Breaking News

सरकार की बॉडी लैंग्वेज बताती है मीडिया की फर्जगिरी उसे पसंद नहीं

खरी-खरी, मीडिया            Oct 25, 2017


उमेश त्रिवेदी।
दिल्ली की मोदी-सरकार के साथ सत्रह राज्यों में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की सरकारों की हांडी में पिछले दो सालों से खदबदा रही असहिष्णुता की खिचड़ी का पहला दाना राजस्थान में सामने आया है, जहां वसुन्धरा राजे की सरकार सोमवार से शुरू हो रहे विधानसभा सत्र में मीडिया पर अप्रत्यक्ष-सेंसरशिप थोपने वाला विधेयक पेश करने जा रही है।

विधेयक के माध्यम से राजस्थान सरकार खुद के लिए, अपने कर्मचारियों के लिए और जजों के लिए सेंसरशिप की प्रतिरोधक-प्रणाली (इम्यून-सिस्टम) विकसित करने जा रही है। इसके अंतर्गत भ्रष्टाचार के मामलों में लोक-सेवकों, जजों और मजिस्ट्रेटों के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति मिलने के पहले मीडिया उनका नाम एवं अन्य जानकारी का प्रकाशन और प्रसारण नहीं कर सकेगा। इसमें जुर्माने के साथ दो साल की सजा का प्रावधान है।

दिलचस्प है कि न्यायपालिका के मामलो में पूर्व स्वीकृति के प्रावधान पहले से ही लागू हैं। जजों के नाम पर गफलत करके उन कर्मचारियों के लिए रक्षा-कवच तैयार किया जा रहा है, जो भ्रष्टाचार की गंगोत्री में चांदी-सोना घोलते हैं।

सरकार और मीडिया के बीच यह एक नए किस्म के टकराव की शुरुआत है। सरकार मानती है कि जनहित के कामों को अंजाम देने वाली मशीनरी को संरक्षण मिलना चाहिए, जबकि मीडिया की धारणा है कि समाज का 'व्हिसल-ब्लोअर' होने के नाते जनहित में घपलों को उजागर करना उसका फर्ज है। सरकार की 'बॉडी-लैंग्वेज' कहती है कि मीडिया की ये फर्जगिरी उसे पसंद नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह जैसे बड़े नेता अपने भाषणों में मीडिया के लिए अलर्ट जारी करते रहे हैं।

मोदी-सरकार और भाजपा के राज में एक सोची-समझी रणनीति के तहत तालाब में कंकर फेंके जाते हैं और लहरें गिनकर रणनीति तय की जाती है। मोदी तटस्थ भाव से ऐसे मामलो में चुप्पी का कंबल ओढ़ कर नजारा देखते रहते हैं। राजस्थान के अध्यादेश का मंतव्य भी तालाब में कंकर फेंककर जनता के मूड को भांपना है। देश का मीडिया सुकून से काम करने की स्थिति में नहीं है। सत्ताधामों में सुनिश्चित व्यूह-रचना के तहत मीडिया को अविश्वसनीय बनाने का काम चालू है।

जून, 2015 में आपातकाल की चालीसवीं सालगिरह पर एक अंग्रेजी अखबार से अपने इंटरव्यू में, भाजपा में राजनीतिक-वनवास झेल रहे वयोवृध्द नेता लालकृष्ण आडवाणी ने आगाह किया था कि देश की राजनीति में अभी भी फूल-फल रहे आपातकाल के रोगाणुओं से सावाधान रहने की जरूरत है। मीडिया पर अंकुश लगाने की ये प्रवृत्तियां एकाएक नहीं जागी हैं।

केन्द्र और राज्य-सरकारों के मन में यह विचार कई दिनों से कुनमुना रहा है। यह समझ में भी आने लगा था। सुबह सवेरे ने इसी कॉलम में 30 मई 2016 को लिखा था कि -'सरकार की 'बॉडी-लैंग्वेज' में मीडिया के लिए अलर्ट है'। इसके बाद 5 नवम्बर 2016 में लिखा था कि ''एनडी टीवी के बहाने मीडिया को घुटने टेकने के सिग्नल...।' 4 मई 2017 को लिखा था कि– ''भारतीय मीडिया- कैद में है, 'बुलबुल', 'सैयाद' मुस्कराए...?'' आपातकाल में यह प्रकोप मीडिया पर सेंसरशिप की महामारी बनकर बरसा था, जबकि फिलवक्त चिकनगुनिया के रूप में मीडिया के हाथ-पैर तोड़ रहा है।

3 मई 2017 को 'विश्व प्रेस-फ्रीडम डे' पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने ट्वीटर पर संदेश दिया था कि 'विश्व प्रेस-फ्रीडम डे पर हम स्वतंत्र और बहुमुखी पत्रकारिता का समर्थन करते हैं। यह लोकतंत्र के लिए बहुत जरूरी है।' भारत में मीडिया के मौजूदा हालात पर प्रधानमंत्री मोदी का यह संदेश पत्रकारों को गुदगुदाता नहीं है। भारत दुनिया के उन 72 देशों में शुमार है,जहां प्रेस की आजादी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है।

'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' की ताजा रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का दावा करने वाला भारत 'वर्ल्ड प्रेस-फ्रीडम इंडेक्स' में 180 देशों की तालिका में 136 वें स्थान पर खड़ा है। प्रेस पर पहरेदारी का सिलसिला बढ़ता जा रहा है। मीडिया पर अंकुश लगाने की सरकारी प्रशासनिक दादागिरी के साथ ही राजनीतिक-दादागिरी भी बढ़ती जा रही है।

दो दिन पहले ही तमिल फिल्म 'मर्सल' को लेकर तमिलनाडु में सियासी तूफान खड़ा हो गया है। तमिलनाडु भाजपा ने फरमान जारी किया है कि फिल्म में नोटबंदी, जीसएटी और मंदिर आदि पर कटाक्ष करने वाले संवादों और दृश्यों को फिल्म से हटाया जाए।

वैचारिक धुरी को केन्द्र में रख कर सूचनाओं के दायरों को समेटना प्रेस की आजादी के साथ ही लोकतंत्र के मानक सिध्दांतों का गला घोंटने वाली प्रक्रिया है। केन्द्र-सरकार के अनुमोदन के साथ राजस्थान सरकार का यह अध्यादेश महामारी बनकर भाजपा शासित अन्य राज्यों में फैल सकता है, क्योंकि यह भ्रष्ट बाबुओं के लिए वरदान के समान है।

लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक हैं।

 


Tags:

मीडिया-की-फर्जगिरी

इस खबर को शेयर करें


Comments