेश शर्मा और मनोज जोशी भी दिखाई देते हैं। समस्या यह है कि इतने सारे पात्र और उपकथाएँ मुख्य कथा को कभी-कभी धक्का देने लगती हैं। कहानी ट्रेन है और उपकथाएँ उसके डिब्बे। दिक्कत यह है कि कुछ डिब्बे इतने भारी हैं कि ट्रेन की रफ्तार ही कम हो जाती है।
सैफ अली खान फिल्म की मजबूत कड़ी हैं। दृष्टिहीन किरदार को उन्होंने दया का पात्र नहीं बनने दिया। उनका चलना-फिरना, सुनना, महसूस करना ये सब संयमित है लेकिन एक्शन अविष्वसनीय ! अक्षय कुमार नेगेटिव रोल में आए हैं। पुराने हीरोइक अंदाज से अलग दिखने की कोशिश है, 'हैवान' जितना खतरनाक होना चाहिए था, उतना नहीं हुआ।
सबसे बड़ी समस्या लंबाई है। फिल्म पौने तीन घंटे से ज्यादा की है की है जो 2 घंटे में निपट सकती थी। एक्शन और थ्रिलर के बीच में शादी बियाव के लम्बे-लम्बे सीन और गाने झेलने पड़ते हैं। पहला हाफ धीमा है, सस्पेंस देर से पकड़ता है। मूल 'ओप्पम' ज्यादा कसी हुई मानी जाती है। हिन्दी वर्जन में गाने, कुछ लॉजिक के छेद और फैला हुआ मिडिल हिस्सा थ्रिल को कमजोर करते हैं। महिला पात्र फिलर की तरह भरे गए हैं। प्रियदर्शन ने हिन्दी में उसे किसी कामचोर कर्मचारी की तरह बनाया है।
नितांत अझेलनीय ! चले मत जाना !
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