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व्यंग्य:ईमान की तुम मेरे क्या पूछती हो मुन्नी

वीथिका            Oct 29, 2022


 

राकेश कायस्थ।

अचानक मुझे कल्लूमल जी बहुत जोर से याद आ रहे हैं,  अगर आप मेरी पीढ़ी के हैं तो आपको भी याद होंगे।

कल्लूमल कोयले वाले यानी चमेली के बापू और छदम्मी के जीजाजी।

कल्लूमल के साथ मैंने जिनकी तस्वीर लगाई है, वही कल्लूमल जी के याद आने की वजह हैं। हाव-भाव, हुलिये और `ऐंजी’ से ज्यादा बड़ी वजह ये है कि कल्लूमल जी भी उन्हीं की तरह देश और समाज सुधारना चाहते थे, यानी नेता बनना चाहते थे।

चमेली को चरणदास ले उड़ा, कल्लूमल की राजनीति का क्या हुआ? कुछ भी नहीं हुआ, अगर हुआ होता बताने के लिए निर्माता प्रकाश मेहरा और निर्देशक बासु चटर्जी ‘चमेली की शादी’ का एक सीक्वेल ज़रूर बनाते।

विचारणीय बिंदु ये है कि ऐसा क्या अंतर था कि कल्लूमल जी को प्रधानी तक नहीं मिली और केजरीवाल जी देश के परधान बनने की तैयारी कर रहे हैं?

 

कल्लूमल जी बड़े सीधे थे, उनमें केजरी जी की तरह दूरदर्शिता नहीं थी।

अन्ना ने जब दिल्ली गन्ना बोया था कि तब सारे न्यूज़ चैनल केजरी की आरती उतारने में जुटे थे।

मुझे याद है उसी दौरान हरियाणा से उनकी किसी मौसी या मामी का इंटरव्यू आया था, जिसमें वो कह रही थीं कि छोरा बचपन से घणा दूरदर्शी था।

उसने घर के गमलों में महापुरुषों के के फोटो बो रखे थे,  उसका ख्याल था कि एक दिन फोटो में लालबहादुर शास्त्री उगेंगे और उन्हें तोड़कर वो दिल्ली ले जाएगा और फिर से प्रधानमंत्री बना देगा।

ना जी ना खुद कभी कुछ बनने का ख्याल उसके मन में नहीं था,  छोरा घणा आदर्शवादी था।

टीवी वाले पूछते थे कि कभी राजनीति में आओगे तो कान पकड़कर कसमें खाने लगता था, कल्लूमल जी की तरह नहीं जो खुलेआम कहते थे कि मुझे म्यूनिसपैलिटी की मेंबरी का चुनाव लड़ना है।

कल्लूमल जी हसरत दिल में लिये रह गये और ये .. खैर बनाने वाला तो भगवान है जी,

इन्हें भगवान ने बनाया और इन्होंने बाकी सबको को।

गुड़ रह गये इनके घंटाल गुरुजी बोरिया-बिस्तर बांधकर गांव लौटने को मजबूर हो गये लेकिन चेले जम गये।

राजनीति चोखी चल निकली तो दायें-बायें खड़े कुछ लोग आदर्श, सिद्धांत, लोकतंत्र जैसी बातें याद दिलाने लगे।

अब केजरी जी कल्लूमल तो हैं नहीं कि छदम्मी घड़ी छीन ले, लात मारकर सबको भगा दिया।

तो ऐंजी पहले कट्टर गांधीवादी थे, फिर कट्टर भगत सिंह वादी, फिर कट्टर अंबेडकरवादी फिर कट्टर हनुमान भक्त और कट्टर लक्ष्मी-गणेश का उपासक।

कहते रहे कि हमारी कोई ब्रांच नहीं लेकिन पंजाब से लेकर गोवा तक दुकान बढ़ती रही और अब गुजरात में घुसकर पेट पर लात मारने की तैयारी है।

मूर्खता का सार्वजनिक महिमा-मंडन और मूर्खों का सशक्तिकरण पुराने राजनेताओं की फैंटेसी थी लेकिन उसे अमली जामा पहनाने की हिम्मत उनमें नहीं थी।

नये वाले महानायक और विश्वगुरू ने ये काम बखूबी किया। केजरी ने तय किया ‘ मैं इसे अगले लेबल तक ले जाउंगा जी ‘

राजनीति में सफल होने के लिए जो कुछ चाहिए वो सबकुछ इनके पास है जी।

पीआर के लिए करोड़ों के विज्ञापन, हज़ारों कार्यकर्ता और सोशल मीडिया पर सैकड़ों लठैत भी।

`मैं नक्सली हूं’ से लेकर `मैं हनुमान भक्त हूं’ तक सारे प्रोडक्ट इनके पास है जी, जिसे जो चाहिए वो दे देंगे।

विश्वगुरू के भी स्वभाविक उत्तराधिकारी भी यही हैं।

जनता का भी एक इगो होता है,  वो हमेशा किसी चालू आदमी से ठगा जाना पसंद करती है।

किसी मूर्ख ने ठग लिया तो इगो हर्ट होता है,  तो ऐंजी अब पूरे भारत में दुकान जमाने को तैयार हैं। इन्हें देखकर अकबर इलाहाबादी का शेर याद आता है—

ईमान की तुम मेरे क्या पूछती हो मुन्नी

शिया के साथ शिया सुन्नी के साथ सुन्नी

 

 


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