
डॉ. अमिताभ दुबे।
सागर की ताज़ा रात का एक कड़वा साहित्यिक टोस्ट
आइए हुज़ूर, उस काल्पनिक बार में ज़रा इधर तशरीफ़ लाएँ—कानूनी वाला हो तो और भी अच्छा। एकदम ठंडा गिलास उठाइए और मध्य प्रदेश के उस नवीनतम ‘निर्यात’ के नाम एक शानदार, व्यंग्यपूर्ण जाम हो जाए—त्रासदी, सीधे गले से नीचे उतरती हुई, और साथ में थोड़ा-सा मिथाइल अल्कोहल।
5–6 सितंबर 2026 की रात, जब देश का बाकी हिस्सा सप्ताहांत की योजनाओं पर गंभीर राष्ट्रीय विमर्श में व्यस्त था, सागर जिले की बंडा तहसील के बराज, नौरोजा, घुघरा और आसपास के कुछ गाँवों में कुछ लोगों ने स्थानीय ‘स्पेशल’ का स्वाद चखने का फैसला किया। बोतल पर दावा था—बॉम्बे व्हिस्की; क्यूआर कोड भी इतने आत्मविश्वास से चमक रहे थे, मानो सत्यापन के साथ-साथ मोक्ष की भी गारंटी दे रहे हों।
लेकिन अंदर निकला कुछ और ही।
व्हिस्की के नाम पर औद्योगिक रसायन और मानवीय लापरवाही का ऐसा कॉकटेल तैयार था, जिसने सुबह होते-होते कम-से-कम ग्यारह जिंदगियों का हिसाब बंद कर दिया। दर्जनों लोग गंभीर रूप से बीमार पड़े और जिला अस्पताल अचानक बुंदेलखंड का सबसे व्यस्त ‘नाइट क्लब’ बन गया—फर्क सिर्फ इतना था कि यहाँ प्रवेश टिकट नहीं, एंबुलेंस चाहिए थी।
प्रशासन भी आखिर प्रशासन है। कार्रवाई ऐसी हुई जैसे व्यवस्था ने अपराध को रंगे हाथों नहीं, बल्कि रंगमंच पर पकड़ा हो। तीन आबकारी अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया, चौथे को कहीं और ‘अटैच’ कर दिया गया। शराब की दुकानें सील कर दी गईं—मानो बोतलों को भी अब अपनी करतूत पर शर्म आ रही हो। मुख्यमंत्री ने ‘सबसे कड़ी कार्रवाई’ का भरोसा दिलाया—उस परिचित सरकारी लहजे में, जिसमें कल पौधों में पानी देने का वादा भी लगभग संवैधानिक घोषणा जैसा सुनाई देता है।
प्रारंभिक संकेतों की उंगली उत्तर प्रदेश के ललितपुर की ओर उठी—सीमा पार से आने वाली वही पुरानी आपूर्ति-श्रृंखला, जहाँ सस्ते मिथाइल अल्कोहल को महँगी मौत में बदलने वाले ‘उद्यमियों’ की प्रतिभा समय-समय पर सामने आती रहती है।
हूच त्रासदी : भारत का सबसे नियमित ‘मौसमी कार्यक्रम’
इस निरंतरता की भी दाद देनी पड़ेगी।
भारत में जहरीली शराब की त्रासदी कोई अचानक घट जाने वाली दुर्घटना भर नहीं रह गई है। वह अब लगभग एक मौसमी आयोजन बन चुकी है—मानो मानसून की तरह हर कुछ महीनों में किसी नए जिले पर उतरना हो।
एक नया जिला सुर्खियों में आता है।
लोग बीमार पड़ते हैं।
कुछ मर जाते हैं।
अधिकारी गंभीर चेहरे बनाते हैं।
नमूने प्रयोगशाला भेजे जाते हैं।
जाँच बैठती है।
कुछ निलंबन होते हैं।
‘कड़ी कार्रवाई’ की घोषणा होती है।
और फिर राष्ट्र अगले एपिसोड की प्रतीक्षा करने लगता है।
कभी-कभी तो लगता है कि मिथाइल अल्कोहल की सप्लाई-चेन से ज्यादा मजबूत हमारे सरकारी प्रेस-कॉन्फ्रेंस हैं।
अगली बोतल शायद कहीं और भर रही होती है और इधर अगली प्रेस विज्ञप्ति का मसौदा तैयार हो रहा होता है।
जय हो, आबकारी महाराज!
सरकार बड़े प्रेम से समझाती है—शराब स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है।
खजाना मुस्कराकर पूछता है—
“लेकिन राजस्व के लिए?”
वहाँ कहानी कुछ और ही मधुर हो जाती है।
भारत और शराब का रिश्ता सचमुच सरकारी दोहरेपन की एक अद्भुत पाठशाला है। एक विभाग कहता है—शराब बुरी है। दूसरा हिसाब लगाता है—शराब से इस साल कितना आया?
बोतल पर स्वास्थ्य चेतावनी छपी रहती है, और उसके नीचे सरकारी राजस्व का भविष्य मुस्कराता रहता है।
आम आदमी समझता है कि वह शराब खरीद रहा है। असल में वह एक पूरा आर्थिक पैकेज खरीदता है—आबकारी शुल्क, लाइसेंस शुल्क, व्यापारिक मार्जिन और न जाने कितनी परतों से गुजरता हुआ सरकारी राजस्व।
बोतल में शराब जितनी है, उससे कहीं ज्यादा उसमें सार्वजनिक वित्त छिपा हुआ है।
ठेकेदारी का अद्भुत रंगमंच
फिर आता है ठेकेदारी का शानदार नाटक।
लाइसेंस जारी होते हैं।
नियम बनाए जाते हैं।
निरीक्षण होते हैं।
फाइलें चलती हैं।
अधिकारी आते-जाते हैं।
पूरा तंत्र इतनी गंभीरता से काम करता है कि कभी-कभी लगता है सरकार शराब की दुकान नहीं, कोई छोटा-सा परमाणु संयंत्र चला रही है।
यह कहना भी उचित नहीं होगा कि हर ठेकेदार स्थानीय दबंग ही होता है। मगर जहाँ लाइसेंस सीमित हों, दाँव बड़ा हो, स्थानीय प्रभाव महत्वपूर्ण हो और निगरानी कुछ दूर बैठी हो, वहाँ स्वस्थ प्रतिस्पर्धा अक्सर बड़ी शालीनता से गायब हो जाती है।
उसे ढूँढने के लिए शायद किसी विशेष जाँच दल की आवश्यकता पड़े।
जब दुकान दूर हो और प्यास पास
कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा यहीं से शुरू होता है।
सरकारी शराब की दुकान इतनी दूर हो सकती है कि वहाँ तक पहुँचते-पहुँचते आदमी का आधा संकल्प रास्ते में ही दम तोड़ दे।
सरकार बड़े सरल समाधान के साथ कह सकती है—
“दुकान दूर है तो मत खरीदिए।”
ग्राहक उतनी ही सरलता से जवाब देता है—
“हुजूर, प्यास ने भी तो अपना पता नहीं बदला है!”
और बस, यहीं से अवैध बाजार की दुकान खुल जाती है।
जब गरीब आदमी महँगी कानूनी शराब के बजाय सस्ती अवैध शराब की ओर जाता है, तो केवल उसे डाँट देने से समस्या हल नहीं होती।
असल सवाल यह है कि क्या सरकार ने सुरक्षित, नियंत्रित और कानूनी विकल्प को इतना सुलभ और वहनीय बनाया है कि अवैध बाजार के लिए जगह ही न बचे?
क्योंकि जब कानून की दुकान बहुत दूर हो और गैरकानूनी दुकान घर के पास, तो अर्थशास्त्र कभी-कभी नैतिकता को पछाड़ देता है।
निषेध का गणित और खजाने की खामोशी
शराबबंदी वाले राज्यों के अनुभव भी अपने ढंग की कहानी सुनाते हैं।
बिहार में शराबबंदी के बाद आबकारी राजस्व में भारी गिरावट का उदाहरण अक्सर दिया जाता है—कभी हजारों करोड़ का राजस्व और फिर कुछ दर्जन करोड़ तक सिमटता हुआ सरकारी हिसाब।
सरकार ने बोतल से कहा—
“तुम बंद हो।”
खजाने ने पूछा—
“और मेरा क्या होगा?”
सरकार ने कहा—
“तुम भी थोड़ी देर चुप रहो।”
लेकिन बेचारे खजाने से लंबी खामोशी कहाँ सहन होती है!
और तब अवैध बाजार अपने पुराने अंदाज में मुस्कराता हुआ लौट आता है।
सागर : एक और बोतल, एक और सबक
सितंबर 2026 का सागर इस पूरी कहानी का नया अध्याय है।
कम-से-कम ग्यारह लोगों ने ऐसी बोतल से आखिरी घूँट लिया, जिसने जश्न का वादा किया था और बदले में मिथाइल अल्कोहल थमा दिया।
अधिकारी निलंबित हुए।
दुकानें सील हुईं।
कड़ी कार्रवाई का आश्वासन आया।
सीमा पार की आपूर्ति-श्रृंखला की तलाश शुरू हुई।
यानी सरकारी पटकथा का लगभग पूरा परिचित सेट तैयार हो गया।
लेकिन त्रासदी का असली प्रश्न वहीं खड़ा है।
आखिर जोखिम हमेशा सबसे गरीब के हिस्से में ही क्यों आता है?
लाइसेंस कहीं और है।
कर कहीं और जमा होता है।
राजस्व कहीं और गिना जाता है।
और मौत—वह गरीब की बस्ती में आकर बैठ जाती है।
इस पूरी नीति का सबसे बड़ा व्यंग्य
शायद इस व्यवस्था का सबसे सटीक व्यंग्य चार पंक्तियों में समाया है—
बोतल जनता की,
कर सरकार का,
लाइसेंस ठेकेदार का,
और जोखिम गरीब का।
और ऊपर से एक सदाबहार नारा—
“जनहित में जारी।”
तो आइए, सागर 2026 के नाम एक और जाम उठाएँ।
यह जाम उत्सव का नहीं, सवाल का है।
यह उस व्यवस्था के नाम है जो शराब को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताती है, मगर उसके राजस्व को बड़े प्रेम से अपनी बजट-पुस्तिका में जगह देती है।
यह उस नीति के नाम है जिसमें कानूनी बोतल पर सरकारी मुहर होती है, अवैध बोतल पर नकली क्यूआर कोड—और दोनों के बीच सबसे ज्यादा असुरक्षित वही आदमी होता है जिसके पास चुनाव की गुंजाइश सबसे कम होती है।
सावधान रहिए, हुज़ूर।
क्योंकि इस कहानी का असली ‘आफ्टरटेस्ट’ शराब का नहीं है।
वह है—
लापरवाही, लालच और मौत का कड़वा स्वाद।
और इस कॉकटेल का कोई एंटीडोट अभी तक आबकारी विभाग की फाइलों में नहीं मिला है।
जय हो, आबकारी महाराज!
पूर्व प्रोफेसर, अंग्रेज़ी, मध्य प्रदेश शासन
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