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मंटो के नाम एक खुला खत:क्या तुम वैसे इंसान थे जैसे तुम लेखक थे,आँखें मिलाओ मंटो ?

वीथिका, वामा            May 13, 2022


 पल्लवी प्रसाद।
जब समाज के ठेकेदार तुम्हारी कहानियों के लिये तुम्हें सलीब पर चढ़ा रहे थे, तब तुमसे औरतें मुहब्बत कर रही थीं। तुम उनकी बात कह रहे थे। तुम जलालत की बात कर रहे थे।

तुम जिस्म और जिन्स की बात करते थे। तुम जिस्मफरोशी की शिकार औरतों के महबूब लेखक थे, ग़लीच के मसीहा।

लेकिन यह सब तुम्हारी कहानियों के भीतर था। कहानियों के बाहर क्या था मंटो ? क्या तुम वैसे इंसान थे जैसे तुम लेखक थे - आँखें मिलाओ मंटो ?

तुम एक 'सेक्सिस्ट' मर्द थे। मुझे नहीं पता तुम इस शब्द से परिचित हो या नहीं। माने तुम स्त्रियों के प्रति कुंठा रखने वाले पुरुष थे। तुमने कहानियों से इतर बहुत कुछ लिखा है जहाँ तुम अपनी यह असलियत हम पाठकों से न छुपा पाये।

नूरजहाँ - वह तुम ही थे जिसने अपने दोस्त शौक़त को नूरजहाँ से निकाह करने के लिये मना किया था।

यह तुम्हारी सोच थी कि वह उसके साथ रह ही रही थी, दोस्त का काम चल ही रहा है, तब उससे शादी करने की क्या ज़रूरत है।

यह बात बड़ी दिलचस्प रही कि तुम्हारे जिगरी दोस्त ने अपने घर जा कर निकाह के लिये अपने घरवालों तक को राज़ी कर लिया और उनके आशीर्वाद से अपनी प्रेमिका से शादी कर ली लेकिन तुम्हें यह बताना ज़रूरी भी नहीं समझा। यह कैसा विरोध था तुम्हारा ?

तुम ठहरे सत्यान्वेषी - प्रेम गफ़लत है और सेक्स हक़ीक़त टाइप! प्रेम तुम्हारे साहित्य में शायद ही मिले चूँकि तुम हकीक़त लिखते थे। लेकिन हकीक़त यह भी है कि हर साल कई जोड़े प्रेम के वास्ते अपनी जान गँवाते हैं, जबकि सेक्स तो उन्हें मिल ही जाता? यदि तुमने भी जरा सी 'गफ़लत' पाल ली होती तो यूँ बेज़ार न जीते।

रशीद जहाँ - वे तुम्हारी समकालीन थीं, वे इस उपमहाद्वीप की पहली मुस्लिम महिला डॉक्टर थीं - गायनोकोलॉजिस्ट। यानी स्त्री रोग एवं प्रसूति विशेषज्ञ। वे छोटे बाल रखतीं और पैंट-शर्ट भी पहना करतीं।

उनके लेखन व विचार क्रांतिकारी रहे, वे मुस्लिम समाज की रूढ़ियों पर चोट किया करती थीं। स्त्री के सम्मान, अधिकार तथा स्वास्थ्य की बातें करती थीं।
तुम और क्या कह सकते थे उनकी शान में सिवाय इसके -

"रशीद जहान का फ़न आज कहाँ है? कुछ तो गेसुओं के साथ कट कर अलहदा हो गया और कुछ पतलून की जेबों में ठस हो कर रह गया।

फ़्रांसीसी में 'जार्जसाँ' से निस्वानियत का हसीन मलबूस उतार कर तसन्नों की ज़िंदगी इख़्तियार की। पालिस्तानी मौसीकार शो पीस से लहू थुकवा-थुकवा कर उसने लाल ओ गुहर ज़रूर पैदा कराये। लेकिन उसका अपना जौहर उसके वतन में दम घुट के रह गया।"

तुम एक गंभीर प्रगतिशील क्रांतिकारी कम्युनिस्ट डॉक्टर लेखक के गेसुओं को नापते रहे, उनकी पतलून की जेब का अंदाज़ा लगाते रहे क्योंकि वे महिला थीं।

तुम्हारे लिये यह ज़्यादा ज़रूरी था कि वह अपना स्त्रीत्व पुरुषों को रिझाने में लगाये रहे या वह पुरूषों के पौरुष को तवज्जो नहीं देती थीं, यह बात तुम्हें चुभ गयी ?

यार मंटो, यह वतन आज भी रशीद जहान का इंतजार कर रहा है। उन से जौहर को मुहताज हैं हम।

सितारा देवी - सितारा देवी पर तुमने ज़ुल्म ही ढाया समझो। वह अपने जमाने की आला दर्जे की कत्थक नृत्यांगना थीं।

वह छोटी अदाकारा थीं लेकिन नृत्य के फ़न में एक महान कलाकार, वे स्वतंत्र थीं।

तुम भी तो कलाकार थे लेकिन तुम से दूसरे कलाकार की इज्जत न की गयी ? तुमने अपनी क़लम से उनकी तस्वीर का यूँ ख़ाका खींचा है मानो वे कोई आदमखोर चुड़ैल हों।

तुमने उनके फ़न, श्रम, संघर्ष पर एक शब्द न लिखा। तुमने पाठकों को गिनती गिनायी कि वे कितने मर्दों के साथ रहा करती थीं। कैसे वे उन्हें दूसरी औरतों के लिये नकारा बना देती थीं।

तुम औरतों के बेडरूम की जासूसी किया करते थे क्या मंटो ? तुम औरतों के पर्स-हैंडबैग के भीतर चुपके-चुपके झाँकते थे यह तो तुम ख़ुद ही कुबूलते हो। तुम लिखते हो नज़ीर सितारा को मारा-पीटा भी करता था ।

"ऐसी औरतें ज़द-ओ-कूब से एक ख़ास क़िस्म की जिन्सी लज्जत महसूस करती हैं मगर उनसे मुंसलिका मर्द कब तक हाथा-पाई करता रहे।"

वाह ! दुनिया में जो तमाम औरतें रोज़ाना पिटती हैं वह जिन्सी लज्जत पाने के वास्ते पिटती हैं और उन्हें पीटने वाले मर्द उनकी गुजारिश पर उन्हें पीटते हैं।

ऐसे मेहरबान-दिल मर्दों को जेल की लज्जत दिलाने के लिये हिन्दुस्तान में आजकल पूरे क़ानूनी इंतज़ामात हैं।

सितारा देवी के प्रेमियों ने उन से प्रेम किया, लेकिन तुम थे कि अनुसंधान करते रहे!

तुम अपने समय की इतनी बड़ी शास्त्रीय नर्तकी के रियाज़ के लिये कहते हो "यह भी हैरतनाक चीज़ थी कि सुबह उठते ही दो घण्टे वहशियों के मानिन्द नाचती रहे।"

सितारा देवी से तुम्हें क्या प्रॉब्लम थी ? फ़िल्मों की तिजारती दुनिया में वह किसी मम्मी की बेबी नहीं थीं, उनका कोई दलाल नहीं था, वह अपनी मर्ज़ी की मालिक थीं।

क्या यह नागवार था तुम्हें ? या तुम्हारी पितृसत्तात्मक सोच को यह मंज़ूर नहीं था कि कोई औरत अपनी मर्ज़ी से सेक्स का लुत्फ़ उठाये, एक नहीं अनेक के साथ रहे ?

जब कि पुरुषों के लिये यह बातें आम हैं तथा वे इनकी डींगें भी मारते हैं। तुम ख़ुद सघन से सघन पतित पुरूष मित्रों के प्रति अपने जीवन और लेखनी में बेहद उदार रहे हो।

क्या मुश्किल तुम्हारे अहं की भी थी कि तुम जैसे अफ़सानानिगार को वह तवज्जो नहीं देती थीं और तुम्हें चाय नौकर के हाथों भिजवाती थीं ?

अंकल सैम - तुमने अंकल सैम (अमरीका) के नाम कई पत्र लिखे । उनमें से कुछ पत्रों में तुमने औरतों का घोर अपमान किया है, कि वे विदेशी औरतें हैं इस से तुम्हारा गुनाह कम नहीं होता।

पॉलिटिकल कमेंट्री व तंज हिन्दुस्तानी या पाकिस्तानी गाली नहीं जो औरत के अंगों से रगड़ खाये बग़ैर मुकम्मल न हो। तुम पाकिस्तानियों को अमरीकी औरतें मुहैय्या करवाने की बात करते हो ।

तुम जादुई पाउडर खाने की बात करते हो जिससे महिलाओं के शरीर उनके कपड़ों से बाहर दिखाई देंगे, वग़ैरह-वग़ैरह।

तुम्हारी इन बातों में जिन्हें हास्य या व्यंग्य का बोध हुआ, तुम्हारे साथ ही, मुझे उन पर भी तरस आता है। मालूम पड़ता है कि तुम्हें औरतें हीरा मंडी में ही सुहाती थीं।

तुम्हारी संवेदना और सहानुभूति उनके लिये हैं जिन पर तुम मानवीयता का रौब गाँठ सकते हो। वे जो तुम्हारे सामने रोबीली हैं उनके वास्ते तुम्हारी क़लम कुटनी बुढ़िया की तरह चलती है।

इस्मत चुगताई—और तुम्हारी दोस्त इस्मत? वे बाद में तुम्हारी दोस्त बनीं। पहली ही मुलाक़ात के पहले ही वाक्य में तुमने उनकी कहानी 'लिहाफ़' के अंत की तफ्तीश करनी चाही थी।

क्या सोचा था तुमने कि यह बड़ा खुल कर लिखती है, देखुँ किसी पुरुष से कितना खुल कर बात कर पाती है ?

उनके झेंपने पर तुमने बेगम से कहा था, "यह तो कमबख़्त बिल्कुल औरत निकली, सारा मज़ा किरकिरा कर दिया।"

तुमने बाद में वह वाक्या याद करते हुये इस्मत के लिये कहे अपने वे शब्द वापस लिये हैं। तुम्हारी कहानियों से इतर मैं तुम्हें जब भी पढ़ती हुँ कई बार दिल में आता है कि तुम्हें अपने सामने बिठाऊँ और तुमसे कहूँ - "तुम तो कमबख़्त बिल्कुल मर्द निकले! सारा मज़ा ही किरकिरा कर दिया ? "

और स्वीटहार्ट, मैं ये शब्द कभी वापिस नहीं लूँगी।

तुम बताते हो कि तुम जब भी कोर्ट केस में हाज़िर होने के लिये लाहौर जाया करते, वहाँ के करनाल शू हाउस से कई जोड़े जूते ख़रीद लाते। वे जूते तुम्हें बहुत प्रिय थे।

मेरे मंटो, तुम आज यहाँ होते तो तुम्हें यह ज़हमत नहीं उठानी पड़ती, तुम्हें वे जूतियाँ 'होम डिलीवर' की जातीं, बिल्कुल मुफ़्त ! कहा तो जानूँ, इधर इन दिनों हवा पलट गयी है, अपनी पतंग बचा लो!

उदाहरण और हैं किन्तु जानेमन आखिर यह प्रेम-पत्र है, ग़ज़ट तो नहीं?
"A writer picks up his pen when his sensibilities are hurt." - यह तुमने कोर्ट में जज से कहा था, अर्थात, एक लेखक अपनी क़लम तब उठाता है जब उसकी संवेदनाएँ आहत होती हैं।

मियाँ कम लिखा, ज़्यादा समझना। मेरा यह लव लेटर सफ़िया बेगम को ज़रूर पढ़ाना। वे ख़ुश होंगी, बेगम को मेरा सलाम कहना, बच्चों को प्यार, तुम्हें - उड़न बोसा !
तुम्हारी
आशिक,
(दस्तक से साभार)
#नाज़िश

वीरेंद्र भाटिया की फेसबुक वॉल से।

 



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