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उन तीन में से कोई एक पूरा हो जाता तो इश्‍क अधूरा रह जाता

वीथिका, वामा            Aug 31, 2022


कुमार क्षितिज।

इश्क की कोई भाषा नहीं होती है, इसे मजहब या वक्त की बेड़ियों से नहीं बांधा जा सकता है।

प्यार की कहानियों के किरदार हमेशा जीवित रहते हैं। प्रेम अगर किसी इंसान की शक्ल में आए तो उसकी शक्ल शायद अमृता प्रीतम जैसी होगी।

समाज की तमाम बेड़ियों को तोड़कर खुली हवा में सांस लेने वालीं, आजाद ख्यालों वालीं अमृता प्रीतम पंजाब की पहली कवियत्री थी।

वही अमृता जिनके प्रेम को सरहदों, जातियों, मजहबों या वक्त के दायरे में नहीं बांधा जा सकता।

लोग कविता लिखते हैं और जिंदगी जीते हैं मगर अमृता जिंदगी लिखती थीं और कविता जीती थीं।

अमृता प्रीतम का आज जन्मदिन है। अमृता ने साहिर से प्यार किया और इमरोज़ ने अमृता से और फिर इन तीनों ने मिलकर इश्क की वह दास्तां लिखी जो अधूरी होते हुए भी पूरी थी।

अगर अमृता को साहिर या इमरोज को अमृता मिल गई होतीं तो मुमकिन था कि इनमें से कोई एक पूरा हो जाता लेकिन इस सूरत में इश्क अधूरा रह जाता।

इमरोज अमृता के जीवन में काफी देर से आए। अमृता कभी-कभी कहा करती थीं '‘अजनबी तुम मुझे जिंदगी की शाम में क्यों मिले, मिलना था तो दोपहर में मिलते।''

अमृता की आख़िरी सांस तक इमरोज़ उनके साथ रहे। जबकि इमरोज़; अमृता और साहिर के रिश्ते और साहिर को लेकर अमृता के एहसास को भी जानते थे।

अपनी जिंदगी के 45 साल दोनों ने साथ बिताए।

आज हम ऐसे रिश्ते की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं कि कोई आप के साथ इस तरह जिंदगी बिताए।

2002 में अमृता ने इमरोज़ के नाम आखिरी कविता लिखी जिसका शीर्षक था, ‘मैं तुम्हें फिर मिलूंगी।'

 वे उस साल जनवरी में अपने ही घर में गिर पड़ी थीं और तब से बिस्तर से नहीं उठ पाईं। 31 अक्तूबर 2005 को अमृता ने आखिरी सांस ली, लेकिन इमरोज का कहना था कि अमृता उन्हें छोड़कर नहीं जा सकती वह अब भी उनके साथ हैं।

उनकी मृत्यु होने पर इमरोज़ ने लिखा, ‘अमृता ने जिस्म छोड़ा है साथ नहीं।’

 वो कहते हैं, ‘हम जीते है कि हमें प्यार करना आ जाए, हम प्यार करते हैं कि हमें जीना आ जाए।’

अमृता बचपन से बेचेहरा देखे जानेवाले जिस सपने के पुरुष की खोज में पूरी उम्र भटकती रहीं, वह शक्ल इमरोज़ के सिवा और किसी की हो ही नहीं सकती थी।

और कौन हो सकता था जिसके दिल में अमृता के लिए इतनी मुहब्बत हो सकती थी।

साहिर लुधियानवी से उनका प्यार एकतरफ़ा था।

अमृता से पहले और अमृता के बाद में साहिर के जीवन में अनगिनत महिलाएँ आईं।

यह जानने के बाद अमृता को तब नर्वस ब्रेक डाउन हुआ, जिससे वे बमुश्किल उबरी थीं। साहिर वह शख्स नहीं थे। उतनी हिम्मत और मोहब्बत नहीं थी उनके दिल में।

साहिर के लिए यह प्यार सिर्फ़ एक मुकाम जैसा था, और अमृता के लिए उनकी पूरी जिन्दगी की रसद।

इस दुनिया से जाते-जाते अमृता यह सच समझ चुकी थीं, इसीलिए उनकी अंतिम नज्म ‘मैं तुम्हें फिर मिलूंगी’ इमरोज के नाम थी, केवल इमरोज के लिए।

अमृता प्रीतम ने 100 से अधिक कविताओं की किताब लिखी, साथ ही फिक्शन, बायोग्राफी, आलेख और आटोबॉयोग्राफी (रसीदी टिकट) लिखा, जिसका कई भारतीय भाषाओं सहित विदेशी भाषाओं में भी अनुवाद हुआ। अमृता प्रीतम पहली महिला लेखिका हैं जिन्हें 1956 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। 1982 में उन्हें ‘कागज ते कैनवास’ के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। 1986 में राज्यसभा की सदस्य मनोनीत हुईं।2004 में पद्मविभूषण प्रदान किया गया।

अमृता पर लिखना कुछ ऐसे ही है जैसे आग को शब्द देना, हवा को छूकर आना और चांदनी को अपनी हथेलियों के बीच बांध लेना।

प्रेम में सिर से पांव तक डूबी यह स्त्री आजाद बला की थी और खुद्दार भी उतनी ही।

हम मानते आए हैं, प्रेम और आजादी दो विरोधाभासी शब्द हैं।

प्यार अगर किसी से सिरे से बंध जाना है तो आजादी हर बंधन को तोड़कर खुली हवा में जीने और सांस लेने का नाम है।

पर अमृता ने प्यार के साथ आजादी को जोड़कर प्यार के रंग को थोड़ा और चटख और व्यापक बना दिया।

यूं ही नहीं है कि एक दौर की पढ़ी लिखी लड़कियों के सिरहाने अमृता की रसीदी टिकट हुआ करती थी।

यही नहीं, उनके जीने-रहने के तौर-तरीके भी बाकोशिश कॉपी किए जाते रहे। अमृता का यह आकर्षण उन्हें खास बनाता है।

साहित्य और मोहब्बत की दुनियां में अमृता प्रीतम हमेशा अमर रहेंगी।

हैप्पी 101th बर्थडे अमृता कौर प्रीतम...!!

विभिन्न संस्मरणों, किताबों और लेखों पर आधारित

 

सुरेश चंद्रा की वॉल से।

 



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