आर्थिक स्थिति का एक गैरअर्थशास्त्रीय विश्लेषण

खरी-खरी            Feb 09, 2018


संजय कुमार सिंह।
सरकार कह रही है शेयर बाजार की मंदी अंतरराष्ट्रीय कारणों से है। देश में मंदी के जो कारण हैं उसे सरकार मान नहीं रही है पर वह सब सख्त फैसले लेने का ही असर है। सख्त फैसले लोग इसीलिए नहीं ले पाते हैं। लेकिन अगर आप सख्त फैसले का मतलब यही समझें कि इससे फलाना नाराज हो जाएगा और आपको उसकी परवाह नहीं है। तो दरअसल आप सख्त फैसले को समझते नहीं हैं।

मुझे लगता है सख्त फैसले लेने की बहादुरी अब महंगी लग रही है। कारण चाहे जो हो फैसले का असर जितने समय रहना है रहेगा। वह किसने फैसला लिए है उससे बढ़ा घटता तो है नहीं। सख्त फैसलों में नोटबंदी थी। फिर बिना तैयारी के जीएसटी और एफडीआई पर पूरा यू टर्न।

मुझे नहीं पता, एफडीआई पर सरकार ने यू-टर्न क्यों लिया लेकिन मोटा-मोटी ऐसा लगता है कि नोटबंदी के बाद जब बाजार में पैसों की कमी हुई (क्यों हुई और हुई कि नहीं वह अलग मुद्दा है अभी यह मानकर चलिए कि हुई) तो सरकार ने सोचा चाहे जो हो, जीएसटी लगाना जरूरी है। सख्त फैसले लेने की छवि बनी रहनी थी और लोगों का ध्यान नोटबंदी से जीएसटी पर चला जाना था।

अच्छे काम का ढिंढोरा पीटना ही था और यह तो अंदाजा ही नहीं होगा कि इससे उद्योग व्यापार इस कदर प्रभावित होंगे। मीडिया मैनेजमेंट एक काम है पर देश में हर कोई पकौड़े तलेगा तो दिखेगा ही। इंटरव्यू आप किसी को दीजिए या न दीजिए। और इस तरह जीएसटी लागू हो गया। बाजार के लिए एक तो करेला उसपर नीम चढ़ा वाली हालत हो गई।

कारोबारी-व्यापारी परेशान तो था ही अब डर भी गया। गलत करने से अच्छा है न करो, सो लोगों ने हाथ खींच लिए काम कम हो गया। बाजार में पैसे कम हो गए। इसका असर सरकारी खजाने पर भी हुआ। मंदी से वसूली भी कम हुई। कुल मिलाकर सरकार घोषणाएं ही कर सकती है। पैसे कहां से लाए। कोई रास्ता नहीं था–एफडीआई का बुलबुला दिखा।

दुनिया भर में नाम कमा चुके मोदी जी को लगा कि हमारा कानून ही खराब है। लोग तो भारत में पैसे लगाने के लिए लाइन लगाकर खड़े हैं, उन्हें छूट दी और पैसे की बरसात हो जाएगी। सो एफडीआई भी होगा। भरपूर। पर पैसे कोई कानून में छूट और सख्ती से थोड़े लगाता है। पैसे तो आदमी कमाने की लिए लगाता है। कमाने की संभावना होगी तो लगाएगा नहीं तो नहीं। कानून में रास्ते तो होते ही हैं। वो भी पैसे वालों के लिए कैसे न होंगे। तो एफडीआई का दांव भी खाली गया।

दूसरी ओर, छवि यह बनी कि ये सरकार तो कुछ भी कर देगी। इसलिए, तेजी नहीं दिखाने का। इंतजार करो। और लोग इंतजार कर रहे हैं। सरकार है कि मनमानी (या गलती पर गलती) करती जा रही है। सरकार के इन तीन प्रमुख निर्णयों के साथ नियमों की सख्ती है। उनके पालन पर जोर है आदि आदि। सरकार तो कह रही है कि उसका मकसद काले धन को पकड़ना और काला धन बनने से रोकना है। पर हर जगह रिकार्ड और दर्ज किए जाने का असर यह है कि लोग एक नंबर का पैसा भी खर्च करने से डर रहे हैं हिचक रहे हैं।

इसे एक साधारण से उदाहरण से समझिए। बहुत सारे लोगों के पास पर्याप्त पैसे हैं वो खर्च भी करते हैं इसपर आयकर नहीं लगना। जीएसटी या जो टैक्स लगे उससे उन्हें दिक्कत नहीं है। पर पासबुक में दर्ज होने से है। खर्च का हिसाब रखे जाने से है। उदाहरण के लिए, मित्रों के साथ पार्टी करना – लोग करते रहते हैं।

इसके पैसे नकद दिए जाते तो खर्च करने वाला खर्च कर देता कोई हिसाब नहीं, कहीं दर्ज नहीं। पर जब यह दर्ज होगा कि फलां ने फलां तारीख को फलां मकसद से पार्टी दी। इतने लोग आए तो इतना खर्च कैसे हो गया? जब सब कुछ दर्ज होना है तो उनमें तालमेल होना चाहिए। और हो भी तो शक शुबहा की गुंजाइश बहुत रहती है। ऐसे में आदमी झमेले में पड़ने से बचता है। सख्ती करके सरकार समझ रही है कि नकद भुगतान से टैक्स चोरी हो रही थी। जबकि वह पूरा पैसा ही फालतू खर्च हो रहा था। इसलिए बाजार में था – सर्कुलेशन में था। अब इसपर 28 प्रतिशत का अधिकतम टैक्स वसूलने के लिए सरकार ने नकद खर्च करने का विकल्प लगभग खत्म कर दिया है।

सरकार के तो 28 प्रतिशत (अधिकतम) गए बाजार का पूरा गया। वह भी तब जब वह 28 प्रतिशत ज्यादा लेने की कोशिश में थी। और जब खर्च ही नहीं करना है तो कमाने की क्या जरूरत? ऐसे में बाजार में पैसा कहां से आएगा। दूसरे लोगों में यह डर भी बनाया गया है कि सरकार सब देख रही है। जिसके पास पैसे हैं, गलत नहीं है तो भी वह दिखाकर, टालने वाले खर्चे करके किसी की नजर में क्यों चढ़ना चाहेगा। कौन नहीं जानता कि सरकारी अफसर ऐसे मौकों पर वसूली करते हैं। पर वसूली तक तो ठीक था। फंसना कौन चाहेगा।

 


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